एक कपड़े को दोबारा नहीं पहनना है, एक ही कपड़े में बार-बार फोटो नहीं डाल सकते, हर फंक्शन के लिए अलग कपड़े चाहिए. आज के समय में ढ़ेर सारे मॉल और ऑनलाइन साइट्स हैं जिनसे आप अपनी पसंद का कपड़ा कुछ मिनटों में भी पा सकते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि फैशन का ये बढ़ता दौर और फास्ट फैशन का पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है?
कपड़ों का बिजनेस तेजी से बढ़ रहा है. हजारों संख्या में कई फैक्ट्रियां हैं जहां पर बड़ी मात्रा में हर रोज कपड़े तैयार किए जाते हैं. लेकिन इसके साथ ही प्रदूषण, पानी की बर्बादी, कार्बन का उत्सर्जन जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं.
पुराने समय में वापस जाएं तो पहले नए कपड़े किसी त्योहार, जन्मदिन या शादी-ब्याह के मौके पर खरीदे जाते थे. लेकिन आज कपड़े खरीदने के लिए कोई कारण नहीं बल्कि मन चाहिए होता है. मन हुआ तो खरीद लिया. लेकिन ये जिस तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है उसे देखते हुए एक बार फिर से टिकाऊ (सस्टेनेबल) फैशन की ओर बढ़ने की जरूरत महसूस की जा रही है.
आपको सुनकर शायद अजीब लगे, कि आखिर कपड़े पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचा सकते हैं. तो चलिए आपको बताते हैं.
फैशन का पर्यावरण पर प्रभाव
Ellen MacArthur Foundation की रिपोर्ट में बताया गया कि क्लोथिंग इंडस्ट्री दुनिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है. जिसकी विश्व में कीमत लगभग 1.3 ट्रिलियन डॉलर है. जिससे हर रोज 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है.
टेक्सटाइल एक्सचेंज ऑर्गेनाइजेशन की एक रिपोर्ट में बताया गया कि बीते 20 सालों में ग्लोबल फाइबर का प्रोडक्शन लगभग दुगना हो गया है. साल 2000 में दुनिया में 5.8 करोड़ टन फाइबर बनाया जाता था, जो 2022 में बढ़कर 11.6 करोड़ टन हो गया है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2030 तक ये उत्पादन 14.7 करोड़ टन तक पहुंच सकता है. यहां देखिए रिपोर्ट
इसकी वजह है लोग पहले की तुलना में आज के समय पर ज्यादा कपड़े खरीद तो रहे हैं, लेकिन कपड़ों को कम समय तक पहनते हैं. जिसकी वजह से कपड़ों का कचरा लगातार बढ़ता जा रहा है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में पानी का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करने वालों की लिस्ट में फैशन इंडस्ट्री दूसरे नंबर पर आती है. इसी के साथ वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 2 से 8 प्रतिशत हिस्सा भी इसी से आता है.
unece.org की एक रिपोर्ट में बताया गया कि हर साल लगभग 85 प्रतिशत कपड़ों का ढेर कूड़े में जाता है. वहीं कपड़ों को धोने से माइक्रोप्लास्टिक समुद्रों में पहुंचता है, जिससे समुद्री जीवन को भी नुकसान पहुंचचा है.
फास्ट फैशन के वो फैक्ट्स जो कर देंगे हैरान
- हर 1 सेंकड में एक कूड़ा गाड़ी के बराबर कपड़ों को जलाया जाता है या फिर उनको फेंक दिया जाता है. यहां देखें रिपोर्ट
- UN environment Programme की एक रिपोर्ट में बताया गया कि, फैशन इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाली लगभग 60 प्रतिशत चीजें प्लास्टिक से बनी होती हैं.
- Quantis की एक रिपोर्ट के मुताबिक कपड़े को धोने से हर साल लगभग 5 लाख टन माइक्रोफाइबर समुद्र मे जाते हैं, जो लगभग 50 अरब प्लास्टिक बोतलों के बराबर होता है.
- Ellen MacArthur Foundation की रिपोर्ट की मानें तो अगर ये कंडीशन इसी तरह से बनी रही, तो 2050 तक वैश्विक कार्बन बजट में फैशन इंडस्ट्री की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.
- Quantis की रिपोर्ट के मुताबिक क्लोथिंग इंडस्ट्री हर साल लगभग 215 ट्रिलियन लीटर पानी का इस्तेमाल करता है.
- worldbank.org की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत औद्योगिक गंदे पानी का पॉल्यूशन फैशन इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ है.
- कपड़े को बनाने में इस्तेमाल की गई सभी चीजों का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा नए कपड़ों में रीसाइकिल किया जाता है.
सेहत पर असर
- कपड़ों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करते हैं.
- कपड़ों को बनाने में होने वाला प्रदूषण की वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी लगातार बढ़ रही हैं.
- कपड़ों से होने वाले कचरे को जलाया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है.
- कपड़ों को धोने से उससे निकलने वाला प्लास्टिक समुद्र में जाता है, जो मानव जीवन और समुद्री जीवों के लिए भी नुकसानदायक है.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन मे पबल्शि एक रिसर्च में भी कपड़ों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले केमिकल मानव सेहत के लिए कितने हानिकराक है बताया गया है.
क्या करें
- सीमित मात्रा में कपड़े खरीदें
- सूती कपड़े खरीदें
- सस्टेनेबल फैशन को चुनें
- सिंथेटिक फाइबर वाले कपड़ों की सीमित इस्तेमाल करें.
बता दें कि आज भी कई कपड़ों को लोग केवल 7 से 10 बार पहनने के बाद ही फेंक देते हैं. दुनिया भर में हर साल लगभग 460 अरब डॉलर के कपड़ों को ऐसे ही फेंक दिया जाता है, जिनको दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था.
फास्ट फैशन आपको सस्ते और ट्रेंडिंग कपड़े तो दिला देते है, लेकिन इसकी भारी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ती है. पॉल्यूशन, पानी की बर्बादी, प्लास्टिक कचरा जैसी चीजें इस इंडस्ट्री से जुड़ी हुई हैं. इसलिए अब जरूरत है कि लोग टिकाऊ फैशन, कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल और सीमित मात्रा में खरीदारी करना शुरू करें.
संदर्भ
www.ellenmacarthurfoundation.org/fashion-and-the-circular-economy-deep-dive
textileexchange.org/conference-archives/
unece.org/fileadmin/DAM/RCM_Website/RFSD_2018_Side_event_sustainable_fashion.pdf
www.ellenmacarthurfoundation.org/fashion-and-the-circular-economy-deep-dive
www.unep.org/news-and-stories/story/fashions-tiny-hidden-secret
quantis.com/all-insights/reports/
www.ellenmacarthurfoundation.org/assets/downloads/publications/A-New-Textiles-Economy_Summary-of-Findings_Updated_1-12-17.pdf
quantis.com/all-insights/reports/
www.worldbank.org/en/news/feature/2019/09/23/costo-moda-medio-ambiente#:~:text=Around%2020%20%25%20of%20wastewater%20worldwide,flights%20and%20maritime%20shipping%20combined.
pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC9318620/
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