पर्यावरणविद सुनीता नारायण की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति ने कहा कि कंपनी द्वारा पर्यावरण मंजूरी संबंधी नियमों का अनुपालन नहीं किए जाने के कारण मैनग्रोव का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ और प्रस्तावित नार्थ पोर्ट के पास स्थित संकरी झाड़ियों (क्रीक) का क्षय हुआ।
उन्होंने कहा ‘‘बोचा द्वीप में 75 हेक्टेयर में मैनग्रोव नष्ट हुए जिसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया।’’ पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को गुरुवार को आधिकारिक तौर पर यह रिपोर्ट दी गई। रपट में कहा गया है, ‘‘कंपनी ने निर्माण कार्य के कारण इन क्रीक के अवरुद्ध होने से बचाने के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाए, उपग्रह से प्राप्त चित्रों मुताबिक प्रस्तावित नार्थ पोर्ट के पास इन क्रीक का क्षय हुआ।’’
समिति ने सरकार से परियोजना लागत के एक फीसद या 200 करोड़ रुपये में से जो भी अधिक है उस राशि से पर्यावरण पुनरुद्धार कोष बनाने के लिए कहा।
समिति ने कहा, ‘‘इस कोष का उपयोग मुंदड़ा में पर्यावरण नुकसान की भरपाई और नियामकीय और निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।’’ समिति ने परियोजना को रोकने की सिफारिश नहीं की क्योंकि उसका मानना है कि यह बहुत आगे बढ़ चुकी है। हालांकि समिति ने सलाह दी कि मंत्रालय को नार्थ पोर्ट की पर्यावरण मंजूरी रद्द कर देनी चाहिए।
नटराजन ने समिति को आश्वस्त किया कि सरकार इन सुझावों पर विचार करेगी। इस समिति में पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी और तटीय पारिस्थितिकी व आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं। पारिस्थितिकी पर बुरे प्रभाव के कारण अडाणी की जल परियोजना और बिजली संयंत्र परियोजना विवादों में रही है।
कंपनी के खिलाफ मिली शिकायतों के आधार पर पर्यावरण मंत्रालय ने इस क्षेत्र में पर्यावरण को हो रहे नुकसान से जुड़े आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की।
परियोजना के लिए किए गए बदलावों के कारण जीवनयापन के लिए समुद्र तट पर निर्भर मछुआरे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
सुनीता नारायण ने कहा, ‘‘समुद्र तट पर विकास के कारण उनके लिए बहुत कम जगह बची।’’ रपट में सुझाव दिया गया कि मूल सुविधाओं के प्रावधान और पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक योजना होनी चाहिए जिनमें मछली पकड़ने का ठिकाना भी होना चाहिए।
समिति ने मैनग्रोव के संरक्षण, फ्लायऐश के प्रबंधन व निपटान, लवणता नियंत्रण, तट संबंधी सुरक्षा (भूकंप और सुनामी) और परियोजना मंजूर करने की शर्त व मंजूरी पश्चात निगरानी के संबंध में कई सिफारिशें कीं।
मंजूरी पश्चात निगरानी को सबसे कमजोर क्षेत्र करार देते हुए नारायण ने कहा, ‘‘यदि निगरानी सख्त, विश्वसनीय और सार्वजनिक होती, तो इस समिति की कोई जरूरत नहीं पड़ती।’’