यह ख़बर 06 मार्च, 2011 को प्रकाशित हुई थी

कीमतों से चिंतित वित्त मंत्रालय की नजर रिजर्व बैंक की ओर

खास बातें

  • सरकार और केंद्रीय बैंक पर मुद्रास्फीति पर अंकुश के लिए काफी दबाव है। खासकर खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का कारण बनी हुई है।
नई दिल्ली:

पश्चिम एशिया की राजनीतिक अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतों में आ रही तेजी से चिंतित वित्त मंत्रालय की नजर अब रिजर्व बैंक की तरफ है। मंत्रालय चाहता है कि केन्द्रीय बैंक को महंगाई पर अंकुश के उपायों पर ध्यान और ज्यादा ध्यान देना चाहिए। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कुछ इसी तरह का संकेत केंद्रीय बैंक को दिया है। रिजर्व बैंक 17 मार्च को मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा पेश करेगा। मार्च, 2010 के बाद से केंद्रीय बैंक महंगाई पर अंकुश के उपायों के तहत नीतिगत दरों में सात बार वृद्धि कर चुका है। हालांकि अब महंगाई की दर नीचे आ रही है, पर अब दूसरे कारण सामने आ गए हैं। पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम चढ़ रहे हैं। ऐसे में आगामी महीनों में महंगाई की दर के नीचे आने की संभावना नहीं है। मुखर्जी ने पिछले सप्ताह आरबीआई के निदेशक मंडल को संबोधित करते हुए कहा कि संकट बाद की आर्थिक सुधार तथा विकास की रफ्तार को कायम रखने के साथ तेल कीमतों की अनिश्चितता के दौर में महंगाई पर अंकुश की जरूरत है। रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव की अगुवाई वाले बोर्ड से वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार के सबको आर्थिक विकास का लाभ पहुंचाने के एजेंडा के लिए महंगाई पर अंकुश काफी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 116 डालर प्रति बैरल की उंचाई पर पहुंच गए हैं। भारत अपनी तेल जरूरत का 75 फीसद आयात से पूरा करता है। तेल कीमतों में तेजी से अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। सरकार और केंद्रीय बैंक पर मुद्रास्फीति पर अंकुश के लिए काफी दबाव है। खासकर खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का कारण बनी हुई है।


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