आज के घरों में हल्के प्लाईवुड, फ्लश डोर और मॉडर्न डिजाइन वाले दरवाजे आम हो गए हैं. लेकिन कुछ दशक पहले तक भारी-भरकम, नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे हर पुराने घर की पहचान होते थे. इन किवाड़ों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी, मजबूत चौखटें और हाथों से तराशी गई कलाकारी बीते वक्त की खामोश दास्तां सुनाती थीं. नक्काशीदार भारी लकड़ी की किवाड़ों से झांकती यादें आज भी आंखों को सुकून देती हैं. हर पुराना दरवाजा अपने पीछे एक अनकही कहानी समेटे रहता है. हालांकि बदलते दौर, मॉडर्न डिजाइन और सीमित जगह के चलते ये खूबसूरत विरासत अब धीरे-धीरे घरों से गायब होती जा रही है, लेकिन जहां भी ये नजर आते हैं वहां बीते जमाने की महक आज भी महसूस होती है.
महंगे होने से बदला लोगों का रुझान
शाहदरा टिम्बर मार्केट के प्रधान पीके अग्रवाल बताते हैं कि हाथ से नक्काशी करने में महीनों लगते हैं. इसी वजह से ऐसे दरवाजे काफी महंगे पड़ते हैं. आज लोग कम बजट में मिलने वाले रेडीमेड और मशीन से बने दरवाजों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं.
दो पल्लों वाले दरवाजों की थी अलग पहचान
पुराने घरों में अक्सर दो पल्लों वाले चौड़े दरवाजे लगाए जाते थे. इससे बड़े सामान को अंदर-बाहर ले जाना आसान होता था और जरूरत के हिसाब से एक या दोनों पल्ले खोले जा सकते थे. साथ ही उस दौर में शीशम और सागवान जैसी मजबूत लकड़ियों का इस्तेमाल होता था. यही वजह थी कि ये दरवाजे दशकों तक टिके रहते थे और जल्दी खराब नहीं होते थे.
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सांकल, कुंडी और भारी छल्ले
डिजिटल लॉक के दौर से पहले दरवाजों पर बड़ी कुंडियां, सांकल और लोहे या पीतल के छल्ले लगाए जाते थे. इन्हीं की आवाज से घर के लोग मेहमानों के आने का पता लगाते थे.
छोटे दरवाजे और बारीक नक्काशी
पुराने दरवाजे आकार में छोटे लेकिन बेहद मजबूत होते थे. इन पर हाथ से फूल-पत्तियां, बेल-बूटे और पारंपरिक डिजाइन उकेरे जाते थे. राजस्थान की कई पुरानी हवेलियों में आज भी ऐसे दरवाजे उस दौर की शानदार कारीगरी की गवाही देते हैं.
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ऊंची चौखट और रोशनदान का था खास मकसद
लकड़ी की ऊंची चौखट धूल, बारिश के पानी और कीड़े-मकौड़ों को घर में आने से रोकती थी. वहीं ऊंची खिड़कियां और रोशनदान घर को प्राकृतिक रोशनी और ठंडी हवा से भर देते थे.
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