दाल-चावल की कमी नहीं, फिर भी भारत कुपोषित क्यों? थिंक टैंक की रिपोर्ट ने बताई पूरी सच्चाई

India Malnutrition Paradox: दाल-चावल से पेट भर रहा है, इसके बावजूद बच्चों में एनीमिया, महिलाओं में कमजोरी और युवाओं में माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं. आखिर इसकी वजह क्या है?

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हमारा भोजन कैलोरी-केंद्रित हो गया है, पोषण-केंद्रित नहीं.

भारत को अक्सर कृषि प्रधान देश कहा जाता है. हमारी थाली में दाल, चावल और रोटी जैसी चीजें सदियों से मौजूद रही हैं. ये भोजन न सिर्फ हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोज की जरूरत भी हैं. लेकिन, आज एक बड़ा और चौंकाने वाला सवाल हमारे सामने खड़ा है. जब पेट भर रहा है, तब भी कुपोषण क्यों खत्म नहीं हो रहा? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि बीते 50 सालों में भारत ने अनाज उत्पादन में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. आज देश न सिर्फ अपने 140 करोड़ लोगों का पेट भर रहा है, बल्कि अनाज का निर्यात भी कर रहा है. इसके बावजूद बच्चों में एनीमिया, महिलाओं में कमजोरी और युवाओं में माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं. आखिर इसकी वजह क्या है?

पेट भरने वाला खाना, लेकिन पोषण क्यों कम?

आज भारत में जो भोजन सबसे ज्यादा खाया जाता है, वह है दाल, चावल और रोटी. यह खाना पेट भर देता है, एनर्जी भी देता है, लेकिन इसमें वह विविधता नहीं है जो शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व दे सके.

थिंक टैंक (अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर अनुसंधान के लिए भारतीय परिषद) ICRIER की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारा भोजन कैलोरी-केंद्रित हो गया है, पोषण-केंद्रित नहीं.

पिछले कुछ दशकों में खेती का फोकस सिर्फ गेहूं और चावल जैसे अनाजों पर रहा. मोटे अनाज, दालों की विविध किस्में, फल और सब्ज़ियों का उत्पादन अपेक्षाकृत कम हुआ. नतीजा यह हुआ कि लोगों को भरपूर कैलोरी तो मिल रही है, लेकिन आयरन, जिंक, विटामिन-A, प्रोटीन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व कम पड़ रहे हैं.

कुपोषण का नया चेहरा, छुपी हुई भूख

आज का कुपोषण पहले जैसा नहीं है, जहां लोग भूखे मरते थे. इसे अब छुपी हुई भूख (Hidden Hunger) कहा जाता है. इसमें व्यक्ति दिखने में सामान्य लगता है, पेट भी भरा होता है, लेकिन शरीर अंदर से कमजोर होता है. बच्चे लंबाई के हिसाब से कमजोर रह जाते हैं, महिलाएं एनीमिया का शिकार होती हैं. युवाओं में थकान, इम्यूनिटी की कमी और हार्मोनल समस्याएं बढ़ती हैं. यह सब इस बात का संकेत है कि खाना पर्याप्त है, लेकिन संतुलित नहीं.

खेती से लेकर थाली तक, कहां हो रही चूक?

ICRIER की रिपोर्ट बताती है कि समस्या सिर्फ खाने की आदतों की नहीं, बल्कि पूरी फूड सिस्टम की है:

  • खेती का एकतरफा मॉडल: ज्यादा गेहूं-चावल, कम विविध फसलें.
  • पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS): इसमें भी चावल-गेहूं का ही बोलबाला.
  • शहरी लाइफस्टाइल: प्रोसेस्ड और सस्ता खाना प्राथमिकता बन गया.
  • जागरूकता की कमी: लोग पेट भरने को ही सेहत मान लेते हैं.

इस समस्या का समाधान क्या है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि कुपोषण से लड़ने के लिए सिर्फ ज्यादा खाना नहीं, बल्कि बेहतर खाना जरूरी है. मोटे अनाज (मिलेट्स) को फिर से थाली में जगह देनी होगी. दालों, हरी सब्ज़ियों और फलों की उपलब्धता बढ़ानी होगी. सरकारी योजनाओं में पोषण की क्वालिटी पर जोर देना होगा. लोगों को यह समझाना होगा कि सिर्फ दाल-चावल काफी नहीं है.

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भारत ने भूख की लड़ाई जीत ली है. लेकिन, पोषण की लड़ाई अभी बाकी है. दाल-चावल से पेट तो भर रहा है, लेकिन शरीर की जरूरतें अधूरी रह जा रही हैं. ICRIER जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट हमें चेतावनी देती है कि अगर अब भी हमने अपने खाने और खेती दोनों में बदलाव नहीं किया, तो कुपोषण का यह शांत संकट आने वाले समय में और गहरा सकता है.

(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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