सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम कानूनी सवाल की जांच करने का फैसला किया. सवाल यह है कि क्या लिव इन रिलेशनशिप या विवाह जैसे संबंध में रह रही महिला द्वारा पुरुष के खिलाफ दहेज प्रताड़ना से जुड़े अपराध (आईपीसी की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता, 2023 की समकक्ष धारा) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.
कर्नाटक सरकार को भी नोटिस जारी
यह मुद्दा वैवाहिक कानून और आपराधिक दायित्व की सीमा तय करने के लिहाज से अहम है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय को इस मामले में पक्षकार बनाने का आदेश दिया. साथ ही केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सहयोग मांगा. कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को भी इस मामले में नोटिस जारी किया.
FIR कराने वाली महिला विवाहित पत्नी नहीं
यह मामला शिवमोग्गा के एक हृदय रोग विशेषज्ञ लोकेश बी.एच. द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट के 18 नवंबर 2025 के फैसले को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील आनंद संजय एम नुली ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने उन एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया, जो एक ऐसी महिला द्वारा दर्ज कराई गई थीं, जो उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है.
जानें क्या है याचिकाकर्ता की दलील?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धारा 498ए का कठोर प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू होता है. हालांकि, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यह व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के विपरीत है. सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील नीना आर. नरीमन को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया और उनसे 9 मार्च 2026 तक लिखित दलीलें दाखिल करने के लिए कहा है.














