इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की एक हालिया टिप्पणी इस समय सुर्खियों में है. दरअसल एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस शैलेंद्र ने अदालतों में काम के भारी बोझ को बयां करते हुए कहा कि रोजाना कोर्ट में 400 से 800 मामले लिस्ट होते हैं, इसके बावजूद लोग जजों से रोबोट की तरह काम करने की अपेक्षा करते हैं. अदालत ने इस कड़वी हकीकत को स्वीकार किया कि अत्यधिक बोझ से दबे अदालतों में न्यायिक कार्यवाही पूरा होने में काफी समय लगता है. इस टिप्पणी ने भारतीय न्यायपालिका के उस गंभीर संकट को एक बार फिर सामने ला दिया है, जिससे देश की सबसे बड़ी अदालतों में से एक इस वक्त जूझ रही है. वैसे एक सच ये भी है कि देश में सबसे ज्यादा लंबित मुकदमों के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का नाम इस समय सबसे ऊपर है.
आंकड़ों में अदालतों का बोझ और जजों की भारी कमी
सच्चाई यह है कि इस वक्त मुकदमों के अंबार के पीछे जजों की भारी रिक्तियां सबसे बड़ी वजह हैं. सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के कुल 25 हाईकोर्ट में जजों की कुल स्वीकृत क्षमता 1122 है, लेकिन मौजूदा समय में केवल 806 जज ही कार्यरत हैं. इसका मतलब है कि देश भर के हाईकोर्ट में जजों के 322 पद खाली पड़े हैं. इस कमी में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट सबसे शीर्ष पर है, जहां जजों की स्वीकृत संख्या 160 है, लेकिन यह अदालत केवल 109 जजों के साथ काम चलाने को मजबूर है यानी अकेले यहाँ 51 जजों के पद खाली हैं.
इसी तरह देश की राजधानी के दिल्ली हाईकोर्ट में भी कुल 60 जजों की क्षमता के मुकाबले अभी भी 16 पद खाली हैं. जजों की इस कमी का सीधा असर मुकदमों के निपटारे पर पड़ रहा है. अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस वक्त करीब 12 लाख 26 हजार मामले लंबित हैं, जबकि देश के सभी 25 हाईकोर्ट को मिलाकर यह आंकड़ा 62 लाख के पार पहुंच चुका है.
एक जज के सामने 800 मुकदमे, पूर्व जज ने बयां की बेबसी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस स्थिति पर वहां के रिटायर्ड जज जस्टिस सुधीर सक्सेना का कहना है कि जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की यह टिप्पणी कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह हाईकोर्ट के एक जज द्वारा सिस्टम के सामने व्यक्त की गई गहरी बेबसी है. उन्होंने कहा कि जो लोग कोर्ट के कामकाज की पेचीदगियों को समझते हैं, वे आसानी से उस जज की मानसिक स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसके सामने रोजाना बोर्ड पर 700 से 800 मामले लगे होते हैं और कोर्ट रूम में सैकड़ों वकील अपने-अपने मामलों की जल्द सुनवाई के लिए एक-दूसरे से होड़ लगा रहे होते हैं. जस्टिस सक्सेना के मुताबिक, मुकदमों के मामले में उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, लेकिन विडंबना यह है कि यहां जजों की संख्या कभी भी पूरी नहीं रही है.
राष्ट्रीय स्तर पर लंबित मामलों का डेटा
इन सबके बीच एक फैक्ट यह भी है कि देश की अदालतों में मुकदमों का बोझ अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका है. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश की विभिन्न अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला कोर्ट) में कुल लंबित मामलों का आंकड़ा 5.10 करोड़ से अधिक हो गया है. इसमें से सबसे बड़ा बोझ जिला और अधीनस्थ अदालतों पर है, जहां करीब 4.45 करोड़ मामले लंबित हैं. वहीं, देश के 25 उच्च न्यायालयों में लगभग 61 लाख और सुप्रीम कोर्ट में रिकॉर्ड 84,000 से अधिक मामले पेंडिंग हैं. इस भारी संकट की सबसे बड़ी वजह जजों की भारी कमी है, जहां देश में वर्तमान में प्रति 10 लाख की आबादी पर केवल 21 जज ही उपलब्ध हैं.
रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का सुझाव
इस संकट का एक बड़ा कारण अदालतों के अधिकार क्षेत्र का सही इस्तेमाल न होना भी है.रिटायर्ड जस्टिस सुधीर सक्सेना ने बताया कि उत्तर प्रदेश में जमानत जैसे छोटे-मोटे मामले भी सीधे हाईकोर्ट में ही दायर कर दिए जाते हैं. इसका खामियाज़ा उन कैदियों को भुगतना पड़ता है जो जेल में बंद हैं और अपनी आज़ादी का इंतज़ार कर रहे हैं. इसके साथ ही प्रशासन सभी जजों को केवल ज़मानत के मामलों की सुनवाई में नहीं लगा सकता, क्योंकि इसके अलावा भी कई अन्य महत्वपूर्ण कानूनी क्षेत्राधिकार हैं जहां जजों की बेहद आवश्यकता होती है.
कॉलेजियम की सक्रियता और सरकार से उम्मीद
हालांकि इस निराशाजनक स्थिति के बीच सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कुछ सकारात्मक कदम भी उठाए जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के जॉइंट सेक्रेटरी मीनेश दुबे के मुताबिक, जजों की कमी निश्चित रूप से एक मुख्य समस्या है, लेकिन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी का कॉलेजियम इस दिशा में लगातार काम कर रहा है. कॉलेजियम द्वारा हाईकोर्ट जजों के लिए लगातार की जा रही सिफारिशें एक उम्मीद जगाती हैं. मीनेश दूबे ने बताया कि हाल ही में मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक हाईकोर्ट के लिए 9 जजों की नियुक्ति की फाइल तैयार कर केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी है. अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है और उसे न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए इन नियुक्तियों को बिना किसी देरी के जल्द से जल्द हरी झंडी देनी चाहिए ताकि आम जनता को मुकदमों के लंबित होने के कारण होने वाली परेशानियों से राहत मिल सके.
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