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भले सीधे काम न आए, लेकिन इसके बिना रुक जाएंगे ये बड़े काम, जानिए ट्रिग्नॉमेट्री पर कैसे टिकी है हमारी दुनिया

ट्रिग्नॉमेट्री सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है. इसका इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स तक में होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि हम इसे पहचान नहीं पाते. जिन सिस्टम्स और सुविधाओं पर आप निर्भर हैं वे इन्हीं कॉन्सेप्ट्स पर चलते हैं.

भले सीधे काम न आए, लेकिन इसके बिना रुक जाएंगे ये बड़े काम, जानिए ट्रिग्नॉमेट्री पर कैसे टिकी है हमारी दुनिया
मोबाइल GPS का आधार भी है ट्रिग्नॉमेट्री.

क्या आपको भी स्कूल के दिनों में ट्रिग्नॉमेट्री ने बहुत परेशान किया है, जहां sin, cos और tan जैसे फॉर्मूले याद करने में आपके पसीने छूट जाते थे? अगर जवाब ‘हां' है, तो शायद आपको लगता होगा कि स्कूल में ऐसे सब्जेक्ट को पढ़ाने का मतलब ही क्या है जिसका असल जिंदगी में कोई इस्तेमाल ही नहीं है. लेकिन हकीकत ये है कि ट्रिग्नॉमेट्री सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है. रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स तक, ट्रिग्नॉमेट्री हर जगह काम करती है. फर्क सिर्फ इतना है कि हम इसे पहचान नहीं पाते. आप भले इनका सीधा इस्तेमाल न करते हों, लेकिन जिन सिस्टम्स और सुविधाओं पर आप रोज निर्भर हैं, वे इन्हीं कॉन्सेप्ट्स पर चलते हैं. आइए जानते हैं कि ट्रिग्नॉमेट्री कैसे हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी है.

एंगल और दूरी के बीच का रिश्ता है ट्रिग्नॉमेट्री

सीधे शब्दों में समझें तो sin, cos और tan एंगल और दूरी के बीच का रिश्ता बताते हैं. यानी अगर किसी चीज का एंगल पता हो, तो उसकी ऊंचाई, दूरी या दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है. यही बेसिक आइडिया ट्रिग्नॉमेट्री की ताकत है और यही वजह है कि यह इतने अलग-अलग कामों में इस्तेमाल होती है.

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ट्रिग्नॉमेट्री के बिन कंस्ट्रक्शन मुमकिन नहीं

कंस्ट्रक्शन और इंजीनियरिंग में इसका रोल सबसे साफ नजर आता है. किसी बिल्डिंग की ऊंचाई तय करनी हो, छत का ढलान सही रखना हो या पुल और सड़क का एंगल डिजाइन करना हो, हर जगह एंगल और लंबाई का सही तालमेल जरूरी होता है. यहां sin, cos और tan के जरिए यह तय किया जाता है कि स्ट्रक्चर मजबूत भी रहे और सुरक्षित भी.

मोबाइल GPS का आधार भी है ट्रिग्नॉमेट्री

नेविगेशन और लोकेशन सर्विसेस में भी यही गणित काम करती है. जब आप मोबाइल में GPS इस्तेमाल करते हैं, तो सैटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल के एंगल और दूरी के आधार पर आपकी लोकेशन तय होती है. पायलट और जहाज चलाने वाले एक्सपर्ट्स भी दिशा तय करने में इसी तरह के कॉन्सेप्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, ताकि वे सही रास्ते पर बने रहें.

टेक्नोलॉजी की दुनिया में भी sin, cos और tan का इस्तेमाल बहुत होता है. मोबाइल गेम्स, 3D एनिमेशन और फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स में ऑब्जेक्ट्स की मूवमेंट, घुमाव और पोजिशन इन्हीं के आधार पर तय की जाती है. स्क्रीन पर जो चीजें आपको रियल लगती हैं, उनके पीछे यही कैलकुलेशन चल रही होती है.

अनजाने में भी इस्तेमाल होती है ट्रिग्नॉमेट्री

खेलों और रोजमर्रा के कामों में भी इसका असर दिखता है. क्रिकेट में शॉट लगाते समय, बास्केटबॉल में बॉल को रिंग में डालते वक्त या भारी सामान को एक खास एंगल पर खींचते समय, अनजाने में ही सही एंगल चुना जाता है. यही एंगल तय करता है कि कामयाबी मिलेगी या नहीं.

स्कूल में सबको क्यों पढ़ाते हैं ट्रिग्नॉमेट्री

अब सवाल यह है कि जब हर कोई इंजीनियर या पायलट नहीं बनता, तो स्कूल में ट्रिग्नॉमेट्री क्यों पढ़ाई जाती है. दरअसल, यह सिर्फ फॉर्मूले याद करने का विषय नहीं है, बल्कि यह दिमाग को लॉजिक और प्रॉब्लम सॉल्विंग के लिए तैयार करता है. साथ ही, यह हर स्टूडेंट को एक बेस देता है, ताकि आगे चलकर वह किसी भी फील्ड में जाना चाहे, उसके पास जरूरी समझ पहले से हो.

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