दाऊद इब्राहिम को ISI ने कैसे बनाया अपना गुर्गा? वो कहानी जिसने आतंकवाद-अंडरवर्ल्ड का बनाया कॉकटेल

दाऊद इब्राहिम से शुरू हुआ अंडरवर्ल्ड और आतंकवाद का कनेक्शन मुन्ना झिंगाड़ा तक पहुंच गया है. लालच में आकर ये अपराधी देश के गद्दार बन जा रहे हैं और अपने ही लोगों के खून से खेलने की साजिश का हिस्सा बन रहे हैं.

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दाऊद इब्राहिम के बाद कई गैंगस्टर आतंकवादी बने. ताजा नाम मुन्ना झिंगाड़ा का है.
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  • दाऊद इब्राहिम ने आईएसआई की मदद से मुंबई में 1993 के बम धमाकों और दंगों को अंजाम दिया था
  • कोलकाता के गैंगस्टर आफताब अंसारी ने जैश-ए-मोहम्मद के लिए आतंकी हमले करवाए और हवाला नेटवर्क का उपयोग किया था
  • इंडियन मुजाहिदीन ने अंडरवर्ल्ड की सहायता से बम धमाके किए और हथियारों तथा विस्फोटकों का इस्तेमाल किया था
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"दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है." खुफिया एजेंसियों के लिए ये कहावत किसी ब्रह्मवाक्य से कम नहीं. दुनिया की तमाम खुफिया एजेंसियों की प्लेबुक में एक बात आम है - अगर किसी देश में अस्थिरता पैदा करनी है, वहां हिंसा करवाना है और उस देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को तहस नहस करना है तो उन लोगों से हाथ मिलाओ जो संगठित आपराधिक गिरोह चलाते हैं, चरमपंथी हों और सरकार के खिलाफ काम करते हों. अमरीकी खुफिया एजेंसी CIA ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से, विशेषकर शीतयुद्ध के दौरान, दुनिया के कई देशों में इस नीति का खूब इस्तेमाल किया. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई, जिसे 1980 के बाद कई सालों तक सीआईए ने ही ट्रेनिंग दी, ये नीति भारत के खिलाफ अपनाते आई है.

दाऊद और आईएसआई की दोस्ती कैसे हुई?

दाऊद 1986 में मुंबई से दुबई भाग गया और वहीं से समुद्र और हवाई रास्ते से सोने, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक सामान की तस्करी करवाता था. जनवरी 1993 में दुबई से मुंबई के करीब रायगढ़ तट के लिए निकली तस्करी की एक बोट को कराची के तट के पास से गुजरते वक्त एक पाकिस्तानी गिरोह ने कब्जा कर लिया. बोट में करीब 2 करोड़ रुपये की चांदी थी, जो कि उस वक्त बहुत बड़ी रकम थी. दाऊद को बहुत बड़ा नुकसान हुआ. उसके नुकसान की जानकारी आईएसआई तक पहुंची. दुबई में उसके एजेंट दाऊद से मिले और कहा कि वे पाकिस्तानी माफिया से उसका माल छुड़ा देंगे, लेकिन उसके लिए एक शर्त रखी.

आईएसआई ने दाऊद के सामने पेशकश की कि अगर दाऊद मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके करवाने और फिर से दंगे करवाने में उनकी मदद करे तो दाऊद को उसकी चांदी वापस मिल जाएगी. इस डील में एक तरफ दाऊद का व्यावसायिक फायदा था तो दूसरी तरफ उसे मुंबई के मुसलमानों का खैरख्वाह बनने का मौका भी मिल रहा था. जनवरी 1993 के दंगों में मुंबई पुलिस पर मुसलमानों के खिलाफ पक्षपात करने का आरोप लगा था. दाऊद को मुंबई से उलाहना भरे संदेश आ रहे थे कि वो मुसलमानों की हिफाजत के लिए कुछ नहीं कर रहा. दोहरा फायदा देखते हुए दाऊद ने डील कुबूल कर ली.

दाऊद ने उस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी मुश्ताक उर्फ टाइगर मेमन को दी, जिसका मुंबई से सटे तटों पर स्मगलिंग का बड़ा नेटवर्क था. इस नेटवर्क को दाऊद फणसे उर्फ टक्ल्या संभालता था जिसके कई सारे बोट्स थे और इलाके में तैनात पुलिस और कस्टम अधिकारियों की वो नियमित रूप से जेबें गर्म रखता था. 12 मार्च 1993 को मुंबई की 13 ठिकानों पर जो बम फटे, उसके लिए RDX नाम का बारूद टक्ल्या ने ही रायगढ़ जिले के दिघी और शेखाडी के तटों पर उतारे थे. बारूद और हथियारों की कुछ खेप थाने जिले और गुजरात के तट पर भी उतारी गईं. जगह-जगह बम प्लांट करने का काम दाऊद के गुर्गों ने किया था. किसी देश की खुफिया एजेंसी की ओर से, अंडरवर्ल्ड का इस्तेमाल कर, दुश्मन देश में आतंकी घटना को अंजाम दिये जाने की ये सबसे बडी मिसालों में से एक है.

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फिर कोलकाता के अंडरवर्ल्ड का दहशतगर्दी में इस्तेमाल

22 जनवरी 2002 को कोलकाता के अमेरिकन सेंटर के बाहर अंधाधुंध गोलीबारी हुई. इसमें 6 पुलिसकर्मी मारे गये और 20 लोग घायल हुए. इस हमले को पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने कोलकाता के ही एक गैंगस्टर आफताब अंसारी के जरिये करवाया था. आफताब अंसारी पर कोलकाता, दिल्ली और कुछ दूसरे शहरों में हत्या, हत्या की कोशिश, जबरन उगाही और अपहरण के आरोप लगे थे. एक बार गिरफ्तार होने के बाद उसे तिहाड जेल में भी रखा गया था. जेल में उसकी मुलाकात जैश के आतंकी सय्यद उमर शेख से हुई, जिसके खिलाफ आतंकी मामलों में मुकदमे चल रहे थे. (इसी उमर को साल 1999 में कंधार हाईजैंकिंग कांड के दौरान भारत सरकार ने रिहा कर दिया था.)

आफताब अंसारी

जेल की मुलाकात के दौरान अंसारी और उमर के बीच एक डील हुई. उमर ने वादा किया कि जैश अंसारी को अपना गिरोह चलाने के हथियार मुहैया करायेगा और साथ ही पैसों के लेनदेन के लिये अपने हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल करने देगा. बदले में अंसारी जैश की आतंकी साजिशों को अमलीजामा पहनाने के लिये लड़कों की भर्ती करवायेगा. अंसारी ने कोलकता के कारोबारी पार्थ रॉय बर्मन के अपहरण से फिरौती में मिली रकम का एक बडा हिस्सा भी जैश को हवाला के जरिये भिजवाया था.

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तिहाड जेल से रिहा होने के बाद अंसारी दुबई भाग गया था और वहां पाकिस्तानी पासपोर्ट पर रह रहा था. अमेरिकन सेंटर पर हमले की जांच में जब पता चला कि मास्टरमाइंड अंसारी है तो भारत सरकार ने उसे दुबई से वापस लाने के लिये कूटनीतिक प्रयास शुरू किये. संयुक्त अरब अमीरात सरकार ने भारत से सहयोग किया और तीन हफ्तों बाद अंसारी को सीबीआई की टीम दुबई से डीपोर्ट करके भारत ले आयी.

इंडियन मुजाहिदीन और अंडरवर्ल्ड

साल 2008 से लेकर 2011 के बीच इंडियन मुजाहीदीन ने दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर समेत देश के कई हिस्सों में बम धमाके किये, जिनमें सैकडों लोगों की जान चली गयी. भारत में ही पैदा हुए आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने भी आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिये अंडरवर्ल्ड का इस्तेमाल किया. यही नहीं, इस संगठन के संस्थापकों में से एक रियाज शहबंदरी उर्फ रियाज भटकल खुद एक गैगस्टर था.

गिरोह में उसका सबसे खास साथी था निसार. रियाज और नासिर पहले दिल्ली के फजलू रहमान गैंग में साथ काम करते थे. फजलू के पकडे़ जाने पर दोनों ने मिलकर अपने नाम का “आर-एन” गैंग चलाना शुरू किया. इन्होने मुंबई में जबरन उगाही के लिये कई फोन किये थे और कुर्ला में एक शख्स की हत्या भी थी. साल 2004 में मुंबई क्राईम ब्रांच ने माटुंगा इलाके में नासिर को एक एनकाउंटर में मार गिराया. उसके पास से बडे पैमाने पर हथियार और विस्फोटक भी मिले थे. रियाज भटकल के बारे में बताया जाता है कि वो पाकिस्तान में है. साल 2010 में उसके मारे जाने की खबर भी आयी थी, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

अंडरवर्ल्ड के इंफ्रास्ट्रक्चर का आतंकियों ने किया इस्तेमाल

आतंकी संगठन कई तरीके से अंडरवर्ल्ड के संसाधनों का इस्तेमाल करते आये हैं. आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिये पैसों का लेन-देने अंडरवर्ल्ड के हवाला नेटवर्क से होता आया है. वारदातों के लिये लोगों को जुटाने का काम भी अंडरवर्ल्ड की मदद से होता है. गैंगस्टर अक्सर चोरी के वाहनों से वारदातों को अंजाम देते हैं, जिसके लिये वाहन चोरों के साथ उनकी सांठगांठ होती है. साल 2008 में इंडियन मुजाहिदीन ने गुजरात को दहलाने के लिये अंडरवर्ल्ड की खातिर काम करने वाले वाहन चोरों की मदद ली थी. 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में 21 बम फटे थे, जिनमें कि 56 लोग मारे गये. इसी तरह से सूरत में भी नरसंहार करने की साजिश थी. पुलिस को जांच में पता चला कि हमले में इस्तेमाल की गयीं चोरी की कारें अफजल उस्मानी नाम के शख्स ने अंडरवर्लड को कारें सप्लाई करने वाले शख्स से खरींदीं थीं.

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2023 में भी आया था मुन्ना झिंगाड़ा का नाम

शनिवार को दिल्ली में पकडे गये टेरर मोड्यूल से पता चला कि दाऊद इब्राहिम गिरोह का मुन्ना झिंगाड़ा उसका हैंडलर था. अब से तीन साल पहले भी झिंगाड़ा का नाम भारतीय जांच एजेंसियों की नजर में आ चुका है. 2023 में यूपी एसटीएफ और महाराष्ट्र एटीएस ने तीन लोगों को आतंकी साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था. उनसे पूछताछ में पता चला कि उनका हैंडलर पाकिस्तान में बैठा मुन्ना झिंगाड़ा था, जिसने साजिश पर अमल करने के लिये लोगों की भर्ती करने की जिम्मेदारी इन पर सौंपी थी. झिंगाड़ा के निशाने पर भारत के कुछ सैन्य ठिकाने थे.

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