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IIT में एडमिशन मिलने पर छोड़ा कॉलेज, कोर्ट ने वापस दिलाई पूरी फीस; कहा- शिक्षा संस्थान मुनाफे का कारोबार नहीं

संस्थान का कहना था कि शिकायतकर्ता केवल 15,000 रुपये वापस पाने का हकदार है और बाकी सभी दावे बेबुनियाद हैं. सीट खाली रहने के कारण संस्थान को आर्थिक नुकसान हुआ है और संस्थान का अनुरोध है कि इस शिकायत को बेबुनियाद मानकर खारिज कर दिया जाए.

IIT में एडमिशन मिलने पर छोड़ा कॉलेज, कोर्ट ने वापस दिलाई पूरी फीस; कहा- शिक्षा संस्थान मुनाफे का कारोबार नहीं
कांगड़ा जिला आयोग का बड़ा फैसला , कॉलेज को दिया छात्रा को पूरी फीस वापस करने का आदेश

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित कांगड़ा जिला आयोग ने एक मामले की सुनवाई करते हुए जयपुर की एक संस्थान को एक छात्रा की पूरी फीस वापस करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने पूरी फीस वापिस करने के साथ-साथ मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा और कानूनी कार्यवाही के खर्च के तौर पर 15,000 रुपये देने का निर्देश भी दिया है. कांगड़ा जिला आयोग प्रेसिडेंट हेमांशु मिश्रा और सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर की बेंच ने इस फैसले को सुनाते हुए इस बात पर जोर दिया है कि उच्च शिक्षण संस्थान सीखने के केंद्र होते हैं, न कि कमर्शियल या मुनाफा कमाने वाले कारोबारी.

क्या है पूरा मामला

25 फरवरी, 2025 को छात्रा अनिध्या ने जिला कांगड़ा उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करवाई की उसने  मालवीय नेशन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी जयपुर में MBA प्रोग्राम (2023-25) में एडमिशन के लिए आवेदन किया था. प्रोविजनल एडमिशन कन्फर्म होने के बाद, उन्होंने 26/06/2023 को कुल 94,315 रुपये जमा किए. बाद में, IIT मंडी में एडमिशन मिलने पर, शिकायतकर्ता ने 01/08/2023 को अपना एडमिशन रद्द करने और जमा की गई फीस वापस करने का अनुरोध किया. जो कि एकेडमिक सेशन/रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले था. शिकायतकर्ता का आरोप है कि अनुरोध के बावजूद, संबंधित संस्थान ने पूरी रकम वापस नहीं की और अपने ही प्रॉस्पेक्टस (क्लॉज़ 4.7.2) और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा फीस रिफंड के संबंध में जारी अनिवार्य गाइडलाइंस का उल्लंघन करते हुए एक बड़ा हिस्सा अपने पास रख लिया.  संस्थान ने केवल 15,000 रुपये वापस किए. 79,315 रुपये रोक लिए.

संस्थान ने अपने पक्ष में क्या कहा?

संस्थान ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि NIT एक्ट, 2007 के तहत 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' (Institute of National Importance) के तौर पर, यह भारत सरकार के सीधे नियंत्रण में है और इस पर UGC या AICTE की गाइडलाइंस लागू नहीं होती हैं. शिकायतकर्ता "उपभोक्ता" (consumer) की परिभाषा में नहीं आता है, और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के अनुसार संस्थान "सर्विस प्रोवाइडर" (service provider) की परिभाषा में नहीं आता है. शिकायतकर्ता ने MBA प्रोग्राम (शैक्षणिक वर्ष 2023-24) में एडमिशन लिया था और कुल 94,315 रुपये जमा किए थे. शिकायतकर्ता ने 01.08.2023 को एडमिशन वापस लेने के लिए एप्लीकेशन दी, जो तय डेडलाइन 21.07.2023 के काफी बाद थी.

संस्थान के MBA एडमिशन इन्फॉर्मेशन ब्रोशर (नियम 4.6 और 4.7) के आधार पर, जो उम्मीदवार तय डेडलाइन के बाद एडमिशन वापस लेते हैं, उनकी फीस (15,000 की कॉशन मनी को छोड़कर) वापस नहीं की जाती है. सीट खाली रहने के कारण संस्थान को आर्थिक नुकसान हुआ है और संस्थान का अनुरोध है कि इस शिकायत को बेबुनियाद मानकर खारिज कर दिया जाए.

आयोग ने इस विवाद का फैसला करते हुए कहा कि सबसे पहले कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत शिकायत के स्वीकार्य होने पर विचार करना होगा. वहीं संस्थान ने हमारे अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) पर सवाल उठाया है. उन्होंने माननीय नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन के 'मनु सोलंकी और अन्य बनाम विनायक मिशन यूनिवर्सिटी' मामले के अहम फैसले का हवाला दिया है. इस फैसले में कहा गया है कि औपचारिक शिक्षा देने वाले मुख्य शिक्षण संस्थान इस एक्ट के तहत कोई 'सेवा' (service) नहीं देते हैं.

हालांकि, हमें लगता है कि मौजूदा मामले के तथ्य 'मनु सोलंकी' वाले मामले से बिल्कुल अलग हैं. उस मामले में, माननीय नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने उन छात्रों के मामले पर विचार किया था जो सक्रिय रूप से कोई कोर्स कर रहे थे, और संस्थान पढ़ाने और परीक्षा आयोजित करने का मुख्य काम कर रहा था. इसके बिल्कुल उलट, इस मामले में शिकायतकर्ता ने कभी कोई क्लास अटेंड नहीं की, कभी फिजिकल रजिस्ट्रेशन पूरा नहीं किया, और एकेडमिक सेशन शुरू होने से पहले ही अपना प्रोविजनल एडमिशन वापस ले लिया.

फीस को पूरी तरह जब्त करना 'अनुचित व्यापार व्यवहार'

यह विवाद शैक्षिक मानकों या मूल्यांकन से जुड़ा नहीं है, बल्कि प्रशासनिक नियमों की आड़ में अनुचित तरीके से पैसे जब्त करने से जुड़ा है. हमारा निष्कर्ष है कि जब कोई संस्थान ऐसी सीट के लिए पैसे का सिर्फ कस्टोडियन (रखवाला) बनता है जिस पर कभी कोई छात्र नहीं बैठा, और जहां कोई शैक्षिक सेवा कभी नहीं ली गई, तो फीस को पूरी तरह जब्त करना 'अनुचित व्यापार व्यवहार' और 'प्रशासनिक कमी' माना जाएगा, जो सीधे तौर पर इस कमीशन के अधिकार क्षेत्र में आता है.

उनका यह भी कहना है कि क्योंकि यह NIT एक्ट, 2007 के तहत 'राष्ट्रीय महत्व का संस्थान' है और सीधे शिक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में है, इसलिए यह यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) जैसी रेगुलेटरी संस्थाओं द्वारा जारी गाइडलाइंस से छूट प्राप्त है. हमें यह तर्क बुनियादी रूप से गलत और कानूनी रूप से अमान्य लगता है.  यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने फीस रिफंड पॉलिसी पर एक अनिवार्य सार्वजनिक सूचना जारी की, जिसमें सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया कि 30 सितंबर, 2023 तक एडमिशन रद्द होने या वापस लेने पर फीस का पूरा रिफंड दिया जाए.
चूंकि शिकायतकर्ता ने औपचारिक रूप से 01.08.2023 को एडमिशन वापस लेने का अनुरोध किया था, इसलिए उनका अनुरोध राष्ट्रीय रेगुलेटरी अथॉरिटी द्वारा निर्धारित अनिवार्य वैधानिक समय-सीमा के भीतर ही किया गया था. किसी संस्थान का आंतरिक सूचना विवरणिका (ब्रोशर) या प्रॉस्पेक्टस उन राष्ट्रीय वैधानिक नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता जो छात्रों को आर्थिक शोषण से बचाने के लिए बनाए गए हैं.

इसके अलावा, यह तर्क कि सीट खाली रहने से कभी न ठीक होने वाला आर्थिक नुकसान होगा, बेबुनियाद है. संस्थान के डायरेक्टर ने एक हलफनामा दायर करके बताया कि उनके अंदरूनी नियमों के अनुसार, एडमिशन रद्द करने की आखिरी तारीख 21-07-2023 थी. हालांकि, संस्थान के अपने रिकॉर्ड से पता चलता है कि नए एडमिशन वाले छात्रों की फिजिकल रिपोर्टिंग और रजिस्ट्रेशन 1 अगस्त 2023 को होना था, और शिकायतकर्ता ने उसी दिन अपना एडमिशन वापस लेने का आवेदन जमा किया था.

आदेश में कह गया अहम बात यह है कि असल एकेडमिक क्लास 7 अगस्त, 2023 से शुरू होनी थीं, जिससे खाली सीट को भरने के लिए लगभग एक हफ़्ते का समय मिल गया था. इतने नामी संस्थान के लिए, काबिल छात्रों की एक लंबी वेटिंग लिस्ट हमेशा मौजूद रहती है, फिर भी ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाई जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने सीट भरने के लिए अपनी वेटिंग लिस्ट का इस्तेमाल करने की सक्रिय कोशिश की थी. जब छात्र इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी मंडी जैसे बेहतरीन संस्थानों में एडमिशन पाते हैं, तो उन्हें सख्त अंदरूनी समय-सीमा के नाम पर किसी संस्थान द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता या आर्थिक रूप से बाध्य नहीं किया जा सकता. इसलिए, जमा किए गए 94,315 रुपये में से 79,315 रोक लेना और सिर्फ़ 15,000 कॉशन मनी वापस करना, सर्विस में बड़ी कमी और गलत व्यापार का तरीका माना जाएगा.

हायर एजुकेशन संस्थान सीखने की जगहें हैं

कोर्ट ने कहा, छात्र हमारे देश की असली नींव हैं, और उनकी पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी उम्मीदों और कानूनी अधिकारों को हमेशा शिक्षण संस्थानों के कमर्शियल फायदों से ऊपर रखा जाना चाहिए. हायर एजुकेशन संस्थान सीखने की जगहें हैं, न कि कमर्शियल या ज़्यादा मुनाफा कमाने वाले बिजनेस; और उन्हें किसी छात्र के बेहतर पढ़ाई के मौके को चुनने का फायदा उठाकर गलत तरीके से अमीर बनने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी मंडी जैसे बड़े राष्ट्रीय संस्थान में जाने वाले छात्र के लिए पैसों की तंगी या मनमाने ढंग से पैसे ज़ब्त करना कभी भी रुकावट या सज़ा नहीं बनना चाहिए.

छात्र का अपनी पढ़ाई का रास्ता आज़ादी से चुनने का अधिकार, बिना किसी सख़्त और अनुचित अंदरूनी समय-सीमा के कारण आर्थिक नुकसान उठाए सबसे ज़रूरी है और राष्ट्रीय नियमों के तहत पूरी तरह सुरक्षित है.

9% सालाना दर से ब्याज देना होगा

वहीं  मालवीय नेशन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है और उसे आदेश दिया गया  है कि वह इस आदेश की कॉपी मिलने के 60 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को रोकी गई पूरी रकम वापस करे. ऐसा न करने पर, शिकायत दर्ज करने की तारीख से लेकर रकम की वास्तविक और अंतिम वसूली तक 9% सालाना की दर से ब्याज देना होगा. बची हुई फीस वापस करने के अलावा, विपक्षी पार्टी को शिकायतकर्ता को 10,000 रुपये का मुआवजा भी देना होगा. यह मुआवजा संस्थान के मनमाने रवैये के कारण हुई मानसिक परेशानी, उत्पीड़न और अनावश्यक देरी के लिए है. साथ ही, कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च के तौर पर 15,000 रुपये भी देने होंगे.

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