PM नरेंद्र मोदी की झालमुड़ी वीडियो कहानी बन गई, पर क्या इससे वोट भी मिलेंगे?

झालमुड़ी वाला पल एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन ये एक पल पूरा चुनाव नहीं बदल सकता बल्कि केवल माहौल बदलता है. पर चुनाव में माहौल ही आगे का रास्ता भी तय कराता है. झालमुड़ी भले जीत का अवसर बना सकती है पर असल जीत किसकी होगी ये तो चुनाव ही तय करेगा.

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  • असली सवाल यही है- क्या इससे बीजेपी को वोट मिलेंगे?
  • झालमुड़ी वाला पल बेशक एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, लेकिन सिर्फ ये एक पल पूरा चुनाव नहीं बदल सकता.
  • झालमुड़ी भले ही जीत का अवसर बना सकती है पर असल जीत किसकी होगी ये तो चुनाव ही तय करेगा.
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19 अप्रैल को टीवी न्यूज पर जो तस्वीर दिखाई दी, वह ठीक वैसी ही थी जैसी शहर में कुछ खास तरह की खूशबू अचानक बिखरी हो और जिसे नजरअंदाज कर पाना नामुमकिन हो. इस तस्वीर में पश्चिम बंगाल के कस्बाई इलाके पुरुलिया के झालग्राम में अपने तूफानी प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सड़क किनारे एक दुकान पर चटपटे मसालेदार मुरमुरे से बनी झालमुड़ी खाते हुए दिखे, सड़क किनारे की तपिश और चिलचिलाती धूप के बीच इसे आम आदमी से प्रधानमंत्री के जुड़ाव के तौर पर पेश किया गया. उनकी बातचीत में यह स्पष्ट दिखा कि उसकी कीमत 10 रुपये थी.

रुपये केवल 10, असर जबरदस्त

दस रुपये में एक कटोरी झालमुड़ी का ऐसा आनंद देखकर लगा कि यह कैमरों के लिए नहीं, बल्कि भूख मिटाने के लिए बनाया गया है. फिर भी, उन पलों का असली जादू तो यह था कि वो बनावटी नहीं लगे. वे जरा भी राजनीति होने का दिखावा नहीं करते. वे सड़क किनारे की जिंदगी की लय अपना लेते हैं- ढाबे पर उस युवा दुकानदार के साथ बातचीत, मालिक को पैसे देने की जिद. प्याज खाने या न खाने पर बात. 
'प्याज खाता हूं, दिमाग नहीं,' जब मोदी ये बोले तो सहज हंसी आई. वो किसी तयशुदा चुनावी स्क्रिप्ट जैसी नहीं लगी. हाथ मिलाने का अंदाज भी ऐसा, मानो कह रहे हों- मुझे भी बंगाल के इस आम जन-जीवन की परंपरा का हिस्सा बनने दो.

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आम आदमी के साथ नजदीकी का एक प्रतीकात्मक इशारा

बंगाल में, जहां सार्वजनिक जगह पहचान का मंच भी होती है, वहां इस तरह के इशारों का असर और भी गहरा होता है. किसी इंसान को सिर्फ इस बात से नहीं आंका जाता कि वह क्या कहता है, बल्कि इस बात से भी आंकते हैं कि वो क्या करता हुआ दिखता है. इसका मकसद केवल खानपान से जुड़ने का नहीं था. यह प्रतीकात्मक था- आमजनों के साथ नजदीकी दिखाने का इशारा था.

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Photo Credit: ANI

मोदी की राजनीति की खास शैली

मोदी के राजनीतिक में एक लंबे समय से चला आ रहा पैटर्न है. जिसकी गवाही साक्षात उनका शरीर ही देता है. मई 2019 में केदारनाथ मंदिर के पास स्थित रुद्र गुफा में वो एक हफ्ते ध्यान कर रहे होते हैं. 12250 फीट की ऊंचाई पर इस गुफा से केदारनाथ मंदिर का एक शांत और मनमोहक नजारा दिखता है.

14 मई 2024 को मोदी पूरे हफ्ते एक अन्य जगह वाराणसी में काल भैरव मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं. चुनाव के लिए अपना नामांकन भरने से पहले, मोदी काशी के कोतवाल (वाराणसी के रक्षक देवता) से आशीर्वाद लेने के लिए इस मंदिर में जाते हैं. इससे पहले काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करने से पहले 13 दिसंबर 2021 को भी मोदी ने एक बार फिर काल भैरव मंदिर में पूजा की थी.

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फिर एक और हफ्ते 6 अप्रैल 2025 को मोदी ने तमिलनाडु के रामेश्वरम में रामनाथस्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की. इस यात्रा के दौरान, उन्होंने नए पंबन रेल पुल का उद्घाटन भी किया. अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह से ठीक पहले 20 जनवरी 2024 को भी उन्होंने इसी मंदिर के दर्शन किए थे. यह मंदिर भगवान राम से जुड़ा एक पवित्र तीर्थस्थल है, जिसे चारधामों में माना जाता है. यहीं पर 12 ज्योतिर्लिंगों में से रामनाथस्वामी भी मौजूद है.

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खाना, पूजा, ध्यान: तरीके तीन, मकसद एक

वाराणसी उत्तराखंड और रामेश्वरम- मोदी उन जगहों पर ध्यान और प्रार्थना करते हैं जो वहां आने वाले हर व्यक्ति को एक खास आध्यात्मिक माहौल से भर देती है. फिर इसी सिद्धांत का एक और रूप सामने आता है, जो अब जमीनी हकीकत के तौर पर दिखता है- वहीं मिलो जहां सभी मिलते हैं, वहीं खाओ जहां सभी खाते हैं. अंदाज तीन, पर भावना एक ही- नेता और जनता के बीच की दूरी को मिटाने की एक कोशिश. पहले के जमानों में, भाषणों और वादों के जरिए नजदीकी बनाई जाती थी, आज के दौर में नजदीकी उन तस्वीरों के जरिए दिखाई जाती है जो बिल्कुल स्वाभाविक लगे.

सोशल मीडिया ने वही किया जो वह ऐसी चीजों के साथ हमेशा करता आया है- उसने इस पल को लपक लिया, कुछ घंटों में ही करोड़ों व्यूज आ गए, इन तस्वीरों को देखने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई कि यह एक 'डिजिटल अलाव' की तरह बन गया- लाखों लोग इसके ईर्द-गिर्द इक्ट्ठे हो गए, इस पर बातें होने लगीं- ठीक वैसे ही जैसे ठंड के समय लोग अलाव के ईर्द-गिर्द जमा होकर लोग बातें करते हैं. यह बेहद ही साधारण सा दिखने वाला आम-जनजीवन का पल होता है. लेकिन राजनीति में, साधारण दिखना ही आज सबसे दुर्लभ चीज है.

झालमुड़ी स्टॉल का गणित

इस दृश्य में एक तरह का सीधा गणित छिपा है- अगर नेता खुद सड़क पर उतरता है, तो शायद सड़क (आम जन) भी उसके ऊपर उठ जाए. 
उनके विरोधियों ने इस जादू को तोड़ने की कोशिश की है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने इसे 'ड्रामा' कहा, और यह स्पष्ट रूप से कहीं कि वहां कई कैमरे लगे थे. यह चिरपरिचित आरोप है, जिसका मतलब भी साफ है कि अगर आपने इसे प्लान किया है तो यह असली नहीं है. प्रतीकात्मक राजनीति के साथ यही समस्या है, इसके आलोचकों को या तो इसकी छवि को एक राजनीतिक प्रयास के रूप में स्वीकार करना पड़ता है, या फिर इसे एक छलावा मानकर खारिज कर देना पड़ता है.

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लेकिन यहां सवाल यह नहीं है कि ये असली था या नहीं? बल्कि यह देखने में कैसा लगा? इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?  इसके ठीक विपरीत जब चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी कोलकाता के कॉलिंस स्ट्रीट पर एक आम चाय की दुकान पर रुकीं तो यह कुछ अलग दिखा. वो कुर्सी पर बैठी थीं, आसपास पार्टी नेता थे लेकिन माहौल में वो हल्कापन, बातचीत या हंसी नजर नहीं आई. वो साफ तौर पर कुछ चिंतित लग रही थीं. वहां न तो खुशी थी न ही हंसी.

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ट्रंप का मैकडॉनल्ड वाला किस्सा

ऐसा सिर्फ भारत में नहीं होता. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का मैकडॉनल्ड में काम करने और खाने का किस्सा भी इसी तरह का था- वो भी आम लोगों के साथ जुड़ाव दिखाने की कोशिश थी, जो मिसाल बन गई. वह समर्थकों के साथ जुड़ाव दिखाने का एक तरीका था. ट्रंप की राजनीति से कोई सहमत हो या नहीं, इस प्रक्रिया के सामने ये बेमानी है कि उनकी इस छवि ने अपनेपन और सम्मान, दोनों का संकेत दिया.

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झारग्राम में मोदी और बंगाल की याद

बंगाल में ऐसे इशारों की खास अहमियत होती है. यहां जो नेता आम जिंदगी से दूर दिखता है, उस पर शक होता है. झालमुड़ी सिर्फ खाना नहीं है- ये एक एहसास है. उसकी आवाज, उसका स्वाद, उसका मसाला- सब कुछ मिलकर एक पहचान बनाते हैं. मोदी ने जब इसे चखा तो वो केवल इसे खा नहीं रहे थे बल्कि एक बंगाली एहसास को अपना रहे थे.

क्या झालमुड़ी से वोट मिलेंगे?

अब असली सवाल यही है- क्या इससे बीजेपी को वोट मिलेंगे? इसका जवाब दो हिस्सों में है, पहला ये कि इस तस्वीर का चुंबकीय असर क्या होगा. बेशक यह तेजी से फैली और लोगों के दिमागों में भी बैठी. लोग शायद घोषणापत्र न पढ़ें पर ये याद जरूर रखते हैं कि कौन कहां किसके साथ खड़ा रहा था. लेकिन सच यह भी है कि चुनाव केवल भावनाओं से नहीं जीते जाते. इसके लिए संगठन, स्थानीय नेता, ग्राउंड वर्क और सही उम्मीदवार का होना जरूरी है.

इसमें झालमुड़ी वाला पल बेशक एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है, क्योंकि ये जनता और नेता के बीच की दूरी कम करता है. लेकिन सिर्फ ये एक पल पूरा चुनाव नहीं बदल सकता बल्कि केवल माहौल बदलता है. पर चुनाव में माहौल ही आगे का रास्ता भी तय कराता है. तो झालमुड़ी भले ही जीत का अवसर बना सकती है पर असल जीत किसकी होगी ये तो चुनाव ही तय करेगा.

आलोचक बेशक कहेंगे कि मोदी का आम लोगों जैसा अंदाज सिर्फ एक दिखावा है. समर्थक कहेंगे कि यह उन्होंने अपनी मेहनत से हासिल किया है. बात चाहे जो भी हो, चुनाव में इस दिखावे की नहीं, बल्कि इस बात की परख होगी कि इस दिखावे से क्या हासिल होता है, क्या इससे लोगों के मन में ऐसी सहानुभूति पैदा होती है जो वोटों में बदल जाए? क्या इससे किसी एक पार्टी का लोगों पर एकाधिकार टूटता है? और क्या इससे BJP को एक नई तरह की सामाजिक स्वीकार्यता मिलती है?

बंगाल या किसी चुनावी राज्य में लोगों की स्वीकार्यता सिर्फ एक वायरल क्लिप से नहीं मिलती. यह बार-बार दोहराने से बनती है कि कौन आता है, कितनी बार आता है, और जब कैमरे बंद हो जाते हैं, तब भी क्या उसका आना-जाना जारी रहता है. झालमुड़ी शायद दरवाजे खोल दे. लेकिन दरवाजे से अंदर कौन जाएगा, यह फैसला तो चुनाव ही करेगा.

और लोकतंत्र में, शायद यही सबसे पुरानी सच्चाई है- वोट भले ही गुप्त रूप से डाले जाते हों, लेकिन लोग अपने मन में जो कहानी लेकर वोट डालने जाते हैं, वह शायद ही कभी गुप्त होती है.

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