हिंदू विवाह केवल रजिस्टर्ड न होने से अमान्य... तलाक के मामले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकारों को ऐसे विवाहों के रजिस्ट्रेशन के लिए नियम बनाने का अधिकार है और उनका उद्देश्य केवल 'विवाह का सुविधाजनक साक्ष्य' प्रस्तुत करना है. इस आवश्यकता का उल्लंघन हिंदू विवाह की वैधता को प्रभावित नहीं करता है.

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फैमिली कोर्ट ने मांगा था विवाह प्रमाण पत्र
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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह केवल रजिस्टर्ड न होने से अमान्य नहीं माना जाएगा और विवाह वैध रहेगा.
  • फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक याचिका में विवाह रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट देने की अनिवार्यता को हाई कोर्ट ने खारिज किया
  • याचिकाकर्ता सुनील दुबे ने विवाह प्रमाण पत्र न होने के आधार पर छूट मांगी थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था
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इलाहाबाद:

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ से जुड़े तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू विवाह केवल रजिस्टर्ड न होने से अमान्य नहीं हो सकता. हाई कोर्ट ने कहा है कि फैमिली कोर्ट आपसी तलाक याचिका में विवाह रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने पर जोर नहीं डाल सकता. यह आदेश जस्टिस मनीष कुमार निगम की सिंगल बेंच ने सुनील दुबे की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है. 

फैमिली कोर्ट ने मांगा था विवाह प्रमाण पत्र

तलाक से जुड़े इस मामले में, याची सुनील दुबे ने आजमगढ़ फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज द्वारा 31 जुलाई 2025 के पारित आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. फैमिली कोर्ट ने सुनील दुबे द्वारा अपनी पत्नी से तलाक के मामले में विवाह का पंजीकरण प्रमाण पत्र दाखिल करने से छूट के लिए दायर आवेदन पत्र संख्या 13-का को खारिज के दिया था. याची सुनील दुबे ने फैमिली कोर्ट के इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी. याचिकाकर्ता सुनील दुबे और उसकी पत्नी ने 23 अक्टूबर 2024 को आपसी सहमति से तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (बी) के तहत आजमगढ़ के फैमिली कोर्ट में एक आवेदन दायर किया था. याचिका के लंबित रहने के दौरान फैमिली कोर्ट के जज ने 4 जुलाई 2025 को आदेश देते हुए पति सुनील दुबे को विवाह प्रमाण पत्र दाखिल करने के लिए 2 जुलाई 2025 की तारीख तय की. 

हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956

याचिकाकर्ता पति ने आवेदन पत्र संख्या 13-का के तहत यह प्रार्थना करते हुए एक आवेदन दायर किया कि पंजीकरण प्रमाण पत्र पक्षकारों के पास उपलब्ध नहीं है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह को पंजीकृत कराने की कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है. इसलिए याचिकाकर्ता को विवाह प्रमाण पत्र दाखिल करने से छूट दी जाए. पति के इस आवेदन का विपक्षी यानी पत्नी मीनाक्षी ने भी समर्थन किया. इस मामले में फैमिली कोर्ट ने 31 जुलाई 2025 को आदेश देते हुए याचिकाकर्ता पति द्वारा दायर आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि हिंदू विवाह और तलाक नियम, 1956 के नियम 3(ए) में यह अनिवार्य है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत प्रत्येक कार्रवाई में विवाह प्रमाण पत्र कार्रवाई के साथ संलग्न किया जाना चाहिए. फैमिली कोर्ट ने आदेश में कहा कि भले ही दूसरे पक्ष द्वारा कोई आपत्ति न हो, क्योंकि विवाह प्रमाण पत्र दाखिल करना नियम, 1956 के नियम 3(ए) के अनुसार अनिवार्य है, इसलिए इससे छूट नहीं दी जा सकती और याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज कर दिया. 

विवाह के पंजीकरण का प्रावधान, लेकिन...

इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि विद्वान वकील ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह के पंजीकरण (Registration) का प्रावधान है, लेकिन विवाह पंजीकरण के अभाव में विवाह अमान्य नहीं होता है और याचिकाकर्ता के वकील ने आगे तर्क दिया कि याचिकाकर्ता का विवाह 27 जून 2010 को हुआ था. इसलिए उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 (Uttar Pradesh Marriage Registration Rules, 2017) के प्रावधान इन नियमों के लागू होने से पहले संपन्न हुए विवाह पर लागू नहीं होंगे. अन्यथा नियमावली, 2017 के नियम 6 के अनुसार पंजीकरण के अभाव में विवाह अवैध नहीं होगा. 

 हिंदू विवाह की वैधता

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य सरकारों को ऐसे विवाहों के रजिस्ट्रेशन के लिए नियम बनाने का अधिकार है और उनका उद्देश्य केवल 'विवाह का सुविधाजनक साक्ष्य' प्रस्तुत करना है. इस आवश्यकता का उल्लंघन हिंदू विवाह की वैधता को प्रभावित नहीं करता है. कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अधिनियम, 1955 की धारा 8 की उप-धारा (1) से (4) के प्रावधानों के अनुसरण में बनाए गए किसी भी नियम के बावजूद और रजिस्टर में विवाह की प्रविष्टि न करने के कारण विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होती है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंजीकरण प्रमाणपत्र विवाह को सिद्ध करने के लिए केवल साक्ष्य है. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 की उपधारा 5 के अनुसार, विवाह का पंजीकरण न होना विवाह को अमान्य नहीं करेगा. 

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि नियम, 1956 के नियम 3 के उप-नियम (a) के अनुसार, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दाखिल करने की जरूरत केवल तभी होती है. जब विवाह इस अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड हो. वर्तमान मामले में 2010 में संपन्न विवाह पंजीकृत नहीं है, इसलिए रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट दाखिल करने की कोई आवश्यकता नहीं है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता सुनील दुबे की याचिका को स्वीकार करते हुए आजमगढ़ फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज द्वारा विवाह प्रमाणपत्र दाखिल करने के आग्रह को 'पूरी तरह से अनुचित' बताया और 31 जुलाई 2025 को पारित आदेश रद्द कर दिया. 

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कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक की याचिका 2024 से लंबित है और फैमिली कोर्ट आजमगढ़ को निर्देश दिया है कि वो इस लंबित कार्यवाही पर कानून के अनुसार जल्द से संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने के साथ-साथ अपने मामले के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करें.

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