Judge सिर पर सफेद बालों वाली Wig क्यों पहनते हैं? जानिए ‘पेरुक’ की दिलचस्प कहानी

पेरुक की परंपरा 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड से शुरू हुई. उस समय सिफलिस बीमारी के कारण कई लोगों के बाल झड़ने लगे थे, जिसमें किंग चार्ल्स II भी शामिल थे. गंजापन छिपाने के लिए विग पहनने का चलन बढ़ा और यह कोर्ट तक भी जा पहुंचा.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
पेरुक केवल एक साधारण विग नहीं, बल्कि जजों की यूनिफॉर्म का हिस्सा मानी जाती है.

British Judges Wigs : हाल ही में आर.एन रवि (R. N. Ravi) ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में शपथ ली. लेकिन इस समारोह के दौरान कोलकाता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल की यूनिफॉर्म ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं. दरअसल, सुजॉय ने एक भूरे बालों की विग पहनी हुई थी, जिसे अक्सर आपने ब्रिटिश जजों या आले दर्जे की अफसरों को पहने हुए देखा होगा. लेकिन क्या आपको पता है कि इसे क्या कहा जाता? अगर नहीं, तो हम बताते हैं. दरअसल, इसे पेरुक कहा जाता है. आइए, इससे जुड़ी कुछ और रोचक चीजें जानते हैं. 

क्या होती है ‘पेरुक' विग?

पेरुक केवल एक साधारण विग नहीं, बल्कि जजों की यूनिफॉर्म का हिस्सा मानी जाती है. पेरुक पहनने का मकसद यह दिखाना होता है कि अदालत में बैठा व्यक्ति अपनी निजी पहचान से ऊपर उठकर न्याय के पद और जिम्मेदारी का प्रतिनिधित्व कर रहा है. इससे अदालत में बैठे सभी जज एक जैसे दिखाई देते हैं, जिससे निष्पक्षता तथा समानता का संदेश मिलता है.

इंग्लैंड से शुरू हुई यह परंपरा

पेरुक की परंपरा भारत में नहीं, बल्कि इंग्लैंड से आई है. यह परंपरा 17वीं शताब्दी में ब्रिटेन में शुरू हुई थी. उससे पहले ब्रिटिश जज केवल काला कोट पहनते थे. उस समय ब्रिटेन में सिफलिस (Syphilis) नाम की बीमारी तेजी से फैल रही थी. इस बीमारी के कारण कई लोगों के बाल झड़ने लगे थे और कई लोग गंजे हो गए थे. ऐसे में लोग अपने गंजेपन को छिपाने के लिए विग पहनने लगे. इसी दौर किंग चार्ल्स II को भी यह बीमारी हो गई और वह गंजेपन का शिकार हो गए. उन्होंने भी विग पहनना शुरू कर दिया और जल्द ही यह हाई क्लास और शाही दरबार में फैशन बन गया. धीरे-धीरे यह परंपरा अदालतों तक पहुंची और जजों तथा वकीलों की यूनीफॉर्म का हिस्सा बन गई.

भारत में कैसे आई यह परंपरा

भारत में पेरुक की परंपरा अंग्रेजों के शासन के दौरान आई. जब ब्रिटिश सरकार ने भारत में आधुनिक न्याय व्यवस्था लागू की और कोलकाता में सुप्रीम कोर्ट ऑफ जुडिकाच्योर (Supreme Court of Judicature) की स्थापना की, तब अंग्रेजी कोर्ट कल्चर भी भारत में लागू किया गया. इसी के साथ अदालतों में काला कोट, सफेद बैंड और विग पहनने की परंपरा भी शुरू हो गई.

Advertisement

हालांकि, आजादी के बाद यह सवाल उठा कि क्या ब्रिटिश परंपराओं को जारी रखा जाना चाहिए. 1950 में संविधान लागू होने के बाद न्याय व्यवस्था में कई बदलाव किए गए. लेकिन तब कोर्ट की यूनीफॉर्म को पूरी तरह से नहीं बदला गया. इसके कुछ सालों बाद पेरुक पर विचार किया गया. क्योंकि भारत में तेज गर्मी और उमस के चलते लंबे समय तक भारत की कोर्ट में इसे पहनकर बैठना संभव ही नहीं था. साल 1961 में जब एडवोकेट लॉ बना, तब पेरुक पहनने के इस कॉन्सेप्ट को भारत में खत्म कर दिया गया. लेकिन इसे पूरी तरह से तब भी खत्म नहीं किया था. इसलिए आज भी कुछ जजों को इसे पहने हुए देखा जाता है. हालांकि, यह अब रोजमर्रा की अदालती कार्रवाई का हिस्सा नहीं है. 

यह भी पढ़ें - दिल्ली, यूपी से लेकर बिहार तक... जानें श्रमिकों को कहां कितना मिलता है पैसा, क्या है न्यूनतम मजदूरी

Featured Video Of The Day
Suchertia Kukreti | Hormuz में छिड़ गई जंग! Trump का एक्शन तेज, US युद्धपोत पहुंच गए | Khamenei
Topics mentioned in this article