सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की महिला IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर की याचिका पर सुनवाई बंद कर दी है, जो प्रेग्नेंट हैं और इसके चलते उन्हें ट्रेनिंग में शामिल नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने उर्वशी सेंगर को फिलहाल चल रही ट्रेनिंग में शामिल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि 9 हफ्ते में से तीन हफ्ते की ट्रेनिंग हो चुकी है, जिससे साफ है कि आप अच्छी तरह से ट्रेनिंग नहीं कर पाएंगी. हालांकि, अदालत ने केंद्र सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया कि इससे महिला IPS की वरिष्ठता (Seniority) पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) महिला IPS की मूल याचिका पर मेरिट के आधार पर सुनवाई करे.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला गर्भवती महिला IPS अधिकारियों को प्रोबेशन के दौरान प्रशिक्षण से रोकने वाले 23 अगस्त 1993 के गृह मंत्रालय के एक कार्यालय ज्ञापन (OM) को चुनौती देने से जुड़ा है. 1993 के इस पुराने नियम के मुताबिक, महिला IPS प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भधारण से बचें और यदि कोई अधिकारी इस दौरान गर्भवती हो जाती है, तो उसकी ट्रेनिंग तुरंत रोक दी जाएगी. वह प्रसव के एक साल बाद ही प्रशिक्षण दोबारा शुरू कर सकेगी और इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
इस मामले की सुनवाई जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने की. बुधवार 8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए पूछा था कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह फिट है, तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जा रहा है? यदि महिला अधिकारी मेडिकल रूप से फिट है तो उसे प्रशिक्षण से रोकने का क्या औचित्य है? क्या उर्वशी सेंगर को जून 2026 से शुरू हुए प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है?
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट का यह आदेश एक अंतरिम आदेश है और इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं आया है. अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "महिलाओं के हित के लिए बनाई गई व्यवस्था का इस्तेमाल उनके अधिकार छीनने के लिए नहीं किया जा सकता. अगर कोई महिला बाद में ट्रेनिंग के लिए तैयार है और फिट है तो उसे ट्रेनिंग करने से क्यों रोका जाए? एक ही नियम को सभी महिलाओं के लिए लागू कैसे किया जा सकता है? हो सकता है कि कोई गर्भ धारण करने के दो साल बाद भी सर्जरी या अन्य किसी मेडिकल दिक्कत के चलते प्रशिक्षण के लिए पूरी तरह फिट ना हो, ऐसे में एक नियम से सभी से एक जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता है."
केंद्र सरकार ने दी ये दलील
इस पर केंद्र सरकार ने दलील दी कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई, तो भविष्य में ऐसे कई मामलों में यही मांग उठेगी. वहीं, उर्वशी सेंगर की ओर से पैरवी कर रहे वकील ने कहा कि अतीत में भी कुछ महिला अधिकारियों को ऐसे मामलों में छूट दी जा चुकी है. केंद्र ने कोर्ट को यह भी भरोसा दिया कि वे हाईकोर्ट में लंबित याचिका को वापस ले लेंगे.
क्या है उर्वशी सेंगर का मामला?
उर्वशी सेंगर ने नवंबर 2023 में अपनी फेज-1 ट्रेनिंग शुरू की थी. इसके बाद अप्रैल 2025 में फेज-2 ट्रेनिंग के दौरान वह गर्भवती हुईं और उन्होंने इसकी जानकारी पुलिस अकादमी को दी. नियम का हवाला देकर उन्हें ट्रेनिंग बीच में ही छोड़ने और प्रसव के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा ट्रेनिंग लेने के लिए कहा गया.
हालांकि, पुलिस अकादमी ने इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने 22 जून को कैट के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा था कि यह नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
1993 के पुराने नियम को चुनौती क्यों?
- सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि आज के समय में ऐसे फैसले पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होने चाहिए.
- 1993 का यह नियम सभी गर्भवती अधिकारियों पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से लागू होता है और इसमें फेज-1 और फेज-2 के ट्रेनिंग के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है.
- फेज-2 में मुख्य रूप से कक्षा आधारित पढ़ाई, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत प्रशिक्षण होता है, जो शारीरिक रूप से अत्यधिक कठिन नहीं है. इसलिए केवल गर्भावस्था के आधार पर बाहर करना ठीक नहीं है.
साल 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने महिला IAS अधिकारियों के लिए इस पुराने नियम में बदलाव कर दिया था, जिसके तहत अब IAS महिला प्रोबेशनरों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर ट्रेनिंग पूरी करने की इजाजत मिलती है. ऐसे में IPS अधिकारियों के लिए 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है. अब यह देखना अहम होगा कि ट्रिब्यूनल (CAT) इस मूल याचिका पर मेरिट के आधार पर क्या फैसला लेता है और क्या आधुनिक चिकित्सा विज्ञान व व्यक्तिगत मेडिकल जांच को देखते हुए हर मामले में अलग फैसला लेने का रास्ता साफ होता है.
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