- रामलीला मैदान में संयुक्त किसान मोर्चा अराजनैतिक के नेतृत्व में किसान संगठनों की महापंचायत आयोजित की गई
- किसान मांग कर रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को क़ानूनी मान्यता दी जाए और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू हो
- अमेरिका से हुई ट्रेड डील को किसान संगठन रद्द करने की मांग कर रहे हैं क्योंकि इससे किसानों की आय प्रभावित होगी
हर तरफ़ किसान संगठनों के अलग अलग झंडे, नारे लगाती जत्थेबंदियां, सड़कों पर तैनात पुलिस और दूर-दूर से आए किसानों का सैलाब गुरुवार को रामलीला मैदान पर दिखा. संयुक्त किसान मोर्चा अराजनैतिक की अगुवाई में दर्जन भर से ज्यादा अलग-अलग किसान मोर्चे केरल, महाराष्ट्र, मप्र समेत हरियाणा और पंजाब के किसान बड़ी तादात में रामलीला मैदान में महापंचायत के लिए जुटे हैं. दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक चलने वाली इस महापंचायत में संयुक्त किसान मोर्चा अराजनैतिक के अगुवा जोगेंद्र सिंह डल्लेवाल नेतृत्व कर रहे हैं. जोगेंद्र डल्लेवाल इससे पहले खनौरी बार्डर पर MSP को क़ानूनी मान्यता देने के लिए 100 दिन से ज्यादा समय तक धरना कर चुके हैं.
किन मांगों पर हो रही किसान महापंचायत?
संयुक्त किसान मोर्चा की कई सालों से मांग रही है कि MSP को क़ानूनी मान्यता मिले ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य से ख़रीद सुनिश्चित की जा सके. इसके अलावा मांग है कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए और अमेरिका से हाल में हुई ट्रेड डील को कैंसिल किया जाए. जोगेंद्र जल्लेवाल कहते हैं कि अमेरिका से हुए इस समझौते से किसानों की आय पर इसका सीधा असर पड़ेगा. अमेरिका से कई चीज़ें सस्ती आएंगी, जिससे सबसे ज़्यादा प्रभावित यहां के किसान होंगे इसीलिए इस ट्रेड डील को तुरंत रद्द किया जाए.
उन्होंने कहा कि सबसे पहले किसानों को कर्ज मुक्त किया जाए. भारत के किसान इस वक्त क़र्ज़े में डूबे हैं. वहीं उप्र से आए राजवीर सिंह ने कहा कि ये वक्त है किसानों के हित में आपसी मतभेद भुलाकर डल्लेवाल के साथ जुड़ने का और किसानों की लड़ाई संयुक्त तौर पर मिलकर लड़ी जाने का.
प्रधानमंत्री को सौंपे जाएंगे गांव-शहरों के किसानों के पत्र
रामलीला मैदान में महापंचायत के दौरान एक जगह पर कुछ किसान इकट्ठा होकर गांव तहसील शहर के किसानों के पत्र को ले रहे थे. उनका कहना है कि किसानों की मांग को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री तक पहुंचाया जाएगा. बता दें कि कि मोदी सरकार के किसान विधेयक के खिलाफ किसान संगठनों ने आंदोलन किया था जिसके दबाव में फिर कृषि विधेयक को वापस लेना पड़ा था.
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