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क्यों क्रश के सामने आते ही नर्वस हो जाते हैं आप? जानिए इसके पीछे की साइकोलॉजी

क्रश के सामने नर्वस होने और अनजान लोगों के साथ कॉन्फिडेंट फील करने के पीछे डोपामाइन हार्मोन जिम्मेदार होता है. तो आइए समझते हैं डोपामाइन हार्मोन कैसे काम करता है. 

क्यों क्रश के सामने आते ही नर्वस हो जाते हैं आप? जानिए इसके पीछे की साइकोलॉजी
क्यों क्रश के सामने आते ही नर्वस हो जाते हैं आप?
  • जब किसी पर क्रश होता है तो दिमाग हाई अलर्ट मोड में चला जाता है और हम अपने व्यवहार को लेकर चिंतित हो जाते हैं
  • क्रश के समय दिमाग में डोपामाइन हार्मोन बढ़ जाता है जो खुशी और मोटिवेशन की भावना पैदा करता है
  • इमोशनल अटैचमेंट होने पर उम्मीदें बढ़ती हैं जिससे प्रेशर और चिंता की स्थिति बनती है
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Crush Ko Dekhte Hi Nervous Kyu Ho Jate Hai: क्या आपने भी कभी ये महसूस किया है कि जब भी आप अपने क्रश के साथ होते हैं तो काफी ज्यादा नर्वस महसूस करते हैं और आपकी दिल की धड़कन तेजी से भागने लगती हैं, हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं और बोलते वक्त आत्मविश्वास कम हो जाता है. वहीं, उसी इंसान से जब कोई इमोशनल अटैचमेंट नहीं होता, तो हम बिल्कुल रिलैक्स, नॉर्मल और कॉन्फिडेंट रहते हैं. इसका कारण सिर्फ शर्म या झिझक नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरी साइकोलॉजिकल वजहें छिपी होती हैं.

साइकोलॉजी के मुताबिक, जब हमें किसी पर क्रश होता है, तो हमारा दिमाग “हाई अलर्ट मोड” में चला जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि उस इंसान के साथ हमें आगे क्या होगा या क्या नतीजा निकलेगा इसकी परवाह होती है.  हम चाहते हैं कि वे हमें पसंद करें, स्वीकार करें और रिजेक्ट न करें. इसी सोच के चलते दिमाग लगातार यह एनालिसिस करता रहता है कि हम क्या बोलें, कैसे दिखें और कैसा बर्ताव करें.

डोपामाइन का है सारा खेल

क्रश के दौरान दिमाग में डोपामाइन नाम का केमिकल बढ़ जाता है. यह वही हार्मोन है जो हमें अच्छा महसूस कराता है, मोटिवेशन देता है और सामने वाले को “स्पेशल” बना देता है. लेकिन इसके साथ ही रिजेक्शन का डर भी जुड़ा होता है. यह डर एंग्जायटी और सेल्फ-कॉन्शसनेस को एक्टिवेट करता है, जिससे इंसान ओवरथिंक करने लगता है और खुद पर शक करने लगता है.

जब इमोशनल अटैचमेंट होता है, तो उम्मीद भी बढ़ती है. यही उम्मीद धीरे-धीरे प्रेशर बन जाती है. दिमाग बार-बार सोचता है कि अगर बात बिगड़ गई तो क्या होगा. यही वजह है कि अटैचमेंट अवेयरनेस पैदा करता है और उम्मीद से एंग्जायटी बढ़ती है.
 

इसके उलट, जब किसी से इमोशनल अटैचमेंट नहीं होता, तो मैनेज करने की कोई ज़रूरत नहीं होती. न रिजेक्शन का डर होता है न किसी रिजल्ट की चिंता. ऐसे में नर्वस सिस्टम रिलैक्स रहता है, इंसान ज़्यादा ऑथेंटिक महसूस करता है और उसका कॉन्फिडेंस अपने आप बाहर आता है. इसलिए कई बार हम अनजान लोगों से ज्यादा सहज और खुले होकर बात कर पाते हैं.

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