Mujhe Kyu Padhe (Book Review) : दोस्तो, मैं हूं अभय मिश्र और गंगा के साथ मेरा रिश्ता सिर्फ एक राइटर का नहीं है, बल्कि उस इंसान का है जिसने इसकी लहरों के बीच अपनी सोच को ढाला है. मैंने चार बार गंगा की पूरी यात्रा की है और जो कुछ भी मैंने करीब से देखा और महसूस किया, वही सब विहंगम के पन्नों में सिमटा है.
सच कहूं तो जब मैं गंगा किनारे घूमता हूं, तो एक बात मुझे काफी परेशान करती है. नदी के एक बहुत बड़े हिस्से से वे पुराने लोक गीत अब पूरी तरह गायब हो चुके हैं. लोगों की बातचीत में अब वह पहले वाली मिठास नहीं रही, बल्कि एक अजीब सी अक्खड़ता आ गई है. मैं अक्सर सोचता हूं कि मछुआरों की वे बस्तियां कैसी रही होंगी जिन्हें बार बार उजाड़ा गया. एक बहुत ही क्रेजी सा कनेक्शन दिखा मुझे यहां, कि मछुआरे जितनी बार शिफ्ट हुए, नदी भी मानो उनके पीछे पीछे अपना रास्ता बदलती रही. यह सिर्फ ज्योग्राफी नहीं है, यह एक बहुत ही डीप कल्चरल बॉन्डिंग है.
नदी मेरे लिए सिर्फ बहता हुआ पानी या कोई वॉटर बॉडी नहीं है, बल्कि वह उस सिविलाइजेशन की धुरी है जिस पर हम सब टिके हैं. हिस्ट्री गवाह है कि जब भी नदियां सूखीं या उन्होंने अपना रास्ता बदला, पूरी की पूरी सभ्यताएं खत्म हो गईं. विहंगम में मैंने गंगा के इसी भूगोल को उसके सांस्कृतिक इतिहास के साथ जोड़ने की कोशिश की है. चाहे वह अक्षय वट की गवाही हो या कुंभ का इतना भव्य होना, ये सिर्फ इवेंट्स नहीं हैं बल्कि इंडिया के बनने की रियल स्टोरीज हैं. मैंने अखाड़ों के बनने और वक्त के साथ उनके अपने असली रास्ते से भटक जाने के दर्द को भी बहुत करीब से महसूस किया है.
आज के दौर में गंगा को एक बड़े इवेंट में बदल दिया गया है. पॉलिटिक्स ने इसे दिखावे के आयोजनों में तो समेट दिया, लेकिन इसके जो असली सवाल हैं, जैसे कि इसका फ्लो, इसका इकोसिस्टम और इसके किनारे रहने वाले लोगों की लाइफ, वे आज भी इग्नोर किए जा रहे हैं. मेरा मानना है कि अविरलता यानी नदी का लगातार बहना ही उसकी सफाई की पहली शर्त है. अगर नदी बहेगी ही नहीं, तो वह खुद को साफ करने की ताकत खो देगी. ऐसे में सिर्फ घाटों को ऊपर से चमका देना एक बहुत बड़े धोखे से ज्यादा कुछ नहीं है.
अपनी यात्राओं के दौरान मैंने देखा कि उत्तराखंड में लोग अंतिम संस्कार जैसे कामों के लिए बांधों से छोड़ी गई एक पतली सी धारा पर डिपेंड हैं. वहां लोग उस ठहरे हुए पानी को ही भगवान मान लेने के लिए मजबूर हैं. वहीं बिहार की तरफ जाएं तो नदी का कटाव इतना खतरनाक है कि पानी बहुत नीचे चला गया है. जहां कभी मछलियों के ठिकाने थे, वहां अब उन ऊंची मिट्टी की दीवारों पर पक्षियों ने अपने घर बना लिए हैं. नेचर अपना बैलेंस खुद सेट कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इसे समझ पा रहे हैं.
विहंगम लिखने का मेरा मकसद सिर्फ कमियां निकालना नहीं था. मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि क्या हम सच में इस नदी की रिस्पेक्ट करते हैं. क्या श्रद्धा के नाम पर इसमें गंदगी डालना हमारी रिस्पेक्ट है. विहंगम एक वार्निंग भी है और एक इनविटेशन भी. अगर नदियां बदल गईं, तो मान लीजिए कि हमारा कल्चर और हमारी सोसाइटी भी वैसी नहीं बचेगी जैसी सदियों से रही है. रामबहादुर राय जी ने इसे हमारे समय का एक बहुत जरूरी डॉक्यूमेंट कहा है. मैं चाहता हूं कि आप इसे जरूर पढ़ें ताकि हम अपनी नदियों के साथ अपने टूटते हुए रिश्तों को फिर से जिंदा कर सकें.














