महाभारत तक आमतौर पर हर भारतीय को कहानी पता है कि उस समय भारत बहुत मजबूत स्थिति में था. मगर उसके बाद का इतिहास बहुत टुकड़ों में मिलता है. पांडवों ने 36 वर्ष तक राज्य करने के बाद कलयुग के आगमन को देखते हुए सिंहासन त्याग दिया और हिमालय की ओर निकल गए. इसके बाद अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के बेटे परीक्षित राजा बने. उन्होंने करीब 60 सालों तक हस्तिनापुर पर राज किया.
कहां तक था हस्तिनापुर का राज
विश्वेश्वर रेउ की किताब 'भारत के राजवंश' के अनुसार, महाभारत के युद्ध में दो करोड़ से ज्यादा योद्धाओं ने युद्ध में भाग लिया था. मतलब साफ है कि भारत की सीमाएं दूर-दूर तक फैली थीं और कई दूसरे देशों के राजाओं ने भी इस युद्ध में भाग लिया था. उत्तर में भारत की सीमाएं तिब्बत तक फैली हुई थीं और बद्रीनाथ धाम के पास माणा गांव अंतिम स्थान माना जाता था. पांडवों ने यहीं से स्वर्ग जाने की यात्रा शुरू की थी. वहीं पश्चिम में गांधार राज्य था. जिसकी सीमाएं अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और ईरान के कुछ हिस्सों तक लगती थीं. पूर्व में कामरूप आज के असम से लेकर म्यांमार और कंबोडिया तक सीमा थी. वहीं दक्षिण में कन्याकुमारी तक सीमा थी.
कलयुग और परीक्षित की मुलाकात
इतनी बड़ी सीमा में राजा तो कई थे, पर सम्राट राजा परीक्षित ही थे. राजा परीक्षित को काफी दयालु माना जाता था. वो धर्म के मार्ग पर चलते थे. इस संबंध में भागवत में एक कथा भी है. एक दिन राजा परीक्षित को पता चला कि हस्तिनापुर से लेकर पूरे भारत में कलियुग आ चुका है. परीक्षित उसे अपने राज्य से बाहर रखना चाहते थे. कुछ दिनों बाद उन्होंने देखा कि एक गाय और एक बैल डरे हुए से खड़े हैं. एक शूद्र जिसका वेष, भूषण और ठाट-बाट राजा के जैसा था, उनको प्रताड़ित कर रहा है. बैल का बस एक पैर था. यह देख परीक्षित ने तीनों से परिचय पूछा तो तीनों ने अपना-अपना परिचय दिया. गाय पृथ्वी, बैल धर्म और शूद्र कलियुग था. धर्मरूपी बैल के सत्य, तप और दयारूपी तीन पैर कलियुग ने काट डाले थे. वो बस एक पैर दान के सहारे खड़ा था और उसको भी कलियुग काटना चाहता था. यह सब सुनकर परीक्षित को कलियुग पर गुस्सा आया और उन्होंने कलियुग को मारने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लिए. मगर वो गिड़गिड़ाने लगा. उसने कहा कि अभी वो वापस नहीं जा सकता है. ये ईश्वर का विधान है. तब परीक्षित ने उसके रहने के लिये पांच स्थान दिए. ये थे जुआ, काम, शराब, हिंसा और स्वर्ण. इन पांच स्थानों को छोड़कर दूसरी जगह नहीं रहने की कलियुग ने प्रतिज्ञा की.
कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत
इस घटना के कुछ समय पश्चात महाराज परीक्षित एक दिवस शिकार खेलने गए. कलियुग जानता था कि परीक्षित के रहते वो बढ़ नहीं सकता. तो वो राजा के स्वर्ण मुकुट में ही समा गया. राजा ने वन में आखेट की इच्छा से एक हिरन के पीछे घोड़ा दौड़ा दिया. बहुत दूर तक पीछा करने के पश्चात भी हिरण हाथ नहीं आया तो उन्हें प्यास लगी. तभी एक वृद्ध ऋषि शमीक का आश्रम उन्हें दिखा. राजा ने उनसे प्रश्न किया कि 'क्या वह बता सकते हैं कि हिरण किस ओर गया है ? ऋषि मौनी थे, इसलिये राजा की प्रश्न का कुछ उत्तर न दे सके. प्यासे परीक्षित को ऋषि के इस व्यवहार से बड़ा क्रोध हुआ. कलियुग सिर पर सवार था ही, परिक्षित ने तय कर लिया कि ऋषि ने घमंड में उत्तर नहीं दिया और इस अपराध का उन्हें दंड मिलना चाहिए. पास ही एक मरा हुआ सांप पड़ा था. राजा ने तीर की नोक से उसे उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और वहां से चले गए. कुछ देर बाद शमक ऋषि के श्रृंगी नाम के पुत्र आए. वह पिता की स्थिति देख नाराज हो गए. उन्होंने पिता के इस अपमान को देखकर हाथ में जल लेकर श्राप दिया कि जिस पापत्मा ने मेरे पिता के गले में मरा सांप डाला है, सात दिन के भीतर ही तक्षक नाम का सर्प उसे डसकर मृत्युलोक पहुंचा दे.
जनमेजय का बदला और इंद्र की मदद
जब ये बात ऋषि को पता चली तो उन्हें पुत्र के इस अविवेक पर अपार दुःख हुआ और उन्होंने एक शिष्य द्वारा परीक्षित को श्राप का समाचार कहला भेजा, जिससे कि वे सतर्क रहें. परीक्षित ने ऋषि के श्राप को अटल समझ अपने पुत्र जनमेजय को राज सौंप दिया और खुद एक ऊंचे प्रासाद पर सब ओर से सुरक्षित होकर रहने लगे. सातवें दिन तक्षक ने आकर उन्हें डस लिया और विष की घातक प्रभाव से उनकी मौत हो गई. जनमेजय ने अपने पिता, राजा परीक्षित की मौत का बदला लेने के लिए सर्पसत्र (नाग यज्ञ) नामक एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था. उन्होंने संपूर्ण नाग जाति को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की थी. यज्ञ के प्रभाव से खिंचकर दुनिया भर के सांप आग में गिरने लगे। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक नाग ने देवराज इंद्र की शरण ली. जनमेजय के यज्ञ की अग्नि इतनी तीव्र थी कि इंद्र समेत तक्षक भी उसमें खींचने लगा था. ठीक उसी समय ऋषि जरत्कारू और मनसा देवी के पुत्र बाल ऋषि आस्तीक वहां पहुंचे. विद्वता से प्रसन्न होकर, जनमेजय ने आस्तीक को एक वरदान मांगने को कहा. आस्तीक ने नागों की रक्षा के लिए यज्ञ को रोकने और तक्षक को छोड़ने का आग्रह किया. अपने वचन का पालन करते हुए जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया, जिससे तक्षक और अन्य शेष नागों की जान बच गई.
कुरु वंश का आखिरी राजा
फिर जनमेजय ने 84 साल हस्तिनापुर पर राज किया. फिर उनके बेटे शतानीक राजा बने. इसी तरह सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था. मगर युधिष्ठिर से 7वीं पीढ़ी में राजा निचक्षु जब हस्तिनापुर के शासक थे तो एक बड़ी घटना घटी. उनके समय में भयंकर बाढ़ के कारण हस्तिनापुर नष्ट हो गया था. इसके बाद कुरु वंश कौशांबी आ गया और यहां उन्होंने 'वत्स' शाखा की स्थापना की. ये बात उत्तर प्रदेश सरकार के कौशांबी जिले के इतिहास में भी बताई गई है. इसी वंश की 26वीं पीढ़ी में बुद्ध के समय में कौशांबी के राजा उदयन थे. गौतम बुद्ध के समय में कौशांबी अपने ऐश्वर्य पर था. धीरे-धीरे ये वंश छोटे-छोटे राज्यों में बंटता गया और बेहद कमजोर हो गया. तो ऐसे भरत के वंश का शासन खत्म हो गया. मगर रोचक बात ये है कि हस्तिनापुर के कमजोर होने के बाद महाभारत काल का ही एक राज्य बहुत मजबूत होकर उभरा.
उस राजवंश की कहानी भारत का इतिहास के दूसरे अंक में...
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