पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में तो पुरुषों पर पाबंदी, सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट में SG ने परंपरा-पाबंदियों का उठाया मुद्दा

Sabarimala Mandir Case in Supreme Court: केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में तीसरे दिन सुनवाई हुई. केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दूसरे मंदिर की परंपराओं का हवाला दिया.

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Sabarimala Mandir: सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा
नई दिल्ली:

Sabarimala Mandir Case in Supreme Court: सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश देने के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में तीसरे दिन सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने अपने पक्ष का बचाव करते हुए कहा, ये प्रथाएं लैंगिक भेदभाव' का हिस्सा नहीं है, बल्कि ये धार्मिक रीति-रिवाज, आस्था और विश्वास का हिस्सा है.ये अदालत की न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं है. उन्होंने देश के दूसरे मंदिरों में ऐसी ही परंपराओं की बात रखी. उन्होंने देश के ऐसे ही मंदिर, धर्म स्थलों की परंपराओं, रीति-रिवाजों का भी उल्लेख किया. इसमें कामाख्या मंदिर और पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर शामिल है.

एसजी मेहता की ओर से यह कहा गया है कि हिंदू धर्म की खास और अलग विशेषताओं, इसके रीति-रिवाजों, मान्यताओं, पूजा के तरीके और आर्टिकल 25 और 26 के तहत दूसरे धार्मिक अधिकारों को कभी भी बिना किसी बैलेंसिंग और ऑप्टिमाइजेशन के, आर्टिकल 14 की कसौटी पर सीधे नहीं परखा जा सकता. यह हिंदू धर्म ही है जिसमें हमेशा से “महिला” की पूजा करने का सिद्धांत रहा है, यहां तक ​​कि पुराने समय में भी. हिंदू धर्म ने न सिर्फ़ महिलाओं को बराबर माना है, बल्कि महिलाओं को पुरुषों से कहीं ज़्यादा ऊंचा दर्जा दिया है. कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म दुनिया का अकेला ऐसा धर्म है जहां देवियों की न सिर्फ पूजा होती है, बल्कि पुरुष उनके पैर छूते हैं और पवित्र ‘देवियों' के भक्त बन जाते हैं.  ऐसे उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि लिंग के आधार पर एंट्री की इजाज़त ‘लैंगिक भेदभाव' का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह धार्मिक रीति-रिवाज़, आस्था और विश्वास का हिस्सा है, जो कोर्ट के न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर होगा. 

1. अट्टुकल मंदिर

केरल में अट्टुकल भगवती मंदिर, जो महिलाओं की पूजा करता है, पोंगल त्योहार को होस्ट करने के लिए गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल हो गया है, जिसमें लगभग तीन मिलियन महिलाएँ हिस्सा लेती हैं. पुरुषों को इस मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं है, जहाँ त्योहार के दौरान महिलाओं की सबसे ज़्यादा भीड़ होती है.

 2. चक्कुलाथुकावु मंदिर

केरल का एक और मंदिर जो देवी भगवती की पूजा करता है और ‘नारी पूजा' नाम का एक सालाना रिवाज करता है, जिसमें पुरुष पुजारी दिसंबर के पहले शुक्रवार को 10 दिनों तक उपवास रखने वाली महिला भक्तों के पैर धोते हैं. इस दिन को धनु कहा जाता है. ‘नारी पूजा' के दौरान, सिर्फ़ महिलाओं को ही मंदिर में जाने की इजाज़त होती है. 

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3. भगवान ब्रह्मा मंदिर

राजस्थान के पुष्कर का यह 14वीं सदी का मंदिर शादीशुदा पुरुषों के अपने परिसर में आने पर रोक लगाता है. यह दुनिया का इकलौता ब्रह्मा मंदिर है 

4. भगवती मां मंदिर कन्याकुमारी

कन्याकुमारी में बना यह मंदिर कन्या माँ भगवती दुर्गा की पूजा करता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे तपस्या के लिए समुद्र के बीच एक सुनसान जगह पर गई थीं ताकि वे भगवान शिव को अपना पति बना सकें. पुराणों के अनुसार, एक सती की रीढ़ की हड्डी इस मंदिर पर गिरी थी. देवी को सन्यास की देवी भी कहा जाता है। इन वजहों से, सन्यासी पुरुषों को मंदिर के गेट तक जाने की इजाज़त है, जबकि शादीशुदा पुरुषों का मंदिर के अंदर जाना मना है.

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5. माता मंदिर, मुजफ्फरपुर

बिहार के मुजफ्फरपुर में मौजूद इस मंदिर में एक खास समय के दौरान पुरुषों का जाना पूरी तरह से मना है. नियम इतने सख्त हैं कि किसी पुरुष पुजारी को भी मंदिर के अंदर जाने की इजाज़त नहीं हैं. उस खास समय के दौरान सिर्फ़ महिलाओं को ही मंदिर में जाने की इजाज़त है.

 6. केरल का कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर

केरल के कोल्लम ज़िले के चावरा में कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर इस मंदिर में, पुरुष देवी माँ के प्रति अपनी भक्ति दिखाने के लिए महिलाओं के कपड़े पहनते हैं. इसे 'चमायाविलक्कू' की परंपरा कहा जाता है जो सदियों पुरानी है. पुरुष न सिर्फ़ केरल के कुछ हिस्सों से बल्कि आस-पास के दक्षिणी राज्यों से भी आते हैं, यह एक इवेंट है.

पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर

वहीं सबरीमला मंदिर मामले में तीसरे दिन की सुनवाई में SG तुषार मेहता ने कहा,  ऐसे कई मंदिर हैं जहां पुरुषों को जाने की इजाजत नहीं है, क्योंकि यह देवी भगवती का मंदिर है, इसलिए इससे कुछ खास धर्म और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. कुछ मंदिर हैं, जिनकी डिटेल मैंने बताई हैं, जहां पुरुष पुजारियों को महिला भक्तों के पैर धोने का धार्मिक अधिकार है. पुष्कर मंदिर जैसे मंदिर हैं, जो देश का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है, जहाँ शादीशुदा पुरुषों को जाने की इजाज़त नहीं है. 

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केरल के मंदिर में अनोखा रिवाज

केरल में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां यह रिवाज है कि पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर अंदर जाते हैं. जैसा कि मैंने डिटेल में पढ़ा है, वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं, और उनकी परिवार की महिला सदस्य उन्हें साड़ी और दूसरे कपड़े पहनाने में मदद करती हैं. वहां सिर्फ पुरुष ही जाते हैं, तो यह पुरुष-केंद्रित या महिला-केंद्रित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है. इस मामले में, यह महिला केंद्रित है. दूसरा, आर्टिकल 25 और 26 और उनके मतलब के बारे में एक सवाल था. एक दिन पहले, मैंने इस पर काफी बहस की थी. कल, जब मैंने शुरू किया था, तो मैंने कहा था कि मैं इसे आखिर में उठाऊंगा; नहीं तो, मैं दूसरे इश्यू खत्म नहीं कर पाता. मुझे उसके लिए टाइम नहीं मिला. मैं दोबारा बहस नहीं कर रहा हूं. असल में, मैंने इसका जवाब दे दिया है.

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उन्होंने 2018 के फैसले में दिए गए इंदु मल्होत्रा के असहमति  वाले निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन नहीं हुआ था. वहीं, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 2018 के फैसले में कोर्ट ने माना था कि यदि कोई गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठता है, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है, भले ही याचिकाकर्ता का सीधा संबंध न हो. उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि याचिका दाखिल करने के अधिकार का मुद्दा था, तो 2006 में ही याचिका खारिज हो जानी चाहिए थी. मामले में अब यह केंद्रीय फोकस बन गया है. क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, उस समूह की परंपराओं को चुनौती दे सकता है? सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यदि कोर्ट लोकस पर फैसला करता है, तो फिर मामले के अन्य संवैधानिक प्रश्नों पर भी विस्तार से सुनवाई होनी चाहिए. 
 

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