इस्लाम धर्म में ये माना जाता है कि बच्चों की परवरिश करना अल्लाह का दिया एक काम है. बच्चे ईश्वर की ओर से सौंपे गए एक अमानत है, जिसे माता-पिता को संवारना है. इस्लामी परंपरा में बच्चों की परवरिश (Parenting) के '7–7–7 मॉडल' पर जोर दिया जाता है. इसका श्रेय आम तौर पर अली इब्न अबी तालिब (RA) को दिया जाता है. इस मॉडल को कुरान, सुन्नत और मानवीय मनोविज्ञान के पूरी तरह से अनुरूप माना गया है.
आइए जानते हैं कि ये '7–7–7 मॉडल' क्या है और किस तरह के बच्चों की परवरिश के लिए ये एक आइडियल मॉडल माना जाता है.
'7–7–7 मॉडल' क्या है?
एक इस्लामिक वेबसाइट पर इसका जिक्र किया गया कि तरह परवरिश का यह मॉडल बच्चों को एक बेहतर इंसान बना सकता है. हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देना चाहते हैं, लेकिन सही तरीका क्या है? इस्लाम में बच्चों की परवरिश के लिए एक खास ‘7–7–7 मॉडल' बताया गया है, जो 0 से 21 साल तक बच्चे के हर स्टेज को समझाता है…
बच्चों की परवरिश के 3 स्टेज
वैसे तो यह मॉडल सामन्य तौर पर भी खूब अपनाया जाता है, लेकिन कई वेबसाइट इसके इस्लामिक होने का दावा करती हैं. al-islam.org पर भी इस मॉडल का जिक्र किया गया है. और बताया गया है कि कैसे बच्चे के विकास को अलग-अलग स्टेज में बांटना है, जिनमें से हर एक के लिए बच्चों की परवरिश का एक अलग तरीका जरूरी होता है:
उम्र 0–7: प्यार, खेल-कूद, सुरक्षा.
उम्र 7–14: डिसिप्लीन, लर्निंग, कैरेक्टर मेकिंग
उम्र 14–21: दोस्ती, भरोसा, जिम्मेदारी
इसका मतलब है कि हर 7 साल में पेरेंटिंग बदलनी चाहिए.
अपने बच्चे के साथ सात साल तक खेलें, अगले सात साल तक उसे अनुशासन सिखाएं और बाकी के सात साल तक उनके दोस्त बनें. यह अर्थ इस्लामी शिक्षाशास्त्र और 'अदब' से जुड़ी किताबों में मिलता है.
पहला स्टेज (0–7 साल)– प्यार और सुरक्षा
इस स्टेज में पेरेंट्स का काम पालन-पोषण करने वाला और एक रक्षक का होता है. इस उम्र में बच्चों को जुड़ाव, विश्वास, खुशी और सुरक्षा की जरूरत होती है.
इस स्टेज में बच्चे के साथ खेलें. उसे समय दें. दुलारें और उसे सुरक्षित महसूस कराएं. उन्हें इबादत करनी सिखाएं और ईश्वर से जुड़ाव महसूस कराएं.
दूसरा स्टेज (7–14 साल) – अनुशासन और शिक्षा
7 से 14 साल के बीच माता-पिता की भूमिका एक टीचर, मेंटर और अनुशासन सिखाने वाले गुरु की होनी चाहिए. इस उम्र में बच्चों को डिसिप्लिन सीखाना जरूरी होता है. उन्हें सीमाएं और नैतिक आधार बताया जाना चाहिए.
पेरेंट के तौर पर आप बच्चे को इस उम्र में सही और गलत में अंतर समझाएं. उन्हें इबादत करना सिखाएं. इस उम्र में सिखाया गया अनुशासन ही उनका चरित्र निर्माण करता है. जिम्मेदारी लेना सिखाता है और बड़े हो रहे बच्चों में खुद की पहचान बनाने के लिए तैयार करता है.

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तीसरा स्टेज (14–21 साल) – दोस्ती और भरोसा
इस उम्र में माता-पिता की भूमिका मार्गदर्शक, राजदार और सलाहकार की होनी चाहिए. इस उम्र में आप बच्चे को स्पेस दें. उसके फैसलों का सम्मान करें, लेकिन उसका मार्गदर्शन भी करें. ये काफी नाजुक दौर होता है, ऐसे में उसे स्पेस देना भी जरूरी है लेकिन उसे जिम्मेदारी का अहसास भी कराना चाहिए.
इस उम्र में बच्चे को ऑर्डर न दें बल्कि अपनी सलाह दें. इस उम्र में नियंत्रण, मशवरा बन जाना चाहिए और डर, भरोसे में बदल जाना चाहिए.
क्यों फेल हो जाते हैं कई पेरेंट्स?
आज के समय में बहुत सारे माता‑पिता अपने बच्चों की परवरिश में मेहनत तो करते हैं, लेकिन सही तरीका नहीं अपनाते. यही वजह है कि कई बार उनकी कोशिशें असर नहीं दिखाती. मुख्य वजहें:
1. हर उम्र में एक जैसा व्यवहार करना : हर स्टेज में बच्चे की जरूरत बदलती है, लेकिन पेरेंट्स उसे समझ नहीं पाते. छोटे बच्चे को अनुशासन देने लगते हैं और बड़े बच्चे पर जरूरत से ज्यादा कंट्रोल करते हैं.
2. बच्चे की भावनाओं को न समझना: अक्सर लोग अपने बच्चों समझने में गलती कर देते हैं. पेरेंट्स अक्सर सिर्फ आदेश देते रहते हैं और बच्चों के कंट्रोल करने लग जाते हैं.
3. ज्यादा कंट्रोल या पूरी आजादी : कहीं बहुत ज्यादा सख्ती तो कहीं पूरी छूट देने से बच्चे या तो डरपोक बनते हैं या बगावती.
4. कम्युनिकेशन की कमी : बच्चे की बातें नहीं सुनना. सिर्फ “ये करो, वो मत करो” कहना. इससे बच्चा पेरेंट से दूर हो जाता है.
5. उम्र के हिसाब से रोल न बदलना : सबसे बड़ी गलती यही होती है कि पेरेंट गार्जियन से टीचर नहीं बन पाते और टीचर से दोस्त नहीं बन पाते.
क्यों असरदार है ‘7–7–7 मॉडल'?
यह मॉडल इसलिए खास माना जाता है क्योंकि यह बच्चे के हर स्टेज की जरूरत को समझकर पेरेंटिंग बदलने की सलाह देता है.
1. हर उम्र के अनुसार सही रोल सिखाता है-
0–7 → प्यार और सुरक्षा
7–14 → अनुशासन और शिक्षा
14–21 → दोस्ती और भरोसा
यानी पेरेंट हर 7 साल में अपनी भूमिका बदलता है.
2. बच्चे के मानसिक विकास के अनुरूप है. यह मॉडल मानवीय मनोविज्ञान से मेल खाता है. छोटे बच्चे सीखते नहीं, महसूस करते हैं और मिड एज में नियम सीखते हैं. बड़े होने पर पहचान और स्वतंत्रता चाहते हैं.
सही पेरेंटिंग का मतलब बच्चों को कंट्रोल करना नहीं, बल्कि हर उम्र में उनके साथ बदलना है.
संदर्भ :
https://islamicea.com/the-7-7-7-model-of-raising-children-in-islam/
https://quranjanan.com/islamic-parenting-tips-for-muslim-kids/
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