वेदांता प्लांट ब्लास्ट का दर्द: ‘मम्मी… पापा कब आएंगे?’ 3 साल की बच्ची का सवाल सुन फफक पड़ी मजदूर की विधवा

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में वेदांता पावर प्लांट में हुए भीषण धमाके ने कई परिवारों की जिंदगी उजाड़ दी. जमगहन गांव में मजदूर थंडाराम लहरे की मौत के बाद उनकी 3 साल की बेटी का सवाल “पापा कब आएंगे?” हर किसी को भावुक कर रहा है. हादसे में अब तक 24 मजदूरों की जान जा चुकी है, जबकि कंपनी के रवैये पर परिवारों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

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Vedanta Plant Blast Pain: छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले का एक छोटा सा गांव- जमगहन. यहां इन दिनों मातम पसरा है. वेदांता पावर प्लांट में हुए भीषण धमाके ने न सिर्फ कई परिवारों के कमाने वाले छीन लिए, बल्कि मासूम बच्चों की दुनिया भी उजाड़ दी. तीन साल की श्रद्धा का बार‑बार पूछा गया सवाल “पापा कब आएंगे?” हर उस इंसान का कलेजा चीर देता है, जो यह मंजर देखता है. यह कोई कहानी नहीं, बल्कि एक परिवार की टूट चुकी जिंदगी की सच्चाई है.

मासूम सवाल और टूटी हुई मां

जमगहन गांव में लहरे परिवार के घर के बरामदे में एक चौकी पर बैठी 26 वर्षीय यशोदा अपनी बेटियों को सीने से लगाए बैठी हैं. तीन साल की श्रद्धा मां की गोद में है और लगातार एक ही सवाल दोहरा रही है... “पापा कब आएंगे?” उसकी चार साल की बहन प्रियांशी धीमे से कह देती है... “मम्मी… पापा अब नहीं आएंगे?” यह सुनते ही यशोदा फफक पड़ती हैं. उसके आंसू थमने का नाम नहीं लेते.

एक धमाका, जिसने सब कुछ बदल दिया

14 अप्रैल की दोपहर करीब 2:33 बजे सक्ती जिले के सिंघीतरई में स्थित वेदांता लिमिटेड छत्तीसगढ़ थर्मल पावर प्लांट में बॉयलर‑1 की स्टीम पाइप फट गई. धमाका इतना भीषण था कि कई मजदूरों की मौके पर ही जान चली गई. इस हादसे में 32 वर्षीय थंडाराम लहरे भी शामिल थे. यशोदा के पति और दो मासूम बच्चियों के पिता.

परिवार की चिंता और बूढ़े पिता का डर

घर के मुख्य दरवाजे पर बैठे थंडाराम के पिता केवल लहरे चुपचाप अपनी बहू और पोतियों को देखते रहते हैं. कुछ देर बाद बस इतना कहते हैं... “अब इनका क्या होगा? मेरी भी उम्र हो चली है… इनके सिर पर हाथ कौन रखेगा?” सवाल उनके हैं, जवाब किसी के पास नहीं.

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‘मुआवजा नहीं, इंसाफ चाहिए'- पत्नी का दर्द

यशोदा गुस्से और दर्द के बीच कहती हैं, “मेरे पति की मौत की कीमत कंपनी ने 35 लाख रुपये लगा दी. क्या किसी की जिंदगी की कीमत होती है?” उनका आरोप है कि थंडाराम ऑफिस बॉय थे. साफ‑सफाई और चाय‑नाश्ता देना उनका काम था. लेकिन उस दिन अधिकारियों ने उन्हें फोटो लेने के लिए हादसे वाली जगह के पास भेज दिया. और फिर एक धमाके ने मेरी दुनिया उजाड़ दी.

मुआवजे के लिए भी लंबा इंतजार

मृतक के भाई ओमप्रकाश लहरे बताते हैं कि 16 अप्रैल से ही कंपनी की ओर से फोन आने लगे कि “कोरबा आकर चेक ले जाइए.” अपने खर्च पर 80 किलोमीटर दूर कोरबा जाना पड़ा. वहां भी घंटों इंतजार, कागजों की जांच और शाम साढ़े सात बजे जाकर चेक मिला. परिवार का कहना है कि हादसे के पांच दिन बाद तक कोई अधिकारी संवेदना जताने घर नहीं आया.

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दूसरे परिवार कि भी वही कहानी

यही हाल 52 वर्षीय अमृतलाल पटेल के परिवार का भी है, जिनकी मौत मौके पर ही हो गई थी. उनका गांव कांवली हादसे की जगह से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर है. फिर भी उनकी पत्नी दिलेश्वरी पटेल को सदमे की हालत में कोरबा ले जाया गया, क्योंकि कंपनी घर आकर प्रक्रिया करने को तैयार नहीं थी. बेटे चित्रसेन कहते हैं कि हमारी हालत देखकर भी किसी को दया नहीं आई.

‘मजदूर इंसान नहीं, सामान समझे जाते हैं'

गांव वालों का दर्द भी जुबान पर है. अमृतलाल के घर के आंगन में बैठे एक व्यक्ति कहते हैं कि कंपनी वालों के लिए मजदूर इंसान नहीं, सामान हैं. नुकसान हुआ तो कीमत लगा दी, लेकिन दुख बांटने कोई नहीं आया. चित्रसेन हादसे के जिम्मेदार लोगों के लिए कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं, जबकि दर्ज धाराएं ऐसी हैं, जिनमें आसानी से जमानत मिल जाती है.

हादसे का भयावह आंकड़ा

इस धमाके में कुल 35 मजदूर बुरी तरह झुलसे. 19 अप्रैल तक 24 की मौत हो चुकी है. इनमें से 5 छत्तीसगढ़ के थे, जबकि बाकी झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आए मजदूर थे, जो रोज़ी‑रोटी की तलाश में यहां पहुंचे थे.

संवेदना संदेश और जमीनी हकीकत

हादसे के बाद वेदांता समूह के निदेशक अनिल अग्रवाल ने एक संवेदना संदेश जारी किया कि “आपके आंसू मेरे हैं, आपका दर्द मेरा अपना है.” लेकिन जमगहन और कांवली जैसे गांवों में बैठे परिवारों को लगता है कि ये शब्द कागजों तक ही सीमित रह गए.

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