NEET-JEE Board Marks Weightage: देश में NEET-JEE को लेकर एक बार फिर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है. खबरों के मुताबिक, शिक्षा मंत्रालय की एक कमेटी मेडिकल और इंजीनियरिंग एडमिशन में 12वीं बोर्ड के नंबरों को 50% तक वेटेज देने पर विचार कर रही है. अगर ऐसा होता है, तो यह सिस्टम में बड़ा बदलाव होगा. लेकिन इस बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पहले भी 12वीं के नंबरों का वेटेज मिलता था. नीट-जेईई से पहले वेटेज मिलता था या नहीं और अगर मिलता था, तो किस साल तक, कितना वेटेज था और कब इसे हटाया गया. आइए जानते हैं डिटेल्स
पहले बोर्ड वेटेज सिस्टम क्या था
भारत में NEET और JEE जैसे राष्ट्रीय एंट्रेंस एग्जाम आने से पहले एडमिशन का तरीका एक जैसा नहीं था. अलग-अलग राज्यों, यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों के अपने नियम होते थे. कई जगहों पर 12वीं के नंबरों को एडमिशन में प्रॉयरिटी दिया जाता था. कुछ संस्थानों में बोर्ड के अंकों के आधार पर मेरिट बनती थी, जबकि कुछ जगहों पर एंट्रेंस एग्जाम और बोर्ड दोनों के स्कोर जोड़े जाते थे.
बोर्ड के नंबर कितने काम आते थे
पुराने समय में कई प्रोफेशनल कोर्सों में बोर्ड और एंट्रेंस दोनों का मिला-जुला फॉर्मूला चलता था. कुछ जगह 50:50 का रेशियो था, कुछ जगह 30:70 और कुछ संस्थानों में बोर्ड का रोल सिर्फ मिनिमम एलेजिबिलिटी तक सीमित था. यानी हर जगह करीब-करीब एक जैसा ही नियम था, लेकिन 12वीं के नंबरों का वेजेट आज की तुलना में कहीं ज्यादा था.
क्या मेडिकल और इंजीनियरिंग में भी ऐसा था
मेडिकल और इंजीनियरिंग एडमिशन में भी बोर्ड मार्क्स को अहमियत दी जाती थी. खासकर राज्य स्तर की काउंसलिंग और कुछ कॉलेजों में 12वीं के मार्क्स बहुत अहम माने जाते थे. उस समय यह माना जाता था कि स्कूल बोर्ड का प्रदर्शन छात्र की पढ़ाई की कंसिस्टेंसी को दिखाता है, इसलिए एंट्रेस में उसका वेटेज रखा जाता था.
फिर बदलाव कब आया
पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन का तरीका आज जैसा नहीं था. मेडिकल में AIPMT के साथ-साथ कई राज्यों और बड़े मेडिकल कॉलेजों की अपनी अलग-अलग प्रवेश परीक्षाएं होती थीं. बाद में पूरे देश के लिए NEET शुरू किया गया, ताकि सभी छात्रों का एक ही परीक्षा से टेस्ट हो सके. इसी तरह इंजीनियरिंग में AIEEE के जरिए NIT और दूसरे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों में एडमिशन मिलता था, जबकि IIT के लिए अलग IIT-JEE परीक्षा होती थी. साल 2013 में AIEEE का नाम बदलकर JEE Main और IIT-JEE का नाम JEE Advanced कर दिया गया.
इसके बाद मेडिकल और इंजीनियरिंग दोनों में कॉलेज में एडमिशन का फैसला धीरे-धीरे सिर्फ एंट्रेंस एग्जाम के नंबरों से होने लगा. फिर 2018 में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) बनाई गई और 2019 से NEET और JEE Main जैसी परीक्षाएं कराने की जिम्मेदारी इसी एजेंसी को दे दी गई. इससे पूरे देश में एडमिशन प्रोसेस पहले से ज्यादा आसान, एक जैसा और साफ-सुथरा हो गया.
किस साल तक वेटेज मिलता था?
पूरे देश में एक ही साल पर बोर्ड वेटेज अचानक खत्म नहीं हुआ. यह धीरे-धीरे बदला. अलग-अलग राज्यों और संस्थानों में अलग-अलग समय तक बोर्ड नंबरों का इस्तेमाल होता रहा, लेकिन नेशनल लेवल पर 2013 से 2016 के बीच बदलाव सबसे अहम माना जाता है, जब NEET और JEE सिस्टम ज्यादा मजबूत और सेंट्रलाइल्ड हुआ.
मेडिकल-इंजीनियरिंग में कब तक वेटेज था
मेडिकल एंट्रेंस में बोर्ड वेटेज का असर नीट के आने से पहले ज्यादा दिखता था. जब नीट पूरी तरह नेशनल एंट्रेंस एग्जाम बना, तब बोर्ड नंबर्स का रोल बहुत कम हो गया. मतलब 2013-2016 के बाद मेडिकल एडमिशन में बोर्ड वेटेज लगभग खत्म हो गया. इंजीनियरिंग में भी बोर्ड नंबरों की अहमियत धीरे-धीरे कम हुई. JEE बेस्ड सेलेक्शन सिस्टम आने के बाद बोर्ड के नंबर सिर्फ मिनिमम एलिजिबिलिटी या कुछ खास संस्थानों तक सीमित रह गए यानी 2010 के मिड तक बोर्ड वेटेज छूट गया.
क्यों हटाया गया बोर्ड वेटेज?
1. CBSE, ICSE और राज्य बोर्डों के पैटर्न अलग-अलग होते हैं. किसी बोर्ड में अंक देना आसान हो सकता है, किसी में कठिन. ऐसे में सिर्फ 12वीं के नंबरों पर भरोसा करना हर छात्र के लिए समान नहीं माना गया.
2. NEET-JEE जैसी परीक्षाओं का मकसद था कि देशभर के छात्रों की एक ही तरह से तुलना की जा सके. बोर्ड के नंबरों के साथ यह काम मुश्किल हो जाता था.
3. एक नेशनल एग्जाम से मेरिट बनाना ज्यादा पारदर्शी माना गया. इससे कॉलेजों और छात्रों दोनों के लिए सिस्टम आसान हुआ.
अब 50% वेटेज की बात क्यों हो रही है?
न्यूज एजेंसी पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि सरकार बोर्ड के नंबरों को फिर से एडमिशन में शामिल करने पर विचार कर रही है. इसके पीछे कारण बताए जा रहे हैं कि एक ही परीक्षा का तनाव कम करना, बोर्ड पढ़ाई को महत्व देना और पेपर लीक जैसी समस्याओं के बीच सिस्टम को ज्यादा बैलेंस बनाना है.
कुछ हद तक यह पुराने सिस्टम की वापसी जैसा ही है, लेकिन यह हूबहू पुरानी व्यवस्था नहीं होगी. अगर 50% वेटेज लागू होता है, तो बोर्ड और एंट्रेंस दोनों का मिला-जुला सिस्टम बनेगा. इसका मतलब होगा कि छात्र को बोर्ड और एंट्रेंस एग्जाम दोनों में अच्छा करना होगा. अगर कोई नकल करके या फिर किसी जुगाड़ से 12वीं में अच्छे नंबर पा लेता है तो उसे एंट्रेंस एग्जाम में बेहद मुश्किल सवालों से गुजरना होगा, जहां उसकी असलियत सामने आ जाएगी और एडमिशन मिलना मुश्किल होगा.
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