Ganpati Surrender: माओवादियों का वह नेता जिसे सुरक्षा एजेंसियां कभी तलाश नहीं कर पाईं; अब सरेंडर की चर्चा तेज

Naxal Leader Ganpati Surrender News: माओवादी संगठन के वरिष्ठ नेता मुप्पाला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति के आत्मसमर्पण की चर्चा तेज है. 77 वर्षीय गणपति दशकों से सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर रहे हैं.

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Ganpati Surrender: माओवादियों का वह नेता जिसे सुरक्षा एजेंसियां कभी तलाश नहीं कर पाईं; अब सरेंडर की चर्चा तेज

Ganpati Surrender News: देश से नक्सल-माओवादी समस्या के समाधान के लिए तय की गई समयसीमा जितनी नजदीक आ रही है, उतनी ही तेजी से माओवादी संगठनों के शीर्ष नेताओं के आत्मसमर्पण (Maoist Surrender Update) की चर्चाएं तेज होती जा रही हैं. इन्हीं चर्चाओं के केंद्र में हैं माओवादी संगठन के सबसे वरिष्ठ नेता और रणनीतिकार मुप्पाला लक्ष्मण राव (Muppala Laxman Rao) उर्फ गणपति (Ganpati), जिनके तेलंगाना में आत्मसमर्पण करने की खबरें सोशल और स्थानीय स्तर पर जोर पकड़ रही हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर अब तक इसकी पुष्टि किसी भी एजेंसी ने नहीं की है.

Ganpati Surrender News: गणपति के सरेंडर की चर्चाएं तेज

पचास वर्षों से अधिक समय से अंडर ग्राउंड लाइफ

करीब 77 वर्षीय गणपति भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए दशकों से सबसे बड़ी पहेली बने हुए हैं. करीब 50 साल से अधिक समय तक वे भूमिगत रहे और इस दौरान देशभर की सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार अभियान चलाकर उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वे हमेशा गिरफ्त से बाहर रहे. एजेंसियों के पास गणपति की जो अंतिम तस्वीर उपलब्ध है, वह लगभग 40 साल पुरानी है. इतनी लंबी भूमिगत गतिविधियों के कारण उनकी वर्तमान शक्ल-सूरत, ठिकाना और नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियों में आज भी संशय बना हुआ है.

Ganpati Surrender News: गणपति के सरेंडर की चर्चाएं तेज

1948 में जन्म, शिक्षक से बने माओवादी आंदोलन के रणनीतिकार

गणपति के जन्म वर्ष को लेकर आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि साल 1948 में अविभाजित आंध्र प्रदेश के करीमनगर जिले में उनका जन्म हुआ था. पढ़ाई में ठीक-ठाक रहे गणपति ने शिक्षक की नौकरी छोड़ी और उच्च शिक्षा के लिए वारंगल चले गए. इसी दौरान नक्सलबाड़ी आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में फैल रहा था और यह आंदोलन धीरे-धीरे माओवादी विचारधारा की दिशा में रूपांतरित हो रहा था. वारंगल में गणपति की मुलाकात पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) के संस्थापक और उस समय के महासचिव कोंडापल्ली सीतारमैया से हुई. गणपति की रणनीति, संगठन क्षमता और विज़न को देखते हुए उन्हें 1993–94 में PWG का महासचिव बना दिया गया.

देश में माओवादी घटनाओं का प्रमुख ‘राजनीतिक दिमाग'

सूत्रों और सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े जानकारों के अनुसार 1993 से 2015 के बीच देश में जितनी बड़ी माओवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया, उनमें गणपति एक प्रमुख रणनीतिक और राजनीतिक चेहरे के तौर पर जुड़े रहे. साल 2004 में CPI (माओवादी) का गठन हुआ, जब माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) और PWG का विलय हुआ. इस विलय के बाद गणपति को नवगठित संगठन का पहला महासचिव चुना गया.

राष्ट्रीय कांग्रेस और नेतृत्व परिवर्तन की कहानी

माओवादी गतिविधियों को करीब से ट्रैक करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, अंतिम बार माओवादियों की राष्ट्रीय कांग्रेस वर्ष 2007 में आयोजित की गई थी. इसके बाद कभी भी ओपन रूप से कांग्रेस होने की पुष्टि नहीं हुई. हालांकि सूत्र बताते हैं कि 2017–18 में संगठन ने गुप्त रूप से एक कांग्रेस आयोजित की थी, जिसमें गणपति की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें महासचिव पद से हटाकर मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया गया. इसके बाद नंबल्ला केशव राव उर्फ बसवा राजू को संगठन का नया महासचिव बनाया गया. नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी गणपति की मौजूदगी, गतिविधियों और भूमिका को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के पास कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी.

साढ़े तीन करोड़ का इनाम और आत्मसमर्पण की चर्चा

वर्षों की खोज के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों को गणपति के ठिकाने का कोई ठोस सुराग नहीं मिला. केंद्र और अलग-अलग राज्य सरकारों ने मिलकर उन पर करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए का इनाम घोषित कर रखा है. अब जब उनके संभावित आत्मसमर्पण को लेकर चर्चाएं तेज हैं, सुरक्षा एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं, क्योंकि न तो वे हालिया तस्वीरों से परिचित हैं और न ही यह स्पष्ट है कि गणपति किस स्वास्थ्य स्थिति में हैं.

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