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क्या मेनोपॉज की वजह से टूट रही हैं शादियां? जानिए क्या है 'मेनो-डिवोर्स’ और क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

मेनोपॉज के दौरान कई महिलाएं अपने शादीशुदा रिश्तों और भविष्य को लेकर दोबारा सोचने लगती हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, इसके पीछे सिर्फ हार्मोनल बदलाव नहीं बल्कि भावनात्मक जरूरतें, आर्थिक आजादी और रिश्तों में पहले से मौजूद परेशानियां भी बड़ी वजह हैं. जानिए क्या है 'मेनो-डिवोर्स.'

क्या मेनोपॉज की वजह से टूट रही हैं शादियां? जानिए क्या है 'मेनो-डिवोर्स’ और क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
मेनो-डिवोर्स क्या होता है?
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जिस प्रकार पीरियड्स का आना, बच्चे पैदा करना आदि महिलाओं के जीवन में आने वाले कुछ फेज हैं वैसे ही मेनोपॉज भी एक फेज होता है. इस दौरान महिलाओं के शरीर में कई बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं. मेनोपॉज होने पर महिलाओं को पीरियड्स आना बंद हो जाते हैं. इस दौरान महिलाओं में नींद की कमी आदि समस्याएं देखने को मिलती है. लेकिन हाल ही के कुछ सालों में मेनोपॉज से जुड़ा एक शब्द काफी तेजी से चर्चा में आ रहा है और वो है मेनो-डिवोर्स. यह शब्द तब इस्तेमाल किया जाता है  जब प्री-मेनोपॉज या मेनोपॉज के दौरान महिलाएं अपने वैवाहिक रिश्तों पर दोबारा से सोचने लगती हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि महिलाओं में इस तरह के ख्याल आने के लिए सिर्फ हार्मोन ही जिम्मेदार नहीं होते बल्कि उनकी मानसिक, सामाजिक और फाइनेंशियल कंडीशन पर बराबर जिम्मेदार होती है जिस कारण वह इस तरह के फैसले लेती हैं.

क्या सिर्फ हार्मोनल बदलाव हैं इसकी वजह?

रिलेशनशिप थेरेपिस्ट्स के अनुसार, 45 से 55 वर्ष की उम्र की कई महिलाएं यह महसूस करने लगती हैं कि अब वे अपनी जरूरतों और इच्छाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहतीं. सालों तक परिवार और बच्चों को प्रायोरिटी देने के बाद वे अपने शादीशुदा रिश्ते पर दोबारा विचार करने लगती हैं. इसी फ्रीक्वेंसी को अब 'मेनो-डिवोर्स' के नाम से जाना जा रहा है.

मेनोपॉज के दौरान महिलाएं क्यों करती हैं रिश्तों पर दोबारा विचार?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन में बदलाव जरूर होते हैं, जिनका असर मूड, नींद, धैर्य, चिंता और यौन इच्छा पर पड़ सकता है. इससे महिलाओं की इमोशनल सहनशक्ति कम हो सकती है, लेकिन सिर्फ हार्मोन किसी खुशहाल शादी को नहीं तोड़ते. बल्कि वे पहले से मौजूद रिश्तों की समस्याओं को और साफ कर देते हैं.

रिलेशनशिप काउंसलर्स का मानना है कि मेनोपॉज का समय महिलाओं के लिए खुद के बारे में सोचने का समय होता है. जब बच्चे बड़े होकर इनडिपेंडेंट हो जाते हैं और घर की जिम्मेदारियां कुछ कम होने लगती हैं, तब कई महिलाएं खुद से सवाल पूछती हैं कि क्या वे आने वाली जिंदगी भी उसी तरह बिताना चाहती हैं या बदलाव की जरूरत है.

आर्थिक आजादी ने बदली महिलाओं की सोच

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आज की महिलाओं के पास एक ऐसी चीज है, जो पिछली पीढ़ियों के पास अक्सर नहीं थी, और वह है चुनाव की आजादी. फाइनेंशियल आजादी और समाज की बदलती सोच ने महिलाओं को यह भरोसा दिया है कि अगर कोई रिश्ता लगातार खराब या स्ट्रेस का कारण बन रहा है, तो वे उस पर दोबारा विचार कर सकती हैं.

एक-दूसरे का साथ हो तो आसान हो सकता है यह फेज

कई एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि मेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को अपने पुराने  दर्द, परिवार वालों की ओर से कही गई कुछ बातें भी याद आने लगती हैं. इस कंडीशन में अगर पति-पत्नी के बीच इमोशनल दूरी है तो यह स्थिति और भी ज्यादा खराब हो सकती है. लेकिन अगर कपल के बीच प्यार, इज्जत जैसी चीजें हैं तो इस फेज को आसानी से पार किया जा सकता है.

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