अवैध प्रवासियों को देश से बाहर कैसे भेजेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और 10 राज्यों से एक हफ्ते में मांगा जवाब

न्यायमूर्ति बागची ने केंद्र से कहा कि पड़ोसी देशों के साथ हमें साझा संस्कृति और भाषा की विरासत मिली है. एक बार जब कोई व्यक्ति भारतीय भूभाग में आ जाता है, तो उसे निर्वासित करने की कोई प्रक्रिया होनी चाहिए.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से गृह मंत्रालय के पुश-बैक सर्कुलर की प्रक्रिया पर एक सप्ताह में जवाब मांगा है.
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब और बंगाल, दोनों राज्यों की संस्कृति और भाषा सीमावर्ती राज्यों के समान है.
  • साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र को निर्वासन के संबंध में अपनाई जा रही मानक प्रक्रिया (SOP) बतानी चाहिए.
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नई दिल्‍ली :

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के मामले में अधिकारियों के सामने आ रही दोहरी चुनौती पर चिंता व्यक्त की है. न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने कहा कि अदालत के सामने दो बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं - एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविक चिंता है, तो दूसरी ओर भारत को अपने पड़ोसियों के साथ साझा संस्कृति और भाषा की विरासत मिली है - जहां पाकिस्तान में पंजाबी भाषी नागरिक हैं और बांग्लादेश में बंगाली भाषी नागरिक हैं. बांग्लाभाषी मुसलमानों को बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर निर्वासित करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और 10 राज्यों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए वे क्या प्रक्रिया अपना रहे हैं. न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने नोटिस जारी कर सरकार से एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है.

'पुश-बैक' सर्कुलर पर अंतरिम रोक नहीं

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय के 'पुश-बैक' सर्कुलर पर अंतरिम रोक नहीं लगाई, जिसे याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है. उनका दावा है कि इसके परिणामस्वरूप विभिन्न भारतीय राज्यों से बंगाली भाषी मुस्लिम मजदूरों को उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना अवैध रूप से निर्वासित किया गया है.

याचिकाकर्ता संगठन - पश्चिम बंगाल प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड ने आरोप लगाया है कि प्रवासी श्रमिकों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जा रहा है और मई 2025 के गृह मंत्रालय (एमएचए) के परिपत्र के तहत निर्वासित किया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सहित 10 राज्यों को नोटिस जारी किया

पिछली सुनवाई में निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने केंद्र, ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पश्चिम बंगाल सरकारों को नोटिस जारी किया था. आज, शीर्ष अदालत ने गुजरात को भी नोटिस जारी किया, जिससे वह सुनवाई का हिस्सा बनने वाला दसवां राज्य बन गया.

संगठन ने बंगाली भाषी मुस्लिम प्रवासी मज़दूरों की हिरासत पर चिंता जताई है, जिन्हें कथित तौर पर कई राज्यों में बिना दस्तावेज़ वाले बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में पकड़ा गया था. गृह मंत्रालय का यह सर्कुलर अप्रैल 2025 में देश पर हुए पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद आया है.

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निर्वासित करने की एक प्रक्रिया होनी चाहिए- SC

याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने शीर्ष अदालत को बताया कि कभी-कभी ये बीएसएफ वाले कहते हैं कि तुम उस तरफ भाग जाओ, वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे. इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची ने कहा कि एक बार जब कोई व्यक्ति भारतीय भूभाग में आ जाता है, तो उसे निर्वासित करने की कोई प्रक्रिया होनी चाहिए.

हालांकि, केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात पर आपत्ति जताई कि यह संगठन शीर्ष अदालत में याचिका क्यों दायर कर रहा है, बल्कि पीड़ित व्यक्तियों को तो यहां आना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत अवैध प्रवासियों के लिए दुनिया की राजधानी नहीं है.

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कुछ संगठन अवैध प्रवासियों के बल पर फल-फूल रहे हैं- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि हम चाहते हैं कि आप 'किसी भाषा का इस्तेमाल किसी विदेशी होने की धारणा के रूप में' पूर्वाग्रह को स्पष्ट करें. हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि कुछ संगठन अवैध प्रवासियों के बल पर फल-फूल रहे हैं. उन्होंने कहा, “हम बस यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रवासी हमारे संसाधनों को नष्ट न करें. एक व्यवस्थित घुसपैठ है. हम मीडिया रिपोर्टों पर भरोसा नहीं कर सकते... ऐसे एजेंट हैं जो अवैध प्रवेश में मदद करते हैं.”

वहीं अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि अगर बीएसएफ को लगता है कि कोई बांग्लादेशी है, तो वह मनमाने ढंग से उसे बांग्लादेश नहीं भेज सकती. इसके बाद न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने केंद्र से अवैध प्रवासियों को पकड़ने और उन्हें वापस बांग्लादेश भेजने में अधिकारियों द्वारा अपनाई जा रही मानक प्रक्रिया (एसओपी) की जानकारी मांगी.

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न्यायमूर्ति बागची ने केंद्र से कहा कि दो बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं. उन्होंने कहा, “एक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा है. यह तो कहने की ज़रूरत ही नहीं है. साथ ही, हमें साझा संस्कृति और भाषा की विरासत भी मिली है. हम अखबारों की रिपोर्टों के आधार पर कुछ नहीं कहते. हम आपसे इस रुख को स्पष्ट करने का अनुरोध करते हैं.”

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