खास बातें
- कॉरपोरेट जगत मायूस है क्योंकि सरकार फैसले नहीं ले रही है। कहीं करप्शन के आरोप डरा रहे हैं तो कहीं राजनीतिक मजबूरियां परेशान कर रही हैं।
नई दिल्ली: कॉरपोरेट जगत मायूस है क्योंकि सरकार फैसले नहीं ले रही है। कहीं करप्शन के आरोप डरा रहे हैं तो कहीं राजनीतिक मजबूरियां परेशान कर रही हैं।
मनमोहन सिंह की दूसरी पारी के साथ उद्योग जगत को उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों पर तेज़ी से कदम उठाए जाएंगे लेकिन आज हालत यह हैं कि हमारा पूरा तंत्र जैसे एक जगह अटक गया है। उसे अपनी राजनीतिक मजबूरियां रोक रही हैं, उसे भ्रष्टाचार के सवाल डरा रहे हैं। नतीजा यह हुआ है कि कारपोरेट दुनिया मायूस है।
उद्योगपति अदी गोदरेज का कहना है कि यह जो भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान है, इससे लोग घबरा गए हैं।
वहीं त्रिवेणी इंजीनियरिंग और इंडस्ट्रीज के ध्रुव साहनी का कहना है कि सीएजी रिपोर्ट के बाद कोई फैसला नहीं ले रहा है। सभी मीडिया से डरे हुए हैं।
सरकार डरी हुई है बाबू फाइल आगे नहीं बढ़ा रहे मंत्री बड़े फ़ैसले लेने से बच रहे हैं। इसका तनाव उद्योग जगत में दिख रहा है। बिज़नेस करना बड़े फायदे का सौदा नहीं रह गया है।
उद्योगपति किरण शॉ मजूमदार का कहना है कि निर्णय लेने में देरी हो रही है और इंडस्ट्री के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। फैसला न ले पाने की वजह से कई अहम बिल लंबे समय से अटके पड़े हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बिल जो अभी भी अटके हुए हैं निम्न हैं- भूमि अधिग्रहण बिल, गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स बिल, मल्टी−ब्रैंड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई, डायरेक्ट टैक्स कोड बिल आदि। सवाल बैंकिग इंश्योरेन्स और पैंशन सेक्टरों में सुधार को लेकर प्रस्तावित कानूनों को लेकर भी उठ रहा है।
उद्योगपति गोदरेज का कहना है कि विकास कैसे तेज हो इस पर ध्यान दिया जाना चाहिये। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए नए प्रस्तावित कानून को जल्दी पास कराया जाए। अगर ये सेन्टिमेन्ट लंबे समय तक बना रहा तो क्या इससे बिज़नेस जगत को नुकसान नहीं होगा।
उद्योगपति राहुल बजाज का तो यहां तक कहना है कि पालिसी पैरालाइसिस है। यह बार−बार बोलना ठीक नहीं है। इंडिया एक अच्छी स्टोरी आज भी है। यह हमें नहीं भूलना चाहिये, पिछले 6−12 महीने से पालिसी पैरालाइसिस है। कोई खुश नहीं है।
उद्योगपति ध्रुव साहनी की राय है कि मार्केट में सेन्टीमेन्ट निगेटिव है। हम अपनी स्थिति खराब कर रहे हैं। सभी मुद्दों पर बात करने की जरूरत है। माहौल बदलना चाहिये, विश्वास होना चाहिये कि अगर माल बनेगा तो बिकेगा। मैं पैसा नहीं लगाऊंगा अगर निर्णय 6 महीने बाद लिया जाना है।
एक तरफ उद्योग जगत के जज़्बात हैं दूसरी तरफ सरकार के सहयोगियों का दबाव है। प्रधानमंत्री चाह कर भी इन पर आगे बढ़ने की राजनीतिक इच्छा−शक्ति नहीं जुटा पा रहे हैं।