ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज लोकसभा में बहस, जानें पिछले प्रस्तावों का निकला क्या नतीजा ?

तीन ऐसे मौके आए जब लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया. पहले लोकसभा अध्यक्ष से लेकर बलराम जाखड़ तक, ये लोकसभा अध्यक्ष भी विपक्ष के निशाने पर रहे, जानें इसका रिजल्ट क्या निकला.

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लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए लाया जा रहा प्रस्ताव.
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  • स्वतंत्र भारत में लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए अब तक चार बार प्रस्ताव लाया गया है
  • संविधान के अनुच्छेद 94 (c) के तहत लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव सदन में पारित होना आवश्यक है
  • पहली बार लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव 1954 में लाया गया था लेकिन खारिज हो गया था
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नई दिल्ली:

स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में ये चौथा मौका होगा जब लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाया जा रहा है.  संविधान के अनुच्छेद 94 ( c ) में लोकसभा स्पीकर को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने और उसे सदन में पारित करवाए जाने का प्रावधान किया गया है. ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि इससे पहले लाए गए ऐसे प्रस्तावों का नतीजा क्या हुआ. क्या इससे पहले किसी लोकसभा स्पीकर को पद से हटाया जा सका है? 

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कब-कब लाया गया अविश्वास प्रस्ताव?

इससे पहले तीन ऐसे मौके आए जब लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया. सबसे पहले पहली लोकसभा के दौरान देश के पहले लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. 18 दिसंबर 1954 को गया उत्तर लोकसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के सांसद विज्ञेश्वर मिश्र ने प्रस्ताव पेश किया. प्रस्ताव पर बहस के लिए दो घंटे का समय आवंटित किया गया था, हालांकि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने और समय दिए जाने की वकालत की थी.  बहस में नेहरू के अलावा आचार्य कृपलानी , ए के गोपालन , सरदार हुकुम सिंह और एस एस मोरे जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया. बहस के बाद प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज़ कर दिया गया. बहस में लोकसभा अध्यक्ष मावलंकर ने हिस्सा नहीं लिया था. 

सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ लाया गया था अविश्वास प्रस्ताव

दूसरा मौक़ा आया 24 नवंबर 1966 को जब बिहार के ही मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सांसद मधु लिमये ने लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव पेश किया. हालांकि लोकसभा में प्रस्ताव पेश करने के लिए आवश्यक 50 वोटों की कमी के चलते उन्हें अनुमति नहीं मिल सकी और प्रस्ताव पेश ही नहीं हो सका था. प्रस्ताव के समर्थन में केवल 22 सांसदों ने ही अपने हाथ खड़े किए.  प्रस्ताव को राम मनोहर लोहिया जैसे दिग्गज समाजवादी सांसद ने भी समर्थन दिया था.

बलराम जाखड़ के खिलाफ लाया गया था अविश्वास प्रस्ताव

तीसरी बार 15 अप्रैल 1987 को तबके लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. पश्चिम बंगाल के बोलपुर लोकसभा क्षेत्र से सीपीएम के सांसद सोमनाथ चटर्जी ने प्रस्ताव पेश किया था. प्रस्ताव पर दो घंटे से थोड़ी ज़्यादा बहस की गई लेकिन संख्या बल की कमी के चलते ये प्रस्ताव भी पारित नहीं हो पाया. इस बहस में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अलावा सोमनाथ चटर्जी , पी चिदंबरम , मधु दंडवते और के सुरेश जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया. इनमें के सुरेश आज भी कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं जबकि पी चिदंबरम राज्यसभा सांसद. बहस में लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने हिस्सा नहीं लिया था. 

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