खास बातें
- सरकार किंगफिशर एयरलाइन्स को सीधे तौर पर विमान ईंधन का आयात करने की योजना को मंजूरी देने पर विचार कर रही है लेकिन तेल कंपनियों ने इस पहल की यह कहते हुए आलोचना की।
नई दिल्ली: सरकार किंगफिशर एयरलाइन्स को सीधे तौर पर विमान ईंधन (एटीएफ) का आयात करने की योजना को मंजूरी देने पर विचार कर रही है लेकिन तेल कंपनियों ने इस पहल की यह कहते हुए आलोचना की है कि ज्यादा कर और परिचालन लागत के मद्देनजर इस संकटग्रस्त कंपनी के लिए आर्थिक रूप से गलत फैसला है।
आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि किंगफिशर के सीधे जेट ईंधन आयात के लिए किए गए आवेदन पर दिए जवाब में तेल कंपनियों ने कहा कि भारत में जेट ईंधन का उत्पादन जरूरत से अधिक है और सालाना उत्पाद के आधे हिस्से का निर्यात किया जाता है।
तेल कंपनियों ने कहा कि सीधे तौर पर जेट ईंधन के आयात से इस ईंधन का एक साथ आयात-निर्यात होगा और देश के बंदरगाहों पर बेवजह का बोझ पड़ेगा।
समझा जाता है कि किंगफिशर सीधे तौर पर जेट ईंधन का आयात कर बिक्री कर की बचत कर सकेगा। उल्लेखनीय है राज्यों में बिक्री कर चार से 30 फीसद लगता है।
तेल कंपनियों ने हालांकि कहा कि किंगफिशर को आयातित जेट ईंधन पर 12.83 फीसद शुल्क का भुगतान करना होगा। जबकि किंगफिशर फिलहाल तेल कंपनियों से जेट ईंधन की खरीद पर सिफ 8.24 फीसद का उत्पाद शुल्क देती है।
सूत्रों ने कहा कि सरकारी तेल उपक्रमों ने यह साफ कर दिया कि उनके पास भारत में किसी भी बंदरगाह पर अतिरिक्त बुनियादी ढांचा नहीं है जिसका उपयोग किंगफिशर अपने जेट ईंधन के आयात के लिए कर सकती है। इसके अलावा कंपनी को जेट ईंधन के लिए या तो भंडारण के लिए अपना टैंक बनाना होगा या फिर तेल कंपनियों से किराए पर लेना होगा। इसके बाद हवाईअड्डों तक जेट ईंधन लाने के लिए ट्रकों की व्यवस्था करनी होगी।
इतनी कवायद के बाद भी किंगफिशर सिर्फ तीन हवाईअड्डों - दिल्ली हैदराबाद और बेंगलूर - पर ईंधन मुहैया करा सकेगी। बाकी हवाईअड्डों पर तेल कंपनियो का एकाधिकार है और इसके लिए विमानन कंपनियों को बातचीत करने और तेल कंपनियों से विशेष समझौते करने की जरूरत होगी।