खामेनेई की मौत पर श्रीनगर की सड़कों पर मातम क्यों? लोग बोले- कर्बला फिर दोहराया गया

तेहरान से भारत के श्रीनगर पहुंचा खामेनेई की मौत का मातम. शिया समुदाय कह रहा है कि- हमने अपना इमान खो दिया. जानिए क्यों उनकी शहादत को कर्बला से जोड़ा जा रहा है...

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श्रीनगर की सड़कों पर खामेनेई की मौत के विरोध में हुआ प्रदर्शन
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  • शिया समुदाय के लिए ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई मरजा-ए-तकलीद और वली-ए-फकीह थे.
  • उनकी मौत को कर्बला की शहादत से जोड़कर देखा जा रहा है, इसलिए मातम और गुस्सा गहरा है.
  • गजा और प्रतिरोध की राजनीति ने उन्हें ‘जुल्म के खिलाफ खड़े नेता’ की छवि दी.
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ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद रविवार को श्रीनगर की सड़कों पर अचानक भीड़ उमड़ पड़ी और जो पहला नारा जो गूंजा, वो था  'अल्लाह-ओ-अकबर, खामेनेई रहबर!' यानी अल्लाह महान हैं और खामेनेई लीडर हैं. यह केवल एक नारा नहीं था बल्कि दुख और गुस्से का जबरदस्त नजारा था क्योंकि शोक मनाने वाले लोग सड़कों पर सीना पीटते और नोहा पढ़ते हुए मार्च कर रहे थे. माहौल बिल्कुल वैसा था जैसे मुहर्रम और आशूरा के जुलूसों में हुसैन इब्न अली की कर्बला में शहादत को याद किया जाता है. 

कर्बला की याद क्यों ताजा हो रही है?

खामेनेई का पूरा नाम आयतुल्लाह अली हुसैनी खामेनेई था. हुसैनी सैयद होने के कारण वे खुद को इमाम हुसैन की वंश परंपरा से जोड़ते थे, इसके अलावा वे शिया मुसलमानों के इमाम भी थे. शिया जानकार कहते हैं कि उनकी मौत ने शिया मुसलमानों के ऐसे बड़े शख्स को खो दिया है जो एक साथ इमाम (आध्यात्मिक मार्गदर्शक), मरजा-ए-तकलीद (जिसके धार्मिक फैसलों का अनुकरण किया जाता था) और वली-ए-फकीह (इस्लामी न्यायविद और संरक्षक) थे. शिया मत में बारहवें इमाम मुहम्मद अल-महदी को गायब इमाम माना जाता है, जो परदे में हैं, वली ए-फकीह को उनका प्रतिनिधि समझा जाता है. एक शिया विद्वान कहते हैं, "ये किसी नेता की मौत नहीं, हमारे ईमान का सवाल है."

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क्या सिर्फ खामेनेई ही मरजा थे?

दुनिया भर में शिया मुसलमान एक ही मरजा को नहीं मानते. कई मरजा हो सकते हैं. खामेनेई के अलावा, इराक के आयतुल्लाह अली सिस्तानी भी शिया मुसलमानों के एक बड़े मरजा माने जाते हैं. लेकिन शिया दुनिया की बड़ी आबादी या तो सिस्तानी का अनुसरण करती है या खामेनेई का. 
प्रदर्शनकारी इमाम खामेनेई की शहादत और कर्बला के बीच समानताएं बता रहे थे. उनका कहना था कि तेहरान में कर्बला दोहराया गया है और इसलिए, खामेनेई की मौत के बाद विरोध प्रदर्शनों के दौरान वैसे ही मातम और शोकगीत देखे जा रहे हैं.

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'वो मेरे मां-बाप से बढ़कर थे'

एक महिला प्रदर्शनकारी ने कहा, "वह (खामेनेई) मुझे मेरे माता-पिता से भी ज्यादा प्यारे हैं. उन्होंने हमारे इमाम को शहीद कर दिया. यह एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती. वह इस्लाम के सबसे बड़े स्तंभ थे." विरोध प्रदर्शन में भी शामिल उनके पति एजाज रिजवी ने कहा कि उनके पास अपना दुख जाहिर करने के लिए शब्द नहीं हैं. उनका मानना ​​है कि उनकी मौत से इमाम के बारे में सोच नहीं बदलेगी. उन्होंने कहा, “विचार को नहीं मारा जा सकता. खामेनेई के बाद भी उनका रास्ता जिंदा रहेगा.” शिया मुसलमानों की सोच कर्बला की परंपराओं और यादों से गहराई से जुड़ी हुई है, इसलिए ईरान में जो हालात बन रहे हैं, उन्हें कर्बला से जोड़ा जा रहा है.

इस प्रदर्शन में शोक मनाने वाले राशिद ने कहा, “इमाम खामेनेई अपने पुरखों के नक्शेकदम पर चले और अपने परिवार वालों के साथ मारे गए. इमाम खामेनी गजा के दबे-कुचले और परेशान लोगों के इंसाफ के लिए खड़े रहे.”

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श्रीनगर से सांसद आगा रूहुल्लाह मेहदी
Photo Credit: Aga Syed Ruhullah Mehdi @RuhullahMehdi

गजा पर स्टैंड बना प्रतिरोध का प्रतीक

श्रीनगर से सांसद आगा रूहुल्लाह मेहदी का कहना है कि खामेनेई की मौतपर इतना दुख और गुस्सा फैलने के पीछे कोई एक वजह नहीं है. 
वे कहते हैं, “खामेनेई ने प्रतिरोध की संस्था थे. उन्होंने गजा के लोगों के लिए आवाज उठाई. गजा पर उनका स्टैंड एक मिसाल है. उन्होंने उन लोगों का प्रतिनिधत्व किया जो सत्ता के आगे झुकने में नहीं, बल्कि विरोध करने में यकीन करते थे. वे अमेरिका और इजरायल जैसी ताकतों के सामने नहीं झुके. वे अमेरिका के साथ अरब लीडर्स की तरह डील कर सकते थे और शांति से रह सकते थे पर उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.”

आगा मेहदी कहते हैं कि जिस तरह खामेनेई की हत्या हुई उससे बहुत नुकसान हुआ है. वे बोले, "वह उन लोगों के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण थे जो साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ खड़े होने की वजह से गुलामी का सामना कर रहे थे.”

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खामेनेई का कश्मीर से पुराना रिश्ता

खामेनी 1980 में सिर्फ एक बार कश्मीर आए थे और उन्होंने शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच एकता बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने श्रीनगर की जामिया मस्जिद में सुन्नी मुसलमानों के साथ नमाज पढ़ी और वहां एक छोटा सा भाषण भी दिया था. यह शिया-सुन्नी एकता की मिसाल माना जाता है. 1989 में रूहोल्लाह खामेनेई के निधन के बाद वे ईरान के सुप्रीम लीडर (रहबर) बने और तब से शिया धार्मिक नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा उनके प्रति वफादार रहा. दरअसल, माने जाने वाले मरजा या उनके चुने हए प्रतिनिधि को शिया अनुयायी 'खुम्स'(सालाना बचत का 20 फीसद हिस्सा) भी देते हैं.

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एक शिया स्कॉलर मुजतबा अली ने कहा, “हमारे लिए एक मरजा और वली अल फकीह, वह बारहवें शिया इमाम महदी के वाइस-रीजेंट हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे गुप्तवास में हैं. उनकी मौत किसी लीडर की आम मौत नहीं है. यह हमारे विश्वास के बारे में है.” शिया अनुयायी ‘खुम्स' (वार्षिक बचत का 20%) मरजा या उनके प्रतिनिधि को देते हैं.

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खामेनेई को कैसे याद करते हैं उन्हें चाहने वाले

इमाम और वली अल फियाह के तौर पर खामेनेई का शिया मुसलमानों की निजी जिंदगी को बनाने में भी बहुत बड़ा किरदार था. मुजतबा अली कहते हैं, “इबादत, लेन-देन, नैतिकता, पारिवारिक कानून जैसे मामलों पर धार्मिक आदेश/फैसले जारी करने से लेकर, वह ऐसे मामलों में आखिरी अथॉरिटी थे और रोजाना के काम शरिया के हिसाब से होते थे. यह हर शिया मुसलमान पर लागू होता था.”

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हालांकि दुनिया भर के सभी शियाओं के लिए कोई एक आधिकारिक मरजा नहीं है (कैथोलिक धर्म में पोप के उलट). एक साथ कई मरजा हो सकते हैं, और लोग अपनी समझ के आधार पर चुनते हैं कि किसे मानना ​​है. लेकिन दुनिया में अधिकांश शिया या तो इराक के ग्रैंड अयातुल्लाह अली सियास्तानी को मानते हैं या फिर ईरान में ग्रैंड अयातुल्लाह अली खामेनेई को.

एक शोक मनाने वाले ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, “उनके प्रति आदर शियाओं की उन इमामों की याद से आता है जो कभी गलती नहीं करते थे. हम उनकी सच्चाई, सम्मान और न्याय के लिए उनका संघर्ष उनकी दृढ़ता को देखते हुए हम केवल हुए नुकसान का शोक नहीं मना रहे हैं, बल्कि उनके आदर्शों पर खरा उतरने का संकल्प भी जाहिर कर रहे हैं.”

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सम्मानित इमामों की शहादत

शिया मुसलमानों के बीच उनको हुए नुकसान का इतना अधिक एहसास मुख्य तौर पर खामेनेई के धार्मिक रुतबे की वजह से है. मौलवी और शिया जानकार अली और उनकी शहादत का जिक्र करते हैं और आज के हालात और 1400 साल पहले जो हुआ, जिसने शिया सोच और परंपरा को बनाया, उसके बीच एक जैसी बातें बताने की कोशिश करते हैं.

एक शिया विद्वान ने कहा, “उनकी शहादत और अली और हुसैन जैसे शिया स्कूल के सम्मानित इमामों की शहादत में भी एक खास समानता है. खामेनेई को रमजान के महीने में एक मस्जिद में नमाज पढ़ते समय मार दिया गया था. हुसैन को घेर लिया गया और परिवार के सदस्यों के साथ भूखे-प्यासे मार दिया गया. खामेनी को भी रमजान के महीने में मार दिया गया. इसलिए उन्हें भी अपने पूर्वजों और इमामों की तरह मजलूम (जुल्म का सताया हुआ) होने का दर्जा मिला.” अपने भाषणों में उन्होंने हुसैन की उन बातों का जिक्र किया जो जालिमों के आगे झुकने के बारे में हैं और उस स्टैंडर्ड पर खरे उतरे.”

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