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पिता थे संगीत के महारथी, बेटा कहलाया टीवी का राजकुमार, क्यों इस मशहूर एक्टर की मां ने कहा था- रिक्शा चला लेना, लेकिन संगीत मत सिखना

इस एक्टर के दादा शामीर खान भी सारंगी वादक थे. इतने बड़े घराने से आने के बावजूद भी अभिनेता को संगीत से दूर रखा गया क्योंकि उनकी मां ही नहीं चाहती थी कि वो गायक बनें.

पिता थे संगीत के महारथी, बेटा कहलाया टीवी का राजकुमार, क्यों इस मशहूर एक्टर की मां ने कहा था- रिक्शा चला लेना, लेकिन संगीत मत सिखना
पिता थे संगीत के महारथी बेटा कहलाया टीवी का राजकुमार
नई दिल्ली:

कहते हैं कि भाग्य कहां ले जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है. हिंदी सिनेमा में कई ऐसे स्टार्स आए, जो किसी दूसरे प्रोफेशनल से ताल्लुक रखते थे. ऐसे ही सिनेमा और टीवी पर चमकने वाले अभिनेता शाहबाज खान को भी नहीं पता था कि उन्हें करना क्या है लेकिन भाग्य और मेहनत के भरोसे उन्होंने फैंस के दिलों पर राज किया और आज भी टीवी पर अपने निगेटिव किरदारों से राज कर रहे हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि अभिनेता के पिता हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज गायक थे, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को नया रूप दिया था.

10 मार्च को इंदौर में जन्मे शाहबाज शाही घराने से ताल्लुक रखते हैं. उनके पिता हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खान थे, जिन्होंने आज गावत मन मोरा झूम के, जिन के मन में राम बिराजे और बैरागी रूप धरे जैसे गाने गाए थे. उनके दादा शामीर खान भी सारंगी वादक थे. इतने बड़े घराने से आने के बावजूद भी अभिनेता को संगीत से दूर रखा गया क्योंकि उनकी मां ही नहीं चाहती थी कि वो गायक बनें.

दरअसल, अभिनेता की मां नहीं चाहती थी कि भरी महफिल में कोई यह कहे कि उस्ताद अमीर खान का बेटा कैसा गाता है. जब शाहबाज छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया और उस वक्त उन्हें संगीत की तालीम देने वाला कोई नहीं था. अगर वे किसी और घराने में संगीत सीखने जाते तो कई तरह की बातें होतीं. अभिनेता ने खुद इंटरव्यू में कहा था कि मां ने कहा था कि भले ही रिक्शा चला ले लेकिन संगीत नहीं सीखना है. अभिनेता की शुरुआती पढ़ाई बोर्डिंग स्कूल में हुई, जहां उन्होंने अकेले खुद को संभालना सीखा. वह छोटी उम्र में ही समझदार बन चुके थे लेकिन उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि भाग्य उन्हें सिनेमा की तरफ लेकर जाने वाला है.

होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के बाद भी उन्हें नहीं पता था कि करना क्या है लेकिन एक दोस्त के बुलाने पर मुंबई चले गए,जहां उन्होंने कई महीनों तक थिएटर सीखा और उनकी किस्मत तब चमकी, जब उन्हें टीवी सीरीज 'टीपू सुल्तान' में हैदर अली का रोल मिला. पहले टीवी सीरीज कुछ ही एपिसोड में खत्म होने वाली थी लेकिन अभिनेता की किस्मत ने साथ दिया और उन्होंने 58 एपिसोड तक काम किया. टीपू सुल्तान शाहबाज़ को पहचान दिलाने के लिए काफी था. उन्हें उर्दू की बेहतर समझ के चलते सीरियल ऑफर हुआ, जिसके बाद वो 'चंद्रकांता', 'बेताल पचीसी' और 'द ग्रेट मराठा' जैसे सीरियल में दमदार रोल में दिखे.

सीरियल में पहचान बनाने के बाद उन्होंने फिल्मों का रूख किया. शुरुआत भले ही फिल्म 'नाचनेवाले गानेवाले' से हुई, लेकिन बाद में कैसे-कैसे रिश्ते, धरतीपुत्र, जिद्दी, युग और मेजर साब जैसी फिल्मों में सिनेमा के खरतनाक विलेन बनकर उभरे. आज भी अभिनेता टीवी और ओटीटी की दुनिया पर राज कर रहे हैं.
 

लेखक के बारे में
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प्रियंका तिवारी
Consulting News Writer
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