Bhojshala Case: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर दिया गया फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास के महत्वपूर्ण निर्णयों में गिना जा रहा है. 242 पन्नों के इस विस्तृत फैसले में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट, ऐतिहासिक अभिलेखों, पुरातात्विक साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि धार स्थित यह विवादित परिसर मूल रूप से देवी वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर और एक शिक्षण केंद्र था. अदालत ने माना कि वर्तमान ढांचा मंदिर को तोड़कर और उसके अवशेषों का उपयोग करके बनाया गया. फैसले में एएसआई की रिपोर्ट के दस प्रमुख निष्कर्षों को निर्णायक माना गया, जिनसे यह साबित होता है कि इस स्थल का मूल स्वरूप एक मंदिर था. आइए विस्तार से जानते हैं वे 10 बड़े आधार, जिन पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया.
1. पहले से मौजूद मंदिर संरचना के स्पष्ट प्रमाण
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह माना कि एएसआई द्वारा किए गए सर्वे में यह स्पष्ट पाया गया कि वर्तमान ढांचा किसी पहले से मौजूद मंदिर के अवशेषों पर निर्मित किया गया है. मिट्टी के भीतर और संरचना के नीचे मिले पत्थरों, शिलालेखों और निर्माण शैली से यह साबित हुआ कि यहां पहले एक अलग और विकसित धार्मिक संरचना मौजूद थी. कोर्ट ने कहा कि यह निष्कर्ष किसी अनुमान पर नहीं बल्कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण, खुदाई और संरचनात्मक विश्लेषण पर आधारित है.
Bhojshala Case: वाग्देवी की मूर्ति
2. परमार काल (10वीं-11वीं सदी) से जुड़ी वास्तुकला
एएसआई की रिपोर्ट में पाए गए स्तंभ, खंभे, बीम और नक्काशी की शैली परमार काल की विशिष्ट पहचान से मेल खाती है. कोर्ट ने माना कि यह समय वही था जब राजा भोज मालवा क्षेत्र पर शासन करते थे और धार उनकी राजधानी थी. ऐसे में यह निष्कर्ष और मजबूत होता है कि यह स्थल उसी काल में निर्मित एक महत्वपूर्ण धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र था.
Bhojshala Case: भोजशाला पर कोर्ट का अहम फैसला ऐसे आया
3. संस्कृत-प्राकृत शिलालेख और धार्मिक मंत्र
स्थल से मिले शिलालेखों में संस्कृत और प्राकृत भाषा का उपयोग पाया गया, जिनमें “ॐ सरस्वत्यै नमः” और “ॐ नमः शिवाय” जैसे मंत्र अंकित हैं. कोर्ट ने इस बात को अहम मानते हुए कहा कि ये शिलालेख इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि यह स्थल हिंदू धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है. साथ ही, यह भी पाया गया कि ये शिलालेख अरबी-फारसी शिलालेखों से पहले के हैं.
4. देवी-देवताओं की मूर्तियों और आकृतियों के अवशेष
एएसआई रिपोर्ट में कई देवी-देवताओं की मूर्तियों और आकृतियों के निशान मिले, जिनमें गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव और अन्य प्रतीक शामिल हैं. कोर्ट ने कहा कि इन मूर्तियों को बाद में जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया, ताकि उनका धार्मिक स्वरूप बदला जा सके. यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि मूल संरचना मंदिर थी.
5. मंदिर के अवशेषों से बनी वर्तमान संरचना
एएसआई ने पाया कि मौजूदा भवन में मंदिर के पत्थरों और निर्माण सामग्री का पुनः उपयोग किया गया है. वास्तुशिल्प में असंतुलन, अलग-अलग शैली और खंडित मूर्तियों की उपस्थिति इस बात को साबित करती है कि यह संरचना मूल रूप से डिजाइन नहीं की गई, बल्कि पहले के मंदिर के अवशेषों से तैयार की गई.
6. सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र होने के ऐतिहासिक प्रमाण
अदालत ने कई ऐतिहासिक दस्तावेजों जैसे ‘इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया' और अन्य ब्रिटिशकालीन अभिलेखों आदि का उल्लेख किया, जिनमें इसे ‘राजा भोज का स्कूल' बताया गया है. इससे यह स्थापित होता है कि यह केवल धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि संस्कृत शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र भी था.
Bhojshala Case: यहां स्थापित थी प्रतिमा
7. खुदाई में मिले मंदिर से जुड़े अवशेष
1972-73 के पुरातात्विक सर्वे में मंदिर वास्तुकला के टुकड़े, मिट्टी के बर्तन, लोहे के उपकरण और भगवान विष्णु की मूर्ति के अवशेष मिले. इन निष्कर्षों ने अदालत के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि यहां पहले एक व्यवस्थित धार्मिक परिसर मौजूद था.
8. वक्फ संपत्ति का कोई प्रमाण नहीं
कोर्ट ने साफ कहा कि मुस्लिम पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि यह जमीन वक्फ संपत्ति है. इस्लामी कानून के तहत वक्फ के लिए संपत्ति का समर्पण अनिवार्य होता है, लेकिन ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया. इससे मस्जिद होने का दावा कमजोर पड़ा.
9. 1935 का ऐलान कोर्ट ने किया अमान्य
धार रियासत के 1935 के ऐलान को कोर्ट ने सिर्फ प्रशासनिक आदेश मानते हुए कानूनी रूप से बाध्यकारी न मानने का निर्णय दिया. अदालत ने कहा कि यह आदेश ऐतिहासिक साक्ष्यों और संविधान के अनुरूप नहीं है, इसलिए इसे आधार नहीं बनाया जा सकता.
10. मूर्तियों और प्रतीकों से धार्मिक पहचान स्पष्ट
ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखी मूर्तियों और स्थल पर मिले अवशेषों में देवी सरस्वती, गणेश और दुर्गा जैसी आकृतियों की उपस्थिति पाई गई. कोर्ट ने माना कि ये सभी प्रतीक हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़े हैं और इस स्थल की मूल पहचान को स्पष्ट करते हैं.
पूजा पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि समय के साथ नियमों के तहत यहां हिंदू पूजा की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. Places of Worship Act लागू नहीं. अदालत ने स्पष्ट किया कि 1991 का कानून इस मामले पर लागू नहीं होगा, क्योंकि यह संरक्षित स्मारक है. ASI का 2003 आदेश निरस्त करते हुए कोर्ट ने 2003 में जारी उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें पूजा और नमाज के सीमित अधिकार तय किए गए थे.
संतुलन बनाए रखने के लिए कोर्ट का निर्देश
हाईकोर्ट ने संतुलन बनाए रखते हुए कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे तो राज्य सरकार उन्हें मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक जमीन आवंटित कर सकती है. इससे दोनों समुदायों के अधिकारों को ध्यान में रखने की कोशिश की गई.
यह भी पढ़ें : 'हिंदू-मुस्लिम मुद्दे को उभारना ठीक नहीं', भोजशाला केस में HC के फैसले पर दिग्विजय सिंह ने पकड़ी अलग लाइन
यह भी पढ़ें : भोजशाला फैसले के बाद शहर काजी ने कहा- हाईकोर्ट का सम्मान, सुप्रीम कोर्ट में करेंगे अपील
यह भी पढ़ें : राम मंदिर अयोध्या की तरह क्या धार भोजशाला मामले में भी मस्जिद के लिए मिलेगी जमीन? जानिए वकील ने क्या कहा
यह भी पढ़ें : टी20 वर्ल्ड कप से पहले महाकाल के दरबार पहुंची भारतीय महिला टीम, भस्म आरती में लिया आशीर्वाद














