इसी तरह मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली देते रहे तो... सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनाई के दौरान कहा कि कई सरकारें करोड़ों रुपये विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर सब्सिडी देने में खर्च कर रही हैं, जबकि वे बजट घाटे का सामना कर रही हैं और विकास एवं बुनियादी ढांचे के लिए धन की कमी की शिकायत कर रही हैं.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियां बांटने पर कड़ी आपत्ति जताई है
  • SC ने कहा कि मुफ्त खाना और बिजली जैसी सुविधाएं देने से विकास के लिए जरूरी पैसे कहां से आएंगे यह चिंता का विषय
  • इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जहां मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव भी चर्चा में है
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नई दिल्‍ली:

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले 'मुफ्त की रेवड़ियां' बांटने यानि फ्रीबीज पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है. राज्‍य सरकारों को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर वे इसी तरह 'मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली...' जैसी सुविधाएं देते रहे, तो डेवलेपमेंट के लिए पैसे कहां से बचेगा? इस साल पांच राज्‍यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. ‘तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड' ने एक याचिका दायर कर उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को फ्री बिजली देने  करने का प्रस्ताव दिया है. इसके बाद 'मुफ्त की रेवड़ियां' बांटने का मुद्दा एक बार फिर लाइमलाइट में आ गया है.  

घाटे में सरकारें, फिर भी बांट रहीं 'मुफ्त की रेवड़ियां'

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनाई के दौरान कहा कि कई सरकारें करोड़ों रुपये विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर सब्सिडी देने में खर्च कर रही हैं, जबकि वे बजट घाटे का सामना कर रही हैं और विकास एवं बुनियादी ढांचे के लिए धन की कमी की शिकायत कर रही हैं. कोर्ट ने चेतावनी दी कि अंधाधुंध मुफ्त सहायता, विशेष रूप से उन लोगों को जो उपयोगिताओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने में सक्षम हैं, इससे एक ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ है जो काम न करने को पुरस्कृत करती प्रतीत होती है.

मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति गलत 

सुप्रीम कोर्ट ने लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए गुरुवार को कहा कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है. शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर राज्य गरीबों की मदद करते हैं, तो यह बात पूरी तरह से समझ में आती है. देश के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि अधिकतर राज्यों का राजस्व घाटे में हैं, लेकिन वे विकास की अनदेखी करते हुए इस तरह की मुफ्त सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं.

'मुफ्त की रेवड़ियां' बांटने की जगह रोजगार देने पर दें जोर

अदालत ने कहा कि इस तरह की मुफ्त सुविधाएं देने से देश के आर्थिक विकास में बाधा पैदा होती है और राज्यों को सभी को मुफ्त भोजन, साइकिल और बिजली देने के बजाय रोजगार के अवसर खोलने के लिए काम करना चाहिए. हालांकि, अदालत ने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार के नेतृत्व वाली बिजली वितरण कंपनी की मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखने वाली याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया. बिजली वितरण कंपनी ने विद्युत संशोधन नियम, 2024 के एक नियम को चुनौती दी है. पीठ ने कहा, 'भारत में हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं? यह समझ में आता है कि कल्याणकारी कदमों के तहत आप उन लोगों को (नि:शुल्क) सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहते हैं, जो बिजली शुल्क चुकाने में असमर्थ हैं.'

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अचानक जेब ढीली करने का फैसला क्यों?

सीजेआई ने कहा, 'लेकिन जो वहन कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते, उनमें भेद किए बिना आप वितरण शुरू कर देते हैं. क्या यह तुष्टीकरण की नीति नहीं होगी?' पीठ ने पूछा कि बिजली शुल्क अधिसूचित होने के बाद तमिलनाडु की कंपनी ने अचानक जेब ढीली करने का फैसला क्यों किया. प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए. अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन देना शुरू कर देंगे, फिर मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा और फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा.' पीठ ने कहा कि राज्य विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय दो काम करते हैं- वेतन देना और इस तरह की मुफ्त सुविधाएं बांटना.

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