नई दिल्ली:
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में यदि अपनी हिस्सेदारी के विनिवेश की पहल नहीं की और उन्हें अपना प्रदर्शन सुधारने में मदद नहीं की तो इन बैंकों की बाजार हिस्सेदारी 2025 तक घटकर 60 प्रतिशत रह जाएगी। यह बात आरबीआई की एक समिति की रपट में कही गई है।
रपट में कहा गया कि निजी क्षेत्र के बैंकों की बाजार हिस्सेदारी 2025 तक बढ़कर करीब एक तिहाई (33 प्रतिशत) हो जाएगी जो 2000 में 12 प्रतिशत से थोड़ा ही ऊपर थी जबकि विदेशी बैंकों की भूमिका सीमांत भागीदार की बनी रहेगी।
रपट में कहा गया 'सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों की बाजार हिस्सेदारी 2025 में घटकर 60 प्रतिशत से थोड़ी ही अधिक रह जाएगी जो 2000 में 80 प्रतिशत थी।'
रपट में कहा गया 'जब तक (सरकारी) बैंकों की संचालन व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं आता और सरकार अपनी हिस्सेदारी कम करने को तैयार नहीं होती तब तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सामने एनपीए और कम पूंजीकरण की दोहरी समस्या बरकरार रहेगी जिससे उनकी वृद्धि प्रभावित होगी।'
रपट में कहा गया है कि सरकार की हिस्सेदारी कम होने से बैंकों को अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने का सरकार का बोझ कम होगा।
रपट में कहा गया कि संचालन में बदलाव और उत्पादकता में सुधार की संभावनाओं के अभाव में विदेशी संस्थागत निवेशक सार्वजनिक क्षेत्र बैंकों में निवेश नहीं करेंगे।
दूसरी ओर निजी क्षेत्र के बैंक का प्रदर्शन सुधरेगा और बाजार हिस्सेदारी बढ़ेगी क्योंकि वे अपने कारोबारी मॉडल को सहारा देने के लिए नई प्रौद्योगिकी का उपयोग बरकरार रखेंगे।