मुंबई में कबूतरखानों को हटाने पर छिड़ी आस्था बनाम सेहत की जंग, जानें पूरा विवाद

बीएमसी ने कबूतरों से लोगों की सेहत को नुकसान का हवाला देते हुए मुंबई में बने कबूतरखानों को हटाने का फैसला किया है. दाना डालने पर 500 रुपये जुर्माने का नियम बनाया है. कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं. मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया है.

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  • मुंबई में बीएमसी ने कबूतरखानों को सेहत के लिए खतरा बताते हुए इन्हें हटाने और कबूतरों को दाना डालने पर जुर्माना लगाने का आदेश दिया था.
  • बीएमसी के आदेश को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत का उल्लंघन बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हुई. कोर्ट ने स्टे का आदेश दिया.
  • कबूतरखानों का विवाद अब एक तरह से धार्मिक आस्था बनाम स्वास्थ्य सुरक्षा का मामला बन गया है. अब फैसला अदालत और विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर निर्भर है.
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मुंबई में कबूतरखानों को हटाने के विवाद में हाईकोर्ट ने दखल दिया है. बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने कबूतरों से नागरिकों की सेहत को होने वाले नुकसान का हवाला देते हुए मुंबई में बने कबूतरखानों को हटाने का फैसला किया है. दाना डालते पकड़े जाने पर 500 रुपये का जुर्माने का नियम भी बनाया. कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं. बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके बीएमसी के आदेश को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत का उल्लंघन बताया गया है. अदालत ने बीएमसी के आदेश पर अस्थायी रोक लगाते हुए जवाब मांगा है. मानवाधिकार आयोग ने भी दखल दिया है. आइए बताते हैं, इस विवाद की पूरी टाइमलाइन.

स्वास्थ्य मंत्री का कमिटी बनाने का ऐलान

मुंबई महापालिका क्षेत्रों में कबूतरखाने हटाने का आदेश और कबूतरों को दाना डालने पर 500 रुपये जुर्माने के बीएमसी के नियम पर महाराष्ट्र के हेल्थ मिनिस्टर प्रकाश अबितकर ने कहा कि एक सर्वेक्षण से पता चला है कि कबूतर नागरिकों के स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं. इसी को देखते हुए हमने कबूतरखाने हटाने का फैसला किया था. अब न्यायालय ने अभी कार्रवाई ना करने का निर्देश दिया है. हम इस संबंध में एक समिति गठित करने जा रहे हैं. वह जो भी सिफारिशें देगी, हम उन्हें लागू करेंगे.

ऐसे शुरू हुआ कबूतरखाना विवाद

मुंबई के कई हिस्सों में ब्रिटिश काल से ही कई कबूतरखाने मौजूद हैं. ये दादर, गिरगांव, मरीन ड्राइव आदि जगहों पर हैं. ये स्थल धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यता से जुड़े हैं. कई लोग इसे पुण्य का कार्य मानते हैं. पिछले कई सालों से शहर में कबूतरों की संख्या में भारी वृद्धि देखने को मिली है. पिछले एक साल से बीएमसी और स्वास्थ्य विभाग के पास फेफड़ों की बीमारी, एलर्जी और फंगल इन्फेक्शन से संबंधित शिकायतों की संख्या काफी बढ़ गई. खासकर बुजुर्गों में ये शिकायतें ज्यादा देखी गईं. बीएमसी के मुताबिक, मेडिकल रिपोर्ट्स में कबूतरों की बीट (मल) से होने वाले संक्रमण की पुष्टि हुई. 

मई–जून 2025

  • मुंबई के कई नागरिकों और डॉक्टरों ने कबूतरखानों को जनस्वास्थ्य के लिए खतरा (Public Health Hazard) बताया.
  • बीजेपी MLC प्रवीण दरेकर ने महाराष्ट्र विधान परिषद में यह मामला उठाया और दावा किया कि उनकी बुआ की मौत कबूतरों की वजह से हुई.

3 जुलाई 2025

  • महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई के 51 कबूतरखानों को तुरंत बंद करने का फैसला किया.
  • कबूतरों को खाना खिलाने वालों पर 500 रुपये जुर्माना लगाने के निर्देश दिए गए.
  • लोगों को खतरों से आगाह करने के लिए जागरूकता अभियान शुरू किया गया.

5-12 जुलाई 2025

  • BMC ने अभियान तेज करते हुए 107 लोगों से 61,900 रुपये का जुर्माना वसूला.
  • दादर, गिरगांव, सांताक्रूज़, डोंगरी जैसे इलाकों में छापेमारी हुई.
  • कई कबूतरखानों से अनाज के बोरे जब्त किए गए. अवैध निर्माण ध्वस्त कर दिए गए.

10 जुलाई 2025

  • BMC ने कुछ कबूतरखानों की जगहों पर गार्डन और ट्रैफिक सर्कल बनाने की प्रक्रिया शुरू की.

11 जुलाई 2025

  • बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल हुई, जिसमें बीएमसी की कार्रवाई को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत का उल्लंघन बताया गया.
  • कोर्ट ने बीएमसी के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी और कहा कि जब तक वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिलते, कबूतरखानों को ध्वस्त नहीं किया जाएगा.

13 जुलाई 2025

  • महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग (MHRC) ने बीएमसी और स्वास्थ्य सचिव को नोटिस जारी किया और पुख्ता मेडिकल डाटा पेश करने का आदेश दिया.

कबूतरखानों को हटाने और दाना डालने पर जुर्माने के मामले में हाईकोर्ट में अब अगली सुनवाई 23 जुलाई को होनी है. इस दौरान KEM अस्पताल के फेफड़ा विशेषज्ञ, बीएमसी के अधिकारी और मानवाधिकार आयोग के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे.

कबूतरखानों के कई समर्थक, धार्मिक समूह और ट्रस्ट इसे आस्था का विषय बता रहे हैं, वहीं कई स्थानीय नागरिक स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वच्छता को प्राथमिकता दे रहे हैं. एक तरह से यह मामला धार्मिक परंपरा बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य का बन गया है. अब फैसला अदालत और विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर निर्भर है.

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