मुंबई/लंदन: आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को दूसरा कार्यकाल मिलेगा कि नहीं इस बात पर काफी चर्चा हो रही है। देश विदेश में इस बारे में हो रही चर्चाएं राजन के प्रति सम्मान ही दर्शाती हैं। ऐसे कयास लगाए जाते रहे हैं कि अगर राजन को सितंबर में कार्यकाल खत्म होने के बाद दूसरी पारी का मौका नहीं मिलता है तो उनकी अहमियत के चलते घरेलू शेयर बाजार गिरावट का रुख करेंगे। लेकिन, इन अटकलों के बीच कुछ विदेशी पूंजी प्रबंधकों का मानना है कि अगर वह फिर गवर्नर नहीं भी बनते हैं तो 'दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी।'
आखिर क्यों माना जा रहा है कि राजन के जाने से फर्क नहीं पड़ेगा...
इसका सबसे बड़ा कारण यह होगा कि राजन अपनी ऐसी नीतियां छोड़कर जाएंगे जिसने आरबीआई के काम करने के तरीका बदल दिया है जिनमें मुद्रास्फीति लक्ष्यों को अपनाना और ब्याज दर सुनिश्चित करने के लिए मौद्रिक नीति समिति गठित करने की योजना बनाना शामिल है। इन दोनों नीतियों ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) गवर्नर के शुरु से चले आ रहे नीतिनिर्धारण एकाधिकार को कम किया है। इससे बैंक दुनिया के अन्य बड़े केंद्रीय बैंकों जैसे यूएस फेड की तरह ही सहमति आधारित संस्थान हो गया है।
सैलरीक्लास निवेशक राजन के जाने से खुश नहीं होंगे, बढ़ेगा बिकवाली का दबाव
"संक्षेप में कहा जाए तो निवेशक, खास तौर पर निश्चित आय वाले निवेशक राजन के जाने से खुश नहीं होंगे और इसकी वजह से बिकवाली का दबाव जरूर बढ़ेगा।" लंदन स्थित स्टैंडर्ड लाइफ इंवेस्टमेंट के उभरते कर्ज बाजार के निवेश निदेशक केरेन कर्टिस ने कहा। "जब तक कि कोई बिलकुल विपरीत विचारों वाला ही उत्तराधिकारी न आए मुझे नहीं लगता कि उनके जाने से कुछ खास फर्क पड़ेगा।"
यहां बत दें कि राजन ने अपने भविष्य पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए मंगलवार को कहा था कि जब कोई खबर आएगी तो आपको पता चल जाएगा। उन्होंने मंगलवार को की गई मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों को नहीं छेड़ा था और उसे यथावत रखा।
विरोध के बावजूद है राजन के दोबारा नियुक्त होने की संभावना...
बीजेपी में विरोध के बावजूद राजन को पीएम मोदी का समर्थन है और उनकी दोबारा नियुक्ति हो जाने की संभावना है। ऐसा रायटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है। जब स्थानीय अखबारों ने राजन के करीबी सूत्रों के हवाले से कहा था कि राजन अगला कार्यकाल नहीं चाहते और वह चले जा सकते हैं, तो बाजार में गिरावट का रुख देखा गया था।
राजन के कार्यकाल में भारत की स्थिति में बहुत सुधार आया है
सितंबर 2013 में जब राजन की नियुक्ति हुई थी तब भारत दो दशकों से मुद्रासंकट झेल रहा था। मई 2014 नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने के बाद से भारत उभरते हुए बाजार के तौर पर जाना जाने लगा जब ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश संघर्ष ही कर रहे थे। डॉ राजन की नियुक्ति के बाद भारत में 62 करोड़ (बिलियन) का विदेशी निवेश हुआ है। इनमें रिकार्ड 42 करोड़ डॉलर का 2014 में ही निवेश हुआ था। राजन ने फौरन ब्याज दर बढ़ा कर बाजार को राहत पहुंचाई थी और हाल ही में विदेशी मुद्रा भंडार रिकार्ड 363 करोड़ (बिलियन) डॉलर तक पहुंचा दिया था।
राजन कीसबसे ज्यादा कौन सी नीति सराही गई
लेकिन मंहगाई पर लगाम कसने के लिए मुद्रास्फिति की दर को दोहरे अंकों से कम करने के उनके लक्ष्य को बहुत सराहा जा रहा है। इसमें कच्चे तेल की गिरती कीमतों का भी काफी सहयोग रहा है। निवेशकों का मानना है कि 2015 में औपचारिक कानून अपनाने के बाद उपभोक्ता मुद्रास्फीति को कम करना मुश्किल ही रहेगा भले ही कोई राजनैतिक प्रभाव वाला परिवर्तन हो जाए। आगामी सरकारें और आरबीआई गवर्नर भले ही 2 से 6 प्रतिशत के बीच रहने वाले लक्ष्य को कम ज्यादा करने की कोशिश कर लें भारत की क्रेडिट रेटिंग पर कोई असर नहीं होगा।
पुरानी व्यवस्था खत्म हो जाएगी मौद्रिक नीति समिति के बनने से
भारत अपनी मौद्रिक नीति समिति बना रही है जो ब्याज दर तय करेगी। इससे वह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी जिसमें नीति तय करना अभी गवर्नर का काम है। संसद द्वारा पास किए बिल के तहत छह सदस्यीय पैनल में तीन को केंद्रीय बैंक नामित करेगा और तीन को सरकार नामित करेगी। वोटिंग में टाई की स्थिति में आरबीआई के गवर्नर वोट करेंगे जिसकी वजह से गवर्नर का खासा प्रभाव रहेगा। राजन का मानना है कि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और एक व्यक्ति पर निर्भरता कम हो जाएगी।
संवेदनशील विदेशी निवेशक भारत की क्षमता देखेंगे
सिंगापुर में अबरदीन ऐसेट मैनेजमेंट के पूंजी प्रबंधक कैनेथ अकिंत्वे का कहना है कि कोई ये मानने का कोई कारण नहीं बनता किआरबीआई विश्वसनीय संस्था नहीं है। संवेदनशील विदेशी निवेशक समझ जाएंगे कि राजन गवर्नर रहें या न रहें, भारत अपनी संभावनाओं को पाने में सक्षम है और इसमें समय भी लगेगा।
उत्तराधिकारी राजन जैसी काबिलियत वाले नहीं हो सकते
राजन के उत्तराधिकारी उनके जैसी काबिलियत वाले नहीं हो सकते जबकि राजन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हैं और उन्होंने 2007-08 में वैश्विक वित्तीय संकट की सही भविष्यवाणी भी की थी।लेकिन आरबीआई के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल को कुछ विशेषज्ञों के लिए स्वीकार्य गवर्नर हो सकते हैं। उनके अलावा अरुंधती भट्टाचार्य और शक्तिकांत दास के भी नाम चर्चा में है। इसके बावजूद राजन अधिकांश निवेशकों की पसंद होंगे। लंदन के उभरते बाजार की रणनीतिकार कामाक्ष्या त्रिवेदी का मानना है, " जैसे कि कई निवेशकों से हमारी बातचीत हुई, सवाल ये नहीं है कि राजन के गवर्नर बने रहने से उनके निवेश कितने सुरक्षित रहेंगे। हालांकि ये एक जोखिम का कारक हो सकता है।