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दिहाड़ी मजदूर की डायरी: आज काम मिला तो चूल्हा जलेगा, सुनील की डायरी में कैद है हर बेरोजगार का डर

Daily Wage Worker: मैं सुनील सिंह राजपूत लोधी, ललितपुर के पालबैठा गांव का रहने वाला, भोपाल में मजदूरी करता हूं. मेरे पास कोई बड़ी कहानी नहीं है. बस एक दिन है, जो हर दिन दोहराता है. एक कुदाल है, जो सिरहाने रखकर भी चैन देती है. दो बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई मेरी कमाई से बड़ी है. और एक उम्मीद है, जो बहुत छोटी है, मगर अभी तक मरी नहीं है.

दिहाड़ी मजदूर की डायरी: आज काम मिला तो चूल्हा जलेगा, सुनील की डायरी में कैद है हर बेरोजगार का डर
दिहाड़ी मजदूर की डायरी. (AI Generated Image)

आज सुबह फिर वही छह बजे आंख खुली. आंख क्या खुली, जैसे नींद ने खुद ही थककर शरीर को छोड़ दिया. कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी. न बच्चों की चहल-पहल, न पत्नी की पुकार, न आंगन में बंधी गाय की घंटी, न गांव की सुबह. बस एक छोटा-सा कमरा, दीवारों पर पसीने और मौसम के निशान, और एक कोने में रखा मेरा झोला. भोपाल के बापूनगर में यही मेरा ठिकाना है. घर कहूं तो झूठ लगेगा, सराय कहूं तो भी पूरा सच नहीं होगा. आदमी जहां रात काट ले, वही उसका ठिकाना हो जाता है.

उठकर कुछ देर वैसे ही बैठा रहा. शरीर कल की मज़दूरी से दुख रहा था. हाथों की नसें जैसे रात भर भी काम करती रही हों. फिर सोचा, पड़े रहने से क्या होगा? पेट तो उठते ही अपना हिसाब मांगता है. नहाया-धोया, चूल्हे जैसा जो छोटा इंतज़ाम है, उस पर रोटी-सब्जी बनाने की सोची, पर सुबह-सुबह मन भी नहीं हुआ और समय भी कम था. कई दिन यही होता है. कभी थोड़ा पोहा-जलेबी खा लेते हैं रास्ते में, कभी जेब में पैसे कम हों तो पानी पीकर निकल लेते हैं. खाली पेट आदमी काम पर तो चला जाता है, मगर धूप में उसका सच जल्दी खुल जाता है.

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सात बजे के आसपास नीलबड़ की तरफ निकल पड़ा. वहां रोज़ मज़दूरों की भीड़ लगती है. कोई सिर पर गमछा बांधे खड़ा रहता है, कोई अपने औज़ार संभाले, कोई चुपचाप सड़क की तरफ देखता रहता है जैसे सड़क से रोज़ी नहीं, किस्मत आने वाली हो. मैं भी उसी भीड़ में खड़ा हो गया. हम सब अलग-अलग गांवों से आए हुए लोग हैं, मगर वहां खड़े-खड़े सबका चेहरा एक जैसा हो जाता है. किसी की जेब में अधूरी उम्मीद, किसी के पेट में खालीपन, किसी की आंखों में गांव छूटा हुआ.

ठेकेदार आया. उसने ऐसे देखा जैसे अनाज की बोरी तौल रहा हो. “कौन-कौन जाएगा?” उसने आवाज़ लगाई. आदमी तुरंत आगे बढ़ते हैं, क्योंकि यहां देर करना भी घाटे का काम है. आज मेरा नाम लग गया. मन में थोड़ा चैन हुआ. आज की दिहाड़ी बच गई. रोज़ 600-700 रुपये मिल जाते हैं, पर रोज़ काम कहां मिलता है? महीने में पंद्रह-सोलह दिन काम मिल जाए तो समझो भगवान ने ज्यादा नाराज़गी नहीं दिखाई. रविवार हो, छुट्टी हो, शादी-ब्याह का सीजन हो या बारिश ... काम सबसे पहले मज़दूर से रूठता है. बारिश में मिट्टी गीली हो जाती है, काम रुक जाता है. शादियों में लोग अपने-अपने हिसाब से मजदूरी टाल देते हैं. और हम? हम इंतज़ार करते हैं.

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रविवार हो, छुट्टी हो, शादी-ब्याह का सीजन हो या बारिश ... काम सबसे पहले मज़दूर से रूठता है. बारिश में मिट्टी गीली हो जाती है, काम रुक जाता है. शादियों में लोग अपने-अपने हिसाब से मजदूरी टाल देते हैं. और हम? हम इंतज़ार करते हैं.

साइट पर पहुंचे तो सूरज अभी पूरा तेज़ नहीं हुआ था, लेकिन उसका इरादा साफ़ दिख रहा था. सुबह नौ बजे से काम शुरू किया. ईंट उठाना, बालू डालना, सीमेंट मिलाना, कुदाल चलाना, मलबा हटाना ... दिन का नाम अलग होता है, काम का बोझ लगभग वही रहता है. शरीर पहले आधे घंटे में ही समझ जाता है कि आज भी उसे अपनी औकात से ज्यादा इस्तेमाल होना है. पसीना पीठ से बहते हुए कमर तक आता है, फिर धूल उसे अपने में मिला लेती है. थोड़ी देर बाद आदमी आदमी नहीं रहता, मिट्टी और पसीने का चलता-फिरता ढेला हो जाता है.

धूप जब सिर पर आई तो लगा जैसे आकाश ने आग का तवा उल्टा कर दिया हो. गमछा भिगोकर सिर पर रखा, पर वह भी कुछ देर में सूख गया. हाथ में कुदाल थी. कुदाल आदमी का औज़ार है, पर कई बार लगता है हम ही उसके औज़ार हो गए हैं. वह चलती रहती है, हम उसके पीछे-पीछे घिसटते रहते हैं. ठेकेदार की आवाज़ बीच-बीच में आती रहती है. “जल्दी करो, देर हो रही है. मजदूर के लिए जल्दी और देर दोनों दूसरों की चीज़ें हैं. उसका अपना समय बस शरीर की टूटन में मापा जाता है.

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दोपहर में थोड़ी देर की छुट्टी मिली. पास ही एक छोटा-सा मंदिर था. मंदिर की छाया में जाकर बैठ गया. दो रोटियां थीं, थोड़ी सब्जी. खाई तो लगा जैसे पेट ने बहुत दिनों बाद कोई बात मानी हो. फिर सिर के नीचे झोला रखकर लेट गया. कुदाल को सिरहाने रख लिया. आदमी अपने औज़ार से भी लगाव कर लेता है, क्योंकि वही उसे भूख से बचाता है. मंदिर में भगवान थे, बाहर धूप थी, और बीच में हम जैसे लोग थे. जिनकी प्रार्थना बहुत बड़ी नहीं होती. बस आज का काम पूरा हो जाए, पैसा मिल जाए, रात की रोटी बन जाए, और गांव फोन करने पर बच्चे ठीक मिलें.

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मंदिर में भगवान थे, बाहर धूप थी, और बीच में हम जैसे लोग थे. जिनकी प्रार्थना बहुत बड़ी नहीं होती. बस आज का काम पूरा हो जाए, पैसा मिल जाए, रात की रोटी बन जाए, और गांव फोन करने पर बच्चे ठीक मिलें.

नींद आई भी और नहीं भी. आंख बंद हुई तो पालबैठा गांव याद आ गया. ललितपुर का मेरा गांव. घर पर चार लोग हैं. पत्नी, दो बच्चे और मेरी चिंता. आठ साल का लड़का है, नौ साल की लड़की. दोनों की उम्र पढ़ने की है, मगर मेरी कमाई इतनी नहीं कि दोनों को ठीक से पढ़ा सकूं. यह बात जब मुंह से निकलती है तो भीतर कुछ टूटता है. मजदूर की सबसे बड़ी हार यह नहीं कि वह धूप में काम करता है. सबसे बड़ी हार यह है कि वह अपने बच्चों के लिए भी आसमान छोटा पड़ता देखता है. बच्चा पूछे कि स्कूल कब जाऊंगा, तो आदमी के पास जवाब नहीं होता. आदमी तब पिता कम, अपराधी ज्यादा महसूस करता है.

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परिवार को भोपाल में रख नहीं सकता. खर्चा बहुत है. कमरा, खाना, इलाज, बच्चों की पढ़ाई. सब कुछ जोड़ो तो मजदूरी पहले ही दिन हार जाती है. इसलिए मैं अकेला रहता हूं. दो-तीन महीने में एक बार ललितपुर जाता हूं बच्चों से मिलने. जब गांव पहुंचता हूं तो बच्चे पहले खुश होते हैं, फिर थोड़ी देर बाद समझ जाते हैं कि बाप फिर चला जाएगा. उनकी आंखों में सवाल रहता है, पर वे पूछते नहीं. शायद बच्चे जल्दी समझदार हो जाते हैं जब घर में पैसे कम हों.

दोपहर के बाद फिर काम शुरू हुआ. धूप अब और कड़ी थी. बदन गरम लोहे जैसा लग रहा था. कई बार लगता है बस बैठ जाऊं, लेकिन बैठने का मतलब है दिन की मजदूरी पर शक. मजदूर की थकान भी उसकी अपनी नहीं होती. उसे छुपाकर रखना पड़ता है. हाथ चलते रहे. शाम छह बजे तक यही चलता रहा. जब काम खत्म हुआ तो लगा जैसे शरीर को किसी ने गिरवी रखकर शाम को वापस किया हो.

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ठेकेदार ने पैसे दिए. लौटने के नाम पर पांच-दस रुपये किराया दे दिया. आदमी का आना जरूरी है, जाना उसकी समस्या है. कुछ मजदूर पैदल निकल पड़े, कुछ ने सवारी पकड़ी. मैं भी धीरे-धीरे कमरे की तरफ चला. रास्ते में पुराने गाने याद आए. कभी-कभी फोन पर सुन लेता हूं. मिथुन और गोविंदा की फिल्में बहुत अच्छी लगती थीं. उनके गानों में गरीब आदमी भी नाच लेता था, जीत लेता था, हंस लेता था. असली जिंदगी में नाचने का समय नहीं मिलता. सिनेमा देखना अब भी अच्छा लगता है, लेकिन टिकट में पैसा लगता है. और जब जेब में पैसा हो तो आदमी पहले आटा-दाल सोचता है, सिनेमा बाद में.

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कमरे पर पहुंचकर फिर वही रात की रसोई. रोटी बनाई, थोड़ी सब्जी गरम की. टीवी नहीं है. स्मार्टफोन है. खाना खाकर उसमें रील देख लेता हूं, फेसबुक चला लेता हूं. लोग कहते हैं यह टाइम पास है. सच में यही टाइम पास है. वरना आदमी अकेले कमरे में अपने ही मन से डर जाए. दोस्त वगैरह नहीं हैं यहां. मजदूरों की जान-पहचान होती है, दोस्ती कम होती है. सब अपने-अपने बोझ से दबे रहते हैं.

बीमार पड़ता हूं तो सरकारी अस्पताल जाता हूं. प्राइवेट अस्पताल का नाम सुनते ही जेब कांप जाती है. मजदूर की बीमारी भी हिसाब देखकर आती है तो अच्छा है, वरना आदमी दवा और राशन के बीच फंस जाता है.

आज काम मिला, इसलिए दिन अच्छा कह सकते हैं. अजीब बात है. जिस दिन शरीर सबसे ज्यादा टूटता है, उसी दिन दिल को थोड़ी तसल्ली होती है कि आज कुछ कमाई हुई. जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन शरीर तो आराम करता है पर मन घुटता रहता है. ऐसे दिनों में सच कहूं तो साहब, कमरे में पड़े रहते हैं, सोते रहते हैं. क्या करें? बाहर निकलें तो खर्चा, अंदर रहें तो चिंता.

रात हो गई है. फोन की बैटरी कम है. आंखें बंद कर रहा हूं. कल फिर सुबह उठना है. फिर नीलबड़ जाना है. फिर भीड़ में खड़ा होना है. फिर देखना है कि ठेकेदार की निगाह मुझ पर पड़ती है या नहीं. जिंदगी भी शायद ऐसी ही कोई ठेकेदारी है. रोज़ बुलाती नहीं, पर आदमी रोज़ उसके दरवाज़े पर खड़ा रहता है.

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ये सुनील सिंह राजपूत लोधी, ललितपुर के पालबैठा गांव का रहने वाले एक मजदूर की कहानी है, जो अपने परिवार को छोड़ परिवार का पेट पालने के लिए भोपाल में मजदूरी करता है. 

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