अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले चेहरों में सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हो रही है, वह है रिक वोल्डनबर्ग. शिकागो के पास स्थित एजुकेशनल टॉय कंपनी Learning Resources के सीईओ वोल्डनबर्ग ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई लड़ी. उनका कहना है कि उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि राजनीतिक फैसलों से पीढ़ियों से बने बिजनेस को खतरा पैदा हो गया था.
फैमिली बिजनेस से सुप्रीम कोर्ट तक
रिक वोल्डनबर्ग एक पारिवारिक टॉय कंपनी चलाते हैं, जिसकी स्थापना उनकी मां ने की थी. 'लिबरेशन डे' टैरिफ की घोषणा के कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने वकीलों से संपर्क कर अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमा दायर करने का फैसला किया. उनका तर्क था कि टैरिफ छोटे और मिड-साइज बिजनेस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं, जबकि बड़ी कंपनियां लॉबिंग और संसाधनों के दम पर खुद को बचा लेती हैं.
क्यों उठाया इतना बड़ा कानूनी कदम?
वोल्डनबर्ग की कंपनी अपने ज्यादातर एजुकेशनल खिलौने एशिया में बनवाती है. ट्रंप द्वारा IEEPA कानून के तहत लगाए गए टैरिफ के कारण लागत अचानक बढ़ गई और कंपनी की विस्तार योजनाएं ठप पड़ गईं. उन्होंने नया वेयरहाउस प्रोजेक्ट रद्द किया, नई भर्ती रोक दी और मार्केटिंग बजट में कटौती करनी पड़ी. वोल्डनबर्ग के मुताबिक, टैरिफ के बाद उन्हें अंदाजा था कि कंपनी छोटी हो जाएगी और कम कमाई करेगी, और वही हुआ.
एक खिलौने की कहानी, जिसने केस को जन्म दिया
उनके एक लोकप्रिय प्रोडक्ट ‘BubblePlush Yoga Ball Buddies' पर बदलते टैरिफ का सबसे ज्यादा असर पड़ा. पहले चीन में उत्पादन, फिर भारत में शिफ्ट और फिर अचानक नए शुल्क, इन उतार-चढ़ाव के बीच कंपनी को एक शिपमेंट पर 50,000 डॉलर का अतिरिक्त जुर्माना देना पड़ा. वोल्डनबर्ग कहते हैं कि उनकी कंपनी 'घूमते शरणार्थियों' की तरह अलग-अलग देशों में उत्पादन शिफ्ट करने को मजबूर हो गई थी.
बड़े कॉरपोरेट पीछे, छोटे बिजनेस आगे
दिलचस्प बात यह रही कि बड़े अमेरिकी कॉरपोरेट्स इस कानूनी लड़ाई से दूरी बनाए रहे. विशेषज्ञों के मुताबिक बड़ी कंपनियों के पास कैश रिजर्व और सप्लाई चेन मैनेजमेंट की क्षमता होती है, इसलिए वे सीधे कोर्ट जाने के बजाय लॉबिंग पर जोर देती हैं. इसके उलट, दर्जनों छोटे व्यवसाय और कुछ गैर-लाभकारी संगठन वोल्डनबर्ग के साथ खड़े हुए.
सुप्रीम कोर्ट में क्या था दांव पर
वोल्डनबर्ग और अन्य कंपनियों का तर्क था कि 1977 का IEEPA कानून राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की अनुमति नहीं देता. कई निचली अदालतों ने भी ट्रंप के टैरिफ को उनकी कानूनी सीमा से बाहर बताया था. इस केस में फैसला सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि अरबों डॉलर के व्यापार और संभावित 100 अरब डॉलर से ज्यादा रिफंड का सवाल बन गया.
करोड़ों डॉलर खर्च कर लड़ी लड़ाई
रिक वोल्डनबर्ग ने माना कि उनकी कानूनी फीस करोड़ों डॉलर तक पहुंच गई है, लेकिन उन्होंने इसे जरूरी निवेश बताया. उनका कहना है कि लाखों अमेरिकी व्यवसाय ऐसी ही स्थिति में हैं, मगर शायद वह अकेले ऐसे कारोबारी हैं जिन्होंने अपने संसाधनों से राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमा लड़ने का जोखिम उठाया. इस लिस्ट में नाम तो कई हैं, लेकिन रिक उनमें खास हैं.
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