ट्विशा केस में फंदे को लेकर पुलिस की एक और करतूत का खुलासा, एक्सपर्ट बोले, इससे समर्थ-गिरिबाला को मिलेगा सीधा फायदा

ट्विशा शर्मा केस में कटारा हिल्स थाना के सब इंस्पेक्टर दिनेश शर्मा ने लिगेचर यानी फंदा जब्त किया, लेकिन उन्होंने किसी के साइन नहीं लिए, यानी किसने बताया कि यह वही फंदा था, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. क्रिमिनल लॉयर और पुलिस के रिटायर्ड अधिकारी इसे बड़ी चूक मान रहे हैं. उनका कहना है कि इसका सीधा फायदा कोर्ट में आरोपियों को मिलेगा.

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भोपाल ट्विशा शर्मा केस में पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आई.

भोपाल: ट्विशा शर्मा केस में पुलिस की लापरवाही की एक और परल खुलकर सामने आ गई है. यह एक ऐसी चूक है जिससे पूरा केस ही पलट सकता है. पुलिस ने पहले पोस्टमार्टम के लिए भोपाल एम्स के डॉक्टरों को वो फंदा ही नहीं दिया था, जिससे ट्विशा के फांसी लगाने की बात कही जा रही है. वहीं, अब पता चला है कि क्राइम सीन से जो लिगेचर यानी फंदा पुलिस ने जब्त किया था, उसकी निशानदेही ही नहीं करवाई गई. इसका मतलब यह है कि पुलिस ने सबूत तो उठा लिया, लेकिन किसने बताया कि यह वही फंदा था, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. अब सवाल उठ रहा है कि यह सीधे-सीधे आरोपी पक्ष को कोर्ट में फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर की गई करतूत है या फिर एक और लापरवाही.  

दरअसल, ट्विशा शर्मा की 12 मई को संदिग्ध मौत के बाद से भोपाल पुलिस की जांच शुरू से ही सवालों के घेरे में है. पहले  FIR में देरी, सबूत जब्ती में चूक और समर्थ की फरारी. सब बार-बार पुलिस की लापरवाही या साजिश को लेकर सवाल उठा रही हैं. यही कारण रहा कि केस की जांच SIT के बाद CBI को सौंपनी पड़ी. सीबीआई मामले की जांच कर रही है और समर्थ और गिरिबाला सिंह जेल में हैं.  

13 मई 2026 को क्या हुआ? 

सूत्रों के अनुसार, 13 मई 2026 को कटारा हिल्स थाना पुलिस ने ट्विशा के कमरे से तीन बार सामान जब्त किया. दो बार समर्थ और गिरिबाला के साइन लिए गए. लेकिन, सब इंस्पेक्टर दिनेश शर्मा ने सुबह 9 बजकर 42 मिनट पर लिगेचर यानी फंदा जब्त किया था. इस पर किसी के साइन नहीं लिए गए. हैरान करने वाली बात यह भी है कि FSL यानी फॉरेंसिक की टीम मौके पर दो घंटे बाद 11:30 बजे पहुंची. इससे साफ है कि फॉरेंसिक जांच से पहले ही सबूत उठा लिया गया. कानूनी के अनुसार, जब्ती के वक्त ये दर्ज करना जरूरी होता है कि निशानदेही किसने की, लेकिन दस्तावेजों में यह कॉलम खाली है. न गवाह का नाम, न आरोपी का और न ही परिवार का. 

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पुलिस की लापरवाही का फायद कोर्ट में आरोपियों को मिलेगा 

रिटायर्ड पुलिस अधिकारी भूपेंद्र सिंह ने NDTV से बात करते हुए बताया कि 'BNS के तहत जब्ती मेमो में निशानदेही लिखना अनिवार्य है. अगर यह नहीं लिखा तो कोर्ट में वो सबूत एडमिसिबल नहीं माना जाता है, पुलिस की ओर से ये बहुत बड़ी चूक है.

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लिगेचर के बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी अधूरी रह जाती है. डॉक्टर फंदे के निशान और लिगेचर का मिलान नहीं कर पाते. इसका सीधा फायदा आरोपी पक्ष को कोर्ट में मिलता है. बचाव पक्ष आसानी से कह सकता है, पुलिस ने फंदा प्लांट किया है'. 

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क्रिमिनल लॉयर बोले- ये लापरवाही नहीं अपराध 

भोपाल के क्रिमिनल लॉयर अंकुर पांडेय ने NDTV से कहा- 'कोर्ट में प्रॉसिक्यूशन का केस इसी पॉइंट पर धराशायी हो जाएगा. पुलिस ने खुद अपने केस की कब्र खोद दी है. इस एक चूक से पूरा केस पलट सकता है. आरोपी बरी हो सकते हैं. ये लापरवाही नहीं, अपराध है'. 

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