- 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' से लेकर 'टेंपल ऑफ हेवन' तक ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात राजनीतिक संकेतों से भरपूर रही.
- पर जिस बात की संभावना पहले से ही रही थी वही हुआ. जिनपिंग ने ट्रंप से 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' का जिक्र कर दिया.
- जिनपिंग ने सवाल उठाया, “क्या चीन और अमेरिका इस तथाकथित थ्यूसीडाइड्स ट्रैप से ऊपर उठ सकते हैं?”
Thucydides Trap- बीजिंग के 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' से लेकर ऐतिहासिक 'टेंपल ऑफ हेवन' तक हुई डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात राजनीतिक संकेतों, बॉडी लैंग्वेज, मीडिया ड्रामे और सोशल मीडिया मीम्स से भरपूर रही. लेकिन इस दौरान जिनपिंग कुछ ऐसा कह गए जिसने इन दोनों राष्ट्रपतियों के बीच हुई पिछली मुलाकात की याद दिला दी.
दरअसल, इस बैठक का सबसे दिलचस्प पल तब आया जब शी जिनपिंग ने 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' का जिक्र किया.
यह शब्द प्राचीन यूनानी इतिहासकार की थ्यूसीडाइड्स की उस थ्योरी से जुड़ा है, जिसमें बताया गया है कि जब कोई उभरती हुई ताकत, पहले से मौजूद महाशक्ति को चुनौती देती है तो युद्ध की संभावना बढ़ जाती है.
400 ईसा पूर्व में एथेंस तेजी से उभर रहा था, तब पहले से मौजूद स्पार्टा सुपरपावर उससे असहज हो गया. एथेंस के उभार ने स्पार्टा के मन में डर पैदा कर दिया और युद्ध जरूरी हो गया. इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स ने इसका इस्तेमाल यूनान और स्पार्टा के बीच युद्ध के संदर्भ में किया था.
जिनपिंग पहले भी इस शब्द का इस्तेमाल कई बार कर चुके हैं. इस बार शी जिनपिंग ने सवाल उठाया, “क्या चीन और अमेरिका इस तथाकथित थ्यूसीडाइड्स ट्रैप से ऊपर उठ सकते हैं?”
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि इस सवाल का जवाब दोनों देशों के नेता मिलकर लिखेंगे.
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Photo Credit: AFP
जिनपिंग क्या इशारा कर रहे थे?
जानकारों के मुताबिक ये बयान सीधे तौर पर अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता और संभावित टकराव की ओर इशारा था.
चीनी राष्ट्रपति ने सालों से चले आ रहे तनाव को देखते हुए अमेरिका के लिए इसका इस्तेमाल किया गया होगा. आज अगर कोई अमेरिका की वैश्विक ताकत को चुनौती दे रहा है तो वो है चीन जो अपनी अर्थव्यवस्था, टेक्नोलॉजी और सैन्य मजबूती से दुनिया की दूसरी महाशक्ति बन कर उभरा है.
हालांकि दोनों देश एक दूसरे के साथ कोई लड़ाई नहीं चाहते, पर दोनों के बीच प्रतिद्वंद्विता अपने आप में एक दबाव बनाता है जिसे नियंत्रित करना आसान नहीं है.
जिनपिंग का यह संदेश पिछले कई वर्षों से ऐसा ही बरकरार है. चीन का यह मानना है कि दोनों देशों को अपना-अपना वर्तमान अस्तित्व बरकरार रखने के लिए एक दूसरे का आदर करना होगा और एक दूसरे के साथ इस तरह सहयोग करना होगा जिसमें न किसी की हार हो न ही जीत.
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