- नई दिल्ली में तीन दिन तक दिल्ली शब्दोत्सव 2026 का आयोजन हुआ है, दूसरे दिन इसमें हिन्दू इतिहास पर चर्चा की गई
- पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा ने कुतुब मीनार को वेदशाला बताया
- शब्दोत्सव में सिनेमा पर चर्चा में धुरंधर और कश्मीर फ़ाइल जैसी फिल्मों के विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण सामने आए
नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में 2 से 4 जनवरी तक 'दिल्ली शब्दोत्सव 2026' कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. दूसरे दिन यानि शनिवार को पहले सत्र में इसमें हिन्दू इतिहास पर चर्चा हुई. अयोध्या से आए श्री हनुमंत निवास के संत मिथिलेश नंदनी, पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा, लेखिका अमां गणत्रा और पत्रकार राकेश शुक्ला इस चर्चा के मॉडरेटर के तौर पर शामिल हुए. सत्र की शुरुआत करते हुए मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि भारतीय इतिहास कभी लिखा नहीं गया, ये मिथक पूरी दुनिया में फैला है. लेकिन वेद बहुत प्राचीन है और फिर इसको पूरी दुनिया को मानना पड़ा.
11वीं शताब्दी में कल्हण, राजतरंगिणी लिखते हैं... वो कहते हैं कि इसको लिखने से पहले 11 इतिहासकारों को पढ़ा है. 52 राजा के इतिहास को एक ही व्यक्ति ने लिखा. मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि इतिहास बताए बिना यहां बेटे का विवाह नहीं होता तो हम क्या इतिहास नहीं लिख पाए. पत्रकार राकेश शुक्ला ने कहा कि फिर वेदों को क्यों काल्पनिक माना गया है. मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि ये दुनिया ही काल्पनिक है. पहले कल्पना की जाती है फिर उस पर निर्माण होता है. प्लूटो ने कहा कि पहले आइडिया आता है, फिर साकार होता है. वेद में लिखा है कि परस्पर प्रेम है कौन झुठला सकता है. अमी गणात्रा ने बाल्मीकी रामायण का अध्ययन किया है. श्रीराम के अस्तित्व पर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया है.
उन्होंने कहा कि कुतुब मीनार की सीढ़ियों पर छठी शताब्दी के श्लोक मिले हैं. कुतुब मीनार के मरम्मत के दौरान एक पत्थर पर बाहर से अरेबिक आयत लिखी दिखी, लेकिन दूसरी तरफ गणेश जी की आकृति मिली.
वहीं मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि तुलसीदास जी के ताड़ना का मतलब बीते 70 साल तक नहीं समझ पाए. ताड़ना का मतलब पीटना नहीं होता है यहां ताड़ना का मतलब अनुशासन में रखना है, क्योंकि हमारे वेदों में महिलाओं समेत किसी को पीटना नहीं बताया है जबकि तुलसी दास ने जब रामचरित मानस लिखा तो पहले ही लिखा था कि ये वेदों से लिया गया है. उन्होंने कहा कि महिला भावना प्रधान होती है उसमें मातृत्व होता है वो दूसरों के दुःख को अपना मान लेती हैं, इसीलिए उसे मर्यादा में रखना उनका आश्रय है. वहीं गंवार का मतलब यहां ग्रामीण से लिया जाता है, उनको बहुत सारी बातें पता नहीं होती हैं, इसलिए उसे मर्यादा सीमित में रखना जरूरी है. उनका मतलब इस आशय से था.
फिल्म निर्माता अश्विनी ने बताया कि पौराणिक एनीमेशन फिल्म को बनाने का जोखिम था, लेकिन हमने खुद का निवेश करके बनाया. प्रशांत कश्यप ने कहा कि राजा हरिश्चंद्र के सिनेमा से संस्कार शुरू हुआ. जिसके पास मर्यादा है वही हीरो होगा. लेकिन अब जिसमें मर्यादा नहीं है वो हमारा हीरो होगा.
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शब्दोत्सव के चौथा सत्र वंदे मातरम और बंगाल नाम से हुआ जिसका संचालन अभिजीत मजुमदार ने किया. इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार राज किशोर, भारत सरकार के वरिष्ठ परामर्शदाता कंचन गुप्ता, शिवम् और अभिजीत मजूमदार ने कहा कि इस वक्त सोशल मीडिया पर बंगालियों को गाली दी जा रही है, जबकि राष्ट्रगान को रचने वाले बंगाली थे. जबकि राजकिशोर ने कहा कि बंगाल में लोगों को ये लगना चाहिए कि वो सुरक्षित रहेंगे. लोग जो सोचते हैं वो चुनाव के जरिए कर पाएं, ये केंद्र सरकार सुनिश्चित करे. कंचन गुप्ता ने कहा कि आज जो बांग्लादेश में आप देख रहे हैं वहीं बंगाल में होगा.
वहीं पत्रकार हर्षवर्द्धन त्रिपाठी ने कहा कि दक्षिणपंथी पार्टियों को दक्षिण में ही प्यार नहीं मिलता है. उसका जवाब देते सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि हमें उत्तर दक्षिण में लड़ाया जा रहा है, लेकिन धर्म दक्षिण से उपजा है. माधवाचार्य दक्षिण भारत से, शंकराचार्य दक्षिण भारत से, यहां तक एक अभी भी तकनीकी में भी दक्षिण भारत का गढ़ है. धर्म की विजय दक्षिण से उत्तर गई है. दक्षिण से अगर ज्वार उठेगा तो पूरे दुनिया पर राज करेगा. साथ ही शब्दोत्सव के दूसरे दिन कला संस्कृति और सिनेमा पर चर्चा के अलावा तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए.
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