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कोटा को टक्कर दे रहा है सीकर: नीट पेपर लीक के दर्द के बीच छोटे शहरों के 'डॉक्टर' बनने के सपनों की कहानी

नीट पेपर लीक के खुलासे के बाद सीकर में छात्र फिर से तैयारी में जुट गए हैं. जानिए कैसे कोटा का यह किफायती ऑप्शन मिडिल क्लास फैमिली के डॉक्टर बनने के सपनों को उड़ान दे रहा है.

कोटा को टक्कर दे रहा है सीकर: नीट पेपर लीक के दर्द के बीच छोटे शहरों के 'डॉक्टर' बनने के सपनों की कहानी
सीकर और कोटा में छात्रों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञ और काउंसलर मानते हैं कि मेडिकल पेशा आज भी आकांक्षी भारत के सपनों का प्रतीक है.

Sikar vs Kota Coaching : जब भी मेडिकल प्रवेशन परीक्षा की तैयारी की बात आती है तो जेंहन में सबसे पहला नाम राजस्थान का 'कोटा' आता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में कोटा से थोड़ा उत्तर की ओर स्थित सीकर एक बड़े कोचिंग हब के रूप में तेजी से उभरा है. आपको बता दें कि यह वही शहर है, जहां सबसे पहले नीट (NEET) पेपर लीक का सनसनीखेज खुलासा हुआ था. इस झटके के बावजूद, सीकर की गलियों में हौसले पस्त नहीं हुए हैं. यहां के कमरों में चौबीसों घंटे जलती लाइटें और किताबों में डूबे चेहरे गवाही दे रहे हैं कि देश के मध्यमवर्गीय परिवारों के सपने इतनी आसानी से नहीं टूटते.

कोटा का नया और किफायती विकल्प है सीकर

 20 राज्यों से आए 1.25 लाख से ज्यादा छात्रों के साथ सीकर अब कोटा के विकल्प के तौर पर तेजी से पहचान बना रहा है. भले ही यहां अभी कोटा जैसे हाई-एंड हॉस्टल और बड़े संस्थान न हों, लेकिन यह उन मध्यमवर्गीय छात्रों के लिए ज्यादा किफायती विकल्प है जो कोटा का खर्च नहीं उठा सकते.

"पापा का सपना है, हार कैसे मान लूं?" 

23 वर्षीय हरीश कुमावत जून में होने वाला नीट री-टेस्ट फिर से देने जा रहे हैं. यह उनका पांचवां प्रयास था और उन्हें पूरा भरोसा था कि इस बार उनका चयन हो जाएगा. राजस्थान के नागौर जिले के डीडवाना के रहने वाले हरीश के पिता निर्माणाधीन इमारतों में फील्ड कॉन्ट्रैक्टर का काम करते हैं.

चार भाई-बहनों में सबसे बड़े हरीश कहते हैं, “मुझे डॉक्टर बनाना मेरे पिता का सपना था. उन्होंने लोगों से अच्छे करियर विकल्पों के बारे में पूछा और तय कर लिया कि मुझे डॉक्टर बनाना है. मैं सीकर आया और दो साल तक कोचिंग की. हर साल कोचिंग पर करीब एक लाख रुपये खर्च होते हैं, फिर हॉस्टल की फीस 6 से 7 हजार रुपये महीना और ऊपर से जेब खर्च.

इसलिए दो साल बाद मैंने कोचिंग छोड़कर सिर्फ टेस्ट सीरीज़ और सेल्फ-स्टडी पर ध्यान देने का फैसला किया. इस घटना ने मेरी उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है और मानसिक रूप से भी असर पड़ा है, लेकिन अगर पेपर से समझौता हुआ था तो शायद दोबारा परीक्षा कराना सही फैसला है.”

क्यों आज भी 'डॉक्टर' बनना है सामाजिक सम्मान की पहचान?

सीकर और कोटा में छात्रों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञ और काउंसलर मानते हैं कि मेडिकल पेशा आज भी आकांक्षी भारत के सपनों का प्रतीक है. खासकर छोटे शहरों और कस्बों के उन परिवारों के लिए, जो डॉक्टर और इंजीनियर को सामाजिक सम्मान और बेहतर भविष्य की पहचान मानते हैं. ऐसे में जब परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए हैं, तो यह भावना और मजबूत हुई है कि व्यवस्था में भरोसा दोबारा कायम करना बेहद जरूरी है, ताकि लाखों छात्रों के सपने और उनकी मेहनत बेकार न जाए.

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