लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान क्यों हुआ नेहरू और राजीव गांधी का जिक्र

लोकसभा में अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र एक नहीं बल्कि दो बार हुआ.

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  • ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान पूर्व PM जवाहरलाल नेहरू का दो बार उल्लेख किया गया.
  • विपक्ष ने 10 फरवरी को अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ दिया था.
  • पाल ने कहा कि ओम बिरला का सदन में न आने और अध्यक्षीय कुर्सी न संभालने के फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.
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लोकसभा में अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान पूर्व PM जवाहरलाल नेहरू का नाम दो बार आया. पहली बार तब, जब सदन की कार्यवाही का संचालन कर रहे जगदंबिका पाल अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे थे. वहीं, दूसरी बार तब, जब संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने अपने वक्तव्य में उनका उल्लेख किया.

जगदंबिका पाल ने कहा कि विपक्ष ने जैसे ही लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया और यह प्रस्ताव अध्यक्ष सचिवालय को सौंपा गया, उसी दिन से ओम बिरला सदन की अध्यक्षीय कुर्सी पर नहीं बैठे हैं. विपक्ष 10 फरवरी को यह प्रस्ताव लेकर आया था. उसी दिन से ओम बिरला अध्यक्ष की कुर्सी से दूर हैं. उल्लेखनीय है कि बजट सत्र का पहला चरण 28 जनवरी से 13 फरवरी तक चला, फिर अवकाश हुआ और दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होकर 2 अप्रैल तक चलेगा.

जगदंबिका पाल ने कहा कि अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा सदन में न आने और कार्यवाही का संचालन न करने के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि जब जी. वी. मावलंकर और बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था, तब वे सदन में तो आते थे लेकिन प्रस्ताव पर चर्चा वाले दिन अध्यक्षीय कुर्सी पर नहीं बैठते थे.

नेहरू और राजीव गांधी के भाषणों का हवाला

नेहरू का जिक्र करते हुए पाल ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू ने भी अपने समय में ऐसे प्रस्तावों पर कहा था कि यह किसी दल का मामला नहीं है, इसलिए हर सदस्य को दलगत विचार से ऊपर उठकर विषय की गंभीरता को समझना चाहिए. नेहरू ने यह भी कहा था कि ऐसे गंभीर मुद्दों को हल्के में नहीं उठाना चाहिए और तुच्छ आरोपों के आधार पर आगे नहीं बढ़ना चाहिए. इसके साथ ही पाल ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भी वह भाषण याद दिलाया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय संसद की परंपरा रही है कि अध्यक्ष की निष्ठा और सदाशयता पर प्रश्न नहीं उठाया जाता, भले ही उनके निर्णयों से असहमति क्यों न हो. यदि हम अध्यक्ष की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हैं, तो हम स्वयं संसद की नींव को कमजोर करते हैं.

'नेहरू ने अपने वक्तव्य में कहा था...'

इसी तरह, सरकार की ओर से बोलते हुए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने भी 1954 में जी. वी. मावलंकर के खिलाफ आए अविश्वास प्रस्ताव का संदर्भ दिया और उस समय नेहरू द्वारा कही गई बातों का उल्लेख किया. नेहरू ने अपने वक्तव्य में कहा था कि जिन्होंने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए था कि वे किस पर हस्ताक्षर कर रहे हैं. उन्होंने इसे अत्यंत दुर्भावनापूर्ण दस्तावेज बताया था और कहा था कि यदि हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे पढ़ा होता, तो वे सौ बार सोचते और हिचकिचाते. नेहरू ने आगे कहा था कि ऐसी भाषा का प्रयोग बुद्धि का अपमान है और सदन में किसी से भी इसका समर्थन करवाना बुद्धि का अनादर है.

इस तरह, लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की बहस के दौरान जवाहरलाल नेहरू और राजीव गांधी का जिक्र दो बार प्रमुख रूप से आया.

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