यह ख़बर 03 अक्टूबर, 2011 को प्रकाशित हुई थी

योजना आयोग ने गरीबी विवाद से पल्ला झाड़ा

खास बातें

  • आयोग ने कहा कि समाज के वंचित वर्गों को सब्सिडी देने में न्यायालय में प्रस्तुत आंकड़ों को आधार नहीं बनाया गया है।
नई दिल्ली:

गरीबी की परिभाषा को लेकर चौतरफा आलोचनाओं के बीच योजना आयोग ने अपने को इस विवाद से अलग करने का प्रयास किया। आयोग ने कहा कि समाज के वंचित वर्गों को सब्सिडी देने में न्यायालय में प्रस्तुत आंकड़ों को आधार नहीं बनाया गया है। आयोग ने अपनी सफाई पेश करते हुए कहा कि गरीबी की परिभाषा का विचार उसका अपना नहीं है। उल्लेखनीय है कि गरीबी की रेखा की परिभाषा के संबंध में आयोग ने उच्चतम न्यायालय में इस बारे में जो शपथ पत्र दिया था उसमें कहा गया है कि शहरी इलाकों में 32 रुपये प्रतिदिन से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। ग्रामीण इलाकों के लिए यह राशि 26 रुपये बताई गई है। इसको लेकर आयोग की लगातार आलोचना हो रही है कि उसने गरीबी की सही तस्वीर नहीं रखी है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के साथ मिलकर यहां इस विषय पर एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया है। अहलूवालिया ने कहा, लोग आरोप लगा रहे हैं कि योजना आयोग गरीबी को कम कर आंक रहा है, जो सही नहीं है। अहलूवालिया ने कहा कि इन आंकड़ों का इस्तेमाल समाज के पिछड़े तबके को लाभ उपलब्ध कराने के लिए नहीं किया गया है। शपथ पत्र के अनुसार, जून, 2011 के मूल्य के हिसाब से 4,824 रुपये से कम मासिक खर्च करने वाला पांच सदस्यीय परिवार गरीब की श्रेणी में आएगा। ग्रामीण क्षेत्र के लिए यह सीमा 3,905 रुपये तय की गई है।


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