हरीश राणा को इच्छामृत्यु की इजाजत, लेकिन अरुणा शानबाग को नहीं, आखिर दोनों केस में अंतर क्या है?

भारत में इच्छामृत्यु पर चर्चा तब तेज हुई जब दो अलग-अलग मामलों में कोर्ट को यह तय करना पड़ा कि किसी व्यक्ति को लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दी जाए या नहीं. अरुणा शानबाग केस और हरीश राणा मामलों में कुछ बड़े अंतर हैं जिन्हें आसान भाषा में समझते हैं.

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  • भारत में इच्छामृत्यु पर बहस तेज हुई है, जहां कोर्ट ने हाल ही में मानवीय आधार पर अनुमति दी है.
  • अरुणा शानबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को शर्तों के साथ मान्यता दी लेकिन अनुमति नहीं दी.
  • हरीश राणा के मामले में परिवार ने इच्छा मृत्यु की अनुमति कोर्ट से मांगी, जो फैसले में अहम रही.
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नई दिल्ली:

भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. हालिया हरीश राणा मामले में जहां कोर्ट ने मानवीय आधार पर इच्छा मृत्यु की इजाजत देने का रुख दिखाया, वहीं अरुणा शानबाग केस की याद फिर ताजा हो गई, जहां सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति देने से इनकार कर दिया था. दोनों मामलों की तुलना बताती है कि कानून से ज्यादा यह फैसला परिस्थितियों, परिवार की भूमिका और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है.

क्या था अरुणा शानबाग का केस?

अरुणा शानबाग मुंबई के KEM हॉस्पिटल में नर्स थीं. 1973 में यौन उत्पीड़न के बाद स्थायी कोमा जैसी स्थिति में चली गई थीं. करीब चार दशक तक वे अस्पताल में रहीं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर थीं. ऐसे में जब 2009 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी, लेकिन अरुणा को इसकी अनुमति नहीं दी. इसकी बड़ी वजह यह थी कि अस्पताल की नर्सें और स्टाफ उनके जीवन को जारी रखने के पक्ष में थे और उन्होंने खुद को ही उनका परिवार बताया.

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हरीश राणा के मामले में कैसे मिली इजाजत

इसके उलट हरीश राणा के मामले में तस्वीर अलग है. यहां मरीज गंभीर बीमारी और असहनीय पीड़ा से गुजर रहा है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके माता-पिता खुद कोर्ट से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांग रहे हैं. परिवार का यह रुख कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि यह दिखाता है कि मरीज के सबसे करीबी लोग भी मानते हैं कि अब जीवन केवल कष्ट बन चुका है और गरिमा के साथ मृत्यु ही बेहतर विकल्प है.

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कोर्ट कैसे करता है फैसला?

भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर कानून स्पष्ट रूप से सक्रिय (Active) और निष्क्रिय (Passive) रूपों में अंतर करता है. सुप्रीम कोर्ट ने 2011 और 2018 के अपने फैसलों में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को अनुमति दी है, जिसमें लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाकर मरीज को प्राकृतिक मृत्यु की ओर बढ़ने दिया जाता है. वहीं सक्रिय इच्छा मृत्यु, जिसमें किसी इंजेक्शन या दवा से जानबूझकर जीवन समाप्त किया जाता है, अब भी अवैध है. इसके साथ ही 'लिविंग विल' यानी पहले से लिखी गई इच्छा को भी कानूनी मान्यता दी गई है. बता दें कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है और लोग 'Living Will' बना सकते हैं.

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इन दोनों मामलों से यह साफ होता है कि अदालतें हर मामले को अलग-अलग आधार पर परखती हैं. अरुणा केस में जहां देखभाल करने वाले जीवन बचाने के पक्ष में थे, वहीं हरीश के केस में परिवार खुद पीड़ा से मुक्ति की मांग कर रहा है. यही अंतर दोनों फैसलों की दिशा तय करता है. अंततः सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या जीवन केवल सांसों का नाम है, या उसमें गरिमा और पीड़ा से मुक्ति भी उतनी ही अहम है.

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