सतना: सिस्टम के 'कुपोषण' से हारी चार महीने की प्रियांशी, जुड़वां भाई अस्पताल में लड़ रहा जिंदगी की जंग

MP Malnutrition Crisis: मध्य प्रदेश के सतना जिले में कुपोषण की दर्दनाक सच्चाई सामने आई है, जहाँ मजगवां ब्लॉक के सुरंगी गांव में चार महीने की मासूम प्रियांशी की मौत हो गई और उसका जुड़वां भाई अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहा है. प्रशासन के दावों के विपरीत, कागजों पर पोषण ट्रैकर और टीकाकरण के बावजूद मासूमों को समय पर मदद नहीं मिली. कलेक्टर की जांच के बाद तीन कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई है

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  • सतना जिले में 4 महीने की मासूम सुप्रियांशी की कुपोषण के कारण मौत हो गई जबकि जुड़वां भाई नैतिक गंभीर स्थिति में
  • सुप्रियांशी और नैतिक का जन्म कम वजन के साथ हुआ था और चार महीने की उम्र में भी उनका वजन सामान्य से आधा था
  • बच्चों को मां के स्तनपान न कर पाने के कारण गाय और बकरी का दूध दिया गया जो उनके लिए हानिकारक साबित हुआ
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 Satna Infant Death: मध्य प्रदेश के सतना जिले में चार महीने की मासूम बच्ची की कथित तौर पर कुपोषण से मौत हो गई, जबकि उसका जुड़वां भाई अब भी जिंदगी के लिए जूझ रहा है. मझगवां ब्लॉक के सुरंगी गांव में हुई इस घटना ने जमीनी स्वास्थ्य व्यवस्था और पोषण तंत्र की पोल खोल दी है.मृत बच्ची सुप्रियांशी (प्रियंशी) और उसके भाई नैतिक का जन्म 21 दिसंबर 2025 को मझगवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुआ था. जन्म के समय ही दोनों का वजन बेहद कम था 2.0 किलो और 1.90 किलो. सामान्य तौर पर चार महीने के बच्चे का वजन 4 से 5 किलो होना चाहिए, लेकिन भर्ती के समय नैतिक का वजन मात्र 2.93 किलो और सुप्रियांशी का 2.86 किलो था. दोनों को गंभीर कुपोषण (SAM) श्रेणी में पाया गया था.

जन्म से ही था कम वजन, सिस्टम रहा बेखबर

सुप्रियांशी और नैतिक का जन्म 21 दिसंबर 2025 को मझगवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुआ था. जन्म के समय सुप्रियांशी का वजन 2.0 किलो और नैतिक का 1.90 किलो था. नियमानुसार चार महीने की उम्र तक बच्चों का वजन कम से कम 4 से 5 किलो होना चाहिए था, लेकिन भर्ती के समय सुप्रियांशी का वजन मात्र 2.86 किलो और नैतिक का 2.93 किलो पाया गया. दोनों ही बच्चे गंभीर कुपोषण (SAM) की श्रेणी में थे. मां विमला प्रजापति शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण स्तनपान नहीं करा पा रही थीं, जिसके चलते बच्चों को गाय और बकरी का दूध दिया जा रहा था, जो उनके लिए जानलेवा साबित हुआ.

झोलाछाप डॉक्टर और रेफरल का फेर

बीते 15 दिनों से दोनों बच्चे उल्टी, दस्त और बुखार से जूझ रहे थे. परिवार उन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय जुगुलपुर के एक झोलाछाप डॉक्टर के पास ले जाता रहा. जब हालत बहुत बिगड़ गई, तब 21 अप्रैल को उन्हें मझगवां सीएचसी लाया गया, जहां से उन्हें जिला अस्पताल रेफर किया गया. पीआईसीयू में इलाज के दौरान 22 अप्रैल को सुप्रियांशी की हालत बिगड़ी और रीवा रेफर करने से पहले ही उसकी मौत हो गई.

परिजनों के गंभीर आरोप: 'क्या छिपाना चाहता है प्रशासन?'

मृत बच्ची के मामा ललित चक्रवर्ती ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि मौत के बाद बच्ची के शव को गांव क्यों नहीं ले जाया गया? परिजनों का आरोप है कि रास्ते में ही शव को दफनाना दिया गया ताकि लापरवाही को छिपाया जा सके. परिवार का कहना है कि टीकाकरण के अलावा उन्हें आंगनबाड़ी या आशा कार्यकर्ता से कोई मदद या सलाह नहीं मिली, जबकि कागजों में बच्चों का नाम 'पोषण ट्रैकर' में दर्ज था.
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लापरवाही पर गिरी गाज, तीन पर कार्रवाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस के निर्देश पर जांच शुरू की गई है. मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज शुक्ला और जिला कार्यक्रम अधिकारी राजीव सिंह की रिपोर्ट के आधार पर महिला बाल विकास की पर्यवेक्षक करुणा पाण्डेय और एएनएम विद्या चक्रवर्ती के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई है. साथ ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पूजा पाण्डेय की सेवा समाप्ति का नोटिस जारी किया गया है. प्रशासन ने उन झोलाछाप डॉक्टरों पर भी कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं जिन्होंने बच्चों का गलत इलाज किया.
 

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मध्य प्रदेश: कुपोषण का 'रेड जोन'  

मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति डराने वाली है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 55 में से 45 जिले 'रेड जोन' में हैं. यहां 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें 1.36 लाख गंभीर श्रेणी में आते हैं. प्रदेश का कुपोषण प्रतिशत 7.79% है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. इस त्रासदी के पीछे 858 करोड़ रुपये के उस पोषण आहार घोटाले की छाया भी है, जिसका खुलासा 2022 में हुआ था. कागजों पर गंभीर कुपोषित बच्चे पर रोजाना 12 रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में सुरंगी गांव जैसी घटनाएं व्यवस्था को बेनकाब कर रही हैं.

आंकड़ों में 'ऑल इज वेल', हकीकत में मौत का तांडव

हैरानी की बात यह है कि जिला कार्यक्रम अधिकारी राजीव सिंह अब भी दावा कर रहे हैं कि बच्चों का नाम पोषण ट्रैकर में था और उन्हें टेक-होम राशन दिया गया था. लेकिन सवाल यही है कि अगर राशन और निगरानी मौजूद थी, तो बच्चे गंभीर कुपोषण की स्थिति तक कैसे पहुंचे? सतना जिले में पिछले छह महीनों में कुपोषण से यह तीसरी मौत है. इससे पहले महतैन गांव की भारती और नयागांव के हुसैन रजा की जान भी इसी सिस्टम की भेंट चढ़ चुकी है.
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