दिल्ली में कितनी सोसायटियों के पास नहीं फायर NOC? 21 मौतों के बाद जानें चौंकाने वाला सच

दिल्ली के फ्लरिश होटल अग्निकांड के बाद पता चला क‍ि होटल ही नहीं बल्कि 900 सोसायटियों में से 89% फीसदी सोसायटी बिना वैध फायर सर्टिफिकेट के चल रही हैं. करीब 18 लाख लोगों की जान दांव पर है.

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मालवीय नगर अग्निकांड के बाद बड़ा खुलासा: दिल्ली की 89 फीसदी सोसायटियों के पास फायर NOC नहीं
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  • दिल्ली की लगभग 900 सहकारी सोसायटियों में से केवल 101 के पास ही वैध फायर एनओसी है.
  • फायर विभाग द्वारा बार-बार दी गई चेतावनियों को भी कई सोसायटी नजरअंदाज करती हैं.
  • आग हादसों में 80% मौतें जलने से नहीं, बल्कि धुएं से दम घुटने के कारण होती हैं.

दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लरिश होटल में 3 जून 2026 को लगी भीषण आग से कई व‍िदेशी नागर‍िकों समेत कुल 21 लोगों की जान चली गई. होटल अग्निकांड की जांच में जो सबसे खौफनाक सच सामने आया, वो यह था कि इस होटल के पास फायर डिपार्टमेंट का सुरक्षा सर्टिफिकेट यानी फायर एनओसी ही नहीं था. लेकिन यह लापरवाही सिर्फ एक होटल तक सीमित नहीं है. अगर दिल्ली अग्निशमन सेवा के जून 2025 के आंकड़ों को देखें, तो दिल्ली की रिहायशी सोसायटियों का हाल इससे भी ज्यादा डरावना है. यहां की ऊंची-ऊंची सोसायटियों में रहने वाले करीब 18 लाख लोगों की जान इस वक्त सीधे खतरे में है. 

द‍िल्‍ली में 89% सोसायटियों के पास सर्टिफिकेट नहीं

द‍िल्‍ली की 73 सोसायटियों ने एनओसी के अप्लाई तो किया, लेकिन जांच में सुरक्षा के इंतजाम इतने खराब पाए गए कि फायर ब्रिगेड ने इन्हें रिजेक्ट कर दिया. द‍िल्‍ली में 724 सोसायटियां वो हैं जिन्होंने या तो कभी एनओसी के लिए अप्लाई ही नहीं किया, या फिर इनका पुराना सर्टिफिकेट सालों पहले खत्म हो चुका है और इन्होंने इसे रिन्यू कराने की जहमत नहीं उठाई. एक और खौफनाक सच यह भी है क‍ि ये सोसायटियां दिल्ली के वीआईपी और घने इलाकों में हैं, जिनमें सबसे ज्यादा दक्षिण-पश्चिम दिल्ली (317), पूर्वी दिल्ली (227) और उत्तर-पश्चिम दिल्ली (166) में स्थित हैं.

दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में करीब 898 रजिस्टर्ड सहकारी सामूहिक आवास सोसायटियां हैं. इनमें से सिर्फ 101 सोसायटियों के पास ही वैध फायर एनओसी है. यानी दिल्ली की 89% सोसायटियां बिना किसी वैध सुरक्षा सर्टिफिकेट के चल रही हैं.

जांच में फेल क्यों हो रही हैं इमारतें?

फायर ब्रिगेड जब किसी 15 मीटर से ऊंची बिल्डिंग की जांच करती है, तो वह 24 से ज्यादा कड़े नियमों को देखती है. मालवीय नगर हादसे और सोसायटियों की जांच में भी कई कम‍ियां सामने आ रही हैं. आग लगने पर भागने का इकलौता रास्ता सीढ़ियां होती हैं, लेकिन ज्यादातर सोसायटियों में वहां कबाड़ रखा होता है. कई जगह छत के दरवाजों पर ताला लटका होता है, जिससे लोग अग्निकांड जैसे हादसों के समय ट्रैप हो जाते हैं.

इसके अलावा आग हादसों में 80% मौतें जलने से नहीं, बल्कि धुएं से दम घुटने के कारण होती हैं. सोसायटियों और होटलों में धुएं की निकासी का कोई सही इंतजाम नहीं है. कई सोसायटियों में आग बुझाने वाले पाइप तो लगे हैं, लेकिन उन्हें पानी देने वाली खास मोटर या जनरेटर खराब पड़े हैं. बिजली कटते ही पूरा सिस्टम ठप हो जाता है. मुख्य बिजली पैनल और हाई-टेंशन तारें ऐसी जगहों पर हैं कि अगर वहां शॉर्ट-सर्किट हो जाए, तो बिल्डिंग से बाहर निकलने का रास्ता ही बंद हो जाता है.

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आरडब्ल्यूए  की लापरवाही और पैसों का रोना

विशेषज्ञों के अनुसार, इन रिहायशी सोसायटियों में इस लापरवाही की दो बड़ी वजहें हैं. एक जवाबदेही की कमी और दूसरी पैसों का रोना. इन सोसायटियों को वहां रहने वाले लोगों की कमेटियां (RWA) चलाती हैं. हर कुछ साल में चुनाव होते हैं और नई कमेटी आ जाती है. पुरानी कमेटी की लापरवाही की जिम्मेदारी नई कमेटी लेने को तैयार नहीं होती. वहीं, पुराने पड़ चुके फायर सिस्टम को ठीक कराने में लाखों रुपये का खर्च आता है. सोसाइटी के फ्लैट मालिकों से इसके लिए मेंटेनेंस फंड इकट्ठा करना आरडब्ल्यूए के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन जाता है.

क्या एक और मालवीय नगर हादसे का इंतजार है?

मालवीय नगर के फ्लरिश होटल में लगी आग एक चेतावनी है. अगर दिल्ली की इन 720 से ज्यादा बिना एनओसी वाली सोसायटियों ने अपनी आंखें नहीं खोलीं, तो किसी भी दिन मालवीय नगर से भी बड़ा हादसा हो सकता है. अब समय आ गया है कि सरकार सिर्फ नोटिस भेजने के बजाय इन डिफॉल्टर सोसायटियों और होटलों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे, क्योंकि मामला 18 लाख लोगों की जिंदगी का है. 

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