'सतलुज' की रियल कहानी: जसवंत सिंह खालड़ा केस और एक पत्नी की दशकों लंबी लड़ाई

दिलजीत दोसांझ की सतलुज फिल्म से जुड़े विवाद ने एक बार फिर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा और उनकी पत्नी की दशकों लंबी लड़ाई की याद दिला दी... कैसे पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण किया और फिर वे कभी नहीं दिखे.

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दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज के पीछे की कहानी

वो 6 सितंबर 1995 का ही दिन था जब  सुबह 9 बजकर 20 मिनट पर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर के कबीर पार्क में घर के बाहर अपनी कार धो रहे थे. तभी पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया और इसके बाद वह कभी नहीं दिखे. पंजाब में जब आतंकवाद चरम पर था उस समय जसवंत सिंह खालड़ा ने पंजाब पुलिस द्वारा गैरकानूनी तरीके से किए गए कई अंतिम संस्कारों और लोगों की जबरन गुमशुदगी जैसे खुलासे किए थे. बता दें कि 1995 से ही उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने अपने पति के लिए न्याय पाने की दशकों लंबी लड़ाई शुरू की थी और वह चाहती थीं कि उनके पति द्वारा सामने लाया गया सच दुनिया भुला न दे. चलिए अब बताते हैं कि आज खालड़ा की चर्चा क्यों कर रहे हैं तो बता दें कि दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज (Story of Satluj) जो कि खालड़ा की कहानी से प्रेरित है, उसे लेकर जो विवाद हुआ है, उसने एक बार फिर पंजाब के उस सच को सामने लाकर खड़ा कर दिया. वैसे ये फिल्म 2022 में पूरी हो गई थी, लेकिन सालों तक ये कानूनी और सेंसर की अड़चनों में फंसी रही. 2023 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसका प्रीमियर होना था, वो भी टल गया. आखिरकार 3 जुलाई को बिना कट के और नए टाइटल के साथ फिल्म रिलीज हुई, लेकिन Zee5 OTT प्लेटफॉर्म से इसे हटा दिया गया. 

सुप्रीम कोर्ट में ऐसे पहुंचा था खालड़ा केस

11 सितंबर 1995 में एक मैसेज सुप्रीम कोर्ट के पते पर नहीं बल्कि जस्टिस कुलदीप सिंह के रेजिडेंस ऑफिस में पहुंचा. इसे शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता गुरचरण सिंह तोहरा ने भेजा था. टेलीग्राम में गंभीर आरोप लगाया गया था कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का पंजाब पुलिस ने अपहरण कर लिया. दावे की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने असाधारण कदम उठाया. 11 सितंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने उस टेलीग्राम को ही बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (सशरीर प्रस्तुत किया जाए) मान लिया. पंजाब के गृह सचिव, डीजीपी और एसएसपी अमृतसर को एक हफ्ते में जवाब देने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने आदेश दिया कि नोटिस तुरंत टेलीग्राम, फोन और फैक्स से भेजे जाएं. इस दौरान खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर ने भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण की मांग की और कहा कि उनके पति को कोर्ट में पेश किया जाए. 

याचिका में लिखा गया कि 6 सितंबर 1995 को सुबह 9.20 पर खालड़ा अपनी कार धो रहे थे कि तभी आसमानी रंग की मारुति वैन आकर रुकी. उन्होंने काले पटके बांध रखे थे और उनके पास ऑटोमैटिक हथियार थे. इन चार वर्दीधारी पुलिसवालों ने उन्हें जबरन वैन में डाल दिया. साथ ही उन्होंने वॉकी-टॉकी पर कहा कि मिशन पूरा हो गया है. खालड़ा को हिरासत में ले लिया गया है. पीछे एक पुलिस जीप भी थी, जिसमें हथियारबंद जवान और एक सीनियर अफसर भी थे. चश्मदीद राजीव सिंह ने पास से ये सब देखा था. उसने इस मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की लेकिन उसे धकेल दिया गया. उसने वॉकी-टॉकी की बात सुन ली थी और वैन का नंबर नोट कर लिया था. पड़ोस के कई लोगों ने भी सुबह के समय ये घटना देखी थी.

(दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज का पोस्टर)

सुप्रीम कोर्ट ने CBI को दिया था 3 महीने में जांच पूरी करने का आदेश

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CBI को 3 महीने में जांच पूरी करने का आदेश दिया. 30 जुलाई 1996 को CBI ने कोर्ट में रिपोर्ट दी. पंजाब पुलिस अफसरों को खालड़ा के अपहरण के लिए जिम्मेदार बताकर उन पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की. CBI ने पाया कि खालड़ा को तरण तारन जिले के कांग पुलिस स्टेशन में रखा गया था, लेकिन 24 अक्टूबर 1995 के बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया और फिर उनका पता नहीं चला. 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने इस केस के दायरे को और बढ़ाया. खालड़ा और JS ढिल्लों ने 16 जनवरी 1995 को एक प्रेस नोट जारी किया था कि पंजाब पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों के शवों को 'अज्ञात' बताकर गैरकानूनी तरीके से जला दिया है.

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कोर्ट ने इसे भयावह बताया और CBI से जांच करवाई. दिसंबर 1996 में सीबीआई ने इस मामले में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी. इसमें 585 शव पूरी तरह पहचानने की बात की गई और  274 शवों को आंशिक रूप से पहचानने की बात कही गई और 1238 अज्ञात रहे. कोर्ट ने कहा कि ये 'बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन' है. कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को आगे जांच और एफआईआर दर्ज करने को कहा. पूरे मामले को नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन को भेजा गया. NHRC को पहचाने गए पीड़ित परिवारों को मुआवजे पर फैसला लेने को कहा और इस फैसले को तुरंत लागू करने के आदेश भी दिए.

(फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत खालड़ा का रोल निभाया है)

खालड़ा मामले में 5 पुलिस अफसरों को सजा

खालड़ा के गायब होने और हत्या के 16 साल बाद नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब पुलिस के 5 लोगों को दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा. पटियाला कोर्ट ने पहले 7 साल की सजा दी थी और 16 अक्टूबर 2007 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर उम्रकैद कर दिया. अफसरों में एक हेड कांस्टेबल, तीन सब-इंस्पेक्टर और एक DSP शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस बीएस चौहान ने हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराया. CBI की तरफ से पेश ASG मोहन जैन ने इस मामले को लेकर कहा था कि ऐसे मामले आम आदमी का कानून व्यवस्था पर भरोसा हिला देते हैं इसलिए कोर्ट का फर्ज है कि सख्त कदम उठाकर ये भरोसा फिर से बहाल करके मिसाल कायम करे.परमजीत कौर खालड़ा की लड़ाई आज भी जारी है ताकि उनके पति द्वारा उजागर किए गए सच को दुनिया भुला न दे. 

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