मानसून की सुस्त रफ्तार ने बढ़ाई टेंशन! जून में औसत से कम बारिश क्यों है बड़ी चिंता? जानिए कब मिलेगी राहत

Monsoon News : देश में मानसून की रफ्तार धीमी पड़ने से 1 जून से 16 जून के बीच सामान्य से 35% कम बारिश दर्ज की गई है. इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि खरीफ फसल की बुवाई के लिए पर्याप्त बारिश जरूरी है.

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Rain Update : बारिश औसत से 35% कम रिकॉर्ड की गयी है
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  • जून के महीने में सामान्य से लगभग 35 % कम बारिश दर्ज की गई है, जो मानसून की सुस्ती का संकेत है.
  • मध्य भारत और पूर्वी एवं उत्तरपूर्वी भारत में बारिश में क्रमशः 21 और 43 % की भारी कमी देखी गई है.
  • महाराष्ट्र के मुंबई में मानसून पांच दिन देरी से पहुंचा है, जबकि सामान्यतः यह 11ह जून को आता है.

Today weather :  देश में मानसून की रफ्तार अचानक धीमी पड़ने का असर अब दिखने लगा है. जून की शुरुआत में जहां बारिश ने अच्छी शुरुआत के संकेत दिए थे, वहीं अब इसका असर कमजोर पड़ता दिख रहा है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार 1 जून से 16 जून के बीच देश में सामान्य से करीब 35 % कम बारिश दर्ज की गई है. यह स्थिति खासतौर पर किसानों के लिए परेशानी का कारण बन रही है, क्योंकि खरीफ फसलों की बुवाई के इस अहम समय में उन्हें पर्याप्त बारिश का इंतजार है.

बारिश की कमी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि जलस्तर, नदियों और जलाशयों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है. कई राज्यों में धान, मक्का और दालों की बुवाई मानसून पर ही निर्भर करती है, ऐसे में देरी या कमी फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसून की इस सुस्ती के पीछे कई मौसमी कारण हो सकते हैं, लेकिन यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है.

अब तक औसत से काफी कम बारिश रिकॉर्ड

इस साल जून महीने के दौरान देश में अब तक औसत से काफी कम बारिश रिकॉर्ड की गयी है. भारत मौसम विभाग की ओर से मंगलवार को जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 01 जून से 16 जून के बीच देश में बारिश औसत से 35% कम रिकॉर्ड की गयी है. आमतौर पर 01 जून से 16 जून के बीच देश में औसतन 68.1 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन इस साल अब तक सिर्फ 44 मिलीमीटर बारिश हुई है.

सबसे ज़्यादा कमी सेंट्रल इंडिया क्षेत्र में दर्ज़ की गयी है, जहां 01 जून से 16 जून के बीच औसत से 61% कम बारिश दर्ज़ की गयी है. दूसरी सबसे ज़्यादा बारिश की कमी पूर्वी और उत्तरपूर्वी भारत में देखी गयी जहां इन 16 दिनों के दौरान औसत से 43% कम बारिश हुई है. दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की कमी 14% रही, उत्तर-पश्चिम भारत देश का एकमात्र क्षेत्र रहा जहां बारिश औसत से 5% ज़्यादा रिकॉर्ड की गयी है.

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मुंबई में भी अभी तक नहीं पहुंचा मानसून

इसकी एक बड़ी वजह दक्षिण-पश्चिम मानसून का धीमा पड़ना है. मॉनसून ने इस साल तीन दिन की देरी से केरल में दस्तक दी, और  पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र और पूर्वी भारत के राज्यों में इसके आगे बढ़ने की रफ़्तार थम गयी है. उदाहरण के लिए मॉनसून के मुंबई पहुंचने की नार्मल डेट 11 जून है, लेकिन इसके पांच दिन बाद भी मॉनसून मुम्बई नहीं पहुंचा है.  

कमजोर मॉनसून के असर से निपटने की तैयारी शुरू

भारत मौसम विभाग ने मंगलवार को कहा कि अगले 4-5 दिनों के दौरान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ और हिस्सों और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए हालात अनुकूल हैं. उधर भारत सरकार ने कमज़ोर मॉनसून के असर से निपटने की तैयारी शुरू कर दी है.

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कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की समीक्षा बैठक

केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को एक कृषि समीक्षा बैठक में खरीफ 2026 को लेकर की गयी तैयारियों की समीक्षा की. कृषि मंत्रालय के मुताबिक बैठक में अल नीनो की संभावित स्थिति पर चर्चा करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने साफ निर्देश दिया कि जिन जिलों में कम बारिश या वर्षा में असमानता की आशंका है, वहां पहले से पूरी तैयारी की जाए. ऐसे जिलों की स्पष्ट पहचान कर राज्य सरकारों के साथ मिलकर फसलवार कंटिंजेंसी प्लान तैयार किए जाएं, ताकि किसी भी मौसमीय चुनौती की स्थिति में किसानों को तुरंत विकल्प, सलाह और सहायता उपलब्ध कराई जा सके. पानी के संरक्षण, नमी प्रबंधन, इंटरक्रॉपिंग और वैकल्पिक फसल पैटर्न पर विशेष ध्यान देते हुए, हर जोखिम वाले जिले के लिए अलग और व्यावहारिक रणनीति बनाई जाए.

अल नीनो का असर... ग्रीष्मकालीन मानसून कमजोर

नया अल नीनो चरण आधिकारिक तौर पर शुरू होने के साथ खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी दी है कि यह भारत के ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे महत्वपूर्ण खरीफ सत्र के दौरान चावल और मक्का सहित वर्षा आधारित फसलें दबाव में आ सकती हैं. संयुक्त राष्ट्र निकाय ने कहा कि मौसम की यह परिघटना उन क्षेत्रों में कृषि पर निर्भर आजीविका और खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ाती है, जो पहले से ही संकटग्रस्त हैं. एफएओ ने अपनी वेबसाइट पर कहा, ‘‘एशिया में इसका खतरा सिर्फ खेतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरे वैश्विक बाजारों तक फैला हुआ हैय अल नीनो भारत के अधिकतर हिस्सों में ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे चावल और मक्का जैसी वर्षा आधारित फसलें प्रभावित हो सकती हैं.

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