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फोकलोर की दुनिया में मेनस्ट्रीम की एंट्री! VVAN से बदल सकता है भारतीय सिनेमा का गेम

फोकलोर चुपचाप भारतीय सिनेमा का सबसे दिलचस्प नया क्षेत्र बनता जा रहा है, और VVAN शायद उन शुरुआती मेनस्ट्रीम फिल्मों में से एक हो सकती है जो इस बदलाव को पूरी तरह अपनाए.

फोकलोर की दुनिया में मेनस्ट्रीम की एंट्री! VVAN से बदल सकता है भारतीय सिनेमा का गेम

फोकलोर चुपचाप भारतीय सिनेमा का सबसे दिलचस्प नया क्षेत्र बनता जा रहा है, और VVAN शायद उन शुरुआती मेनस्ट्रीम फिल्मों में से एक हो सकती है जो इस बदलाव को पूरी तरह अपनाए. 2023 में एक फोकलोर थ्रिलर के तौर पर घोषित हुई इस फिल्म ने ज्यादा ओवरएक्सपोजर से नहीं, बल्कि अपने जॉनर, इससे जुड़ी टीम और कास्ट के चलते उत्सुकता पैदा की है. दशकों से मेनस्ट्रीम भारतीय सिनेमा एक जैसे टेम्पलेट्स पर चलता आया है, उन्हें नया रूप देता रहा है लेकिन असल मायनों में दोहराव से बाहर कम ही निकला है.

आज के दर्शक इस प्रेडिक्टेबिलिटी से थकने लगे हैं और अब उन्हें ऐसी कहानियों की तलाश है जो ज्यादा  पुरानी, गहरी और इंस्टिंक्टिव महसूस हों. मिथकों, लोककथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ी फोकलोर आधारित कहानियां यही सब देती हैं, ऐसी दुनिया जहां सिर्फ कहानी ही नहीं, बल्कि माहौल और मूड भी उतना ही अहम होता है.

यह बदलाव सिर्फ थ्योरी तक सीमित नहीं है. तुम्बाड जैसी फिल्मों ने साबित किया कि मिथक से जुड़ी कहानी कहने की शैली न सिर्फ क्रिटिकल सराहना पा सकती है, बल्कि लंबे समय तक दर्शकों की याद में भी बनी रहती है. बुलबुल ने दिखाया कि फोकलोर को समकालीन और थीमैटिक नजरिए से कैसे दोबारा गढ़ा जा सकता है, वहीं विरूपाक्ष ने यह साबित किया कि आस्था और स्थानीय मान्यताएं बड़े पैमाने पर और कमर्शियल असर के साथ अलग-अलग मार्केट्स में काम कर सकती हैं. इन फिल्मों ने मिलकर फोकलोर को किसी सीमित या निच जॉनर के बजाय एक ऐसे जॉनर के रूप में स्थापित किया है, जिसमें थिएट्रिकल पोटेंशियल साफ नजर आता है.

फोकलोर को खास तौर पर आकर्षक बनाती है इसकी फ्लेक्सिबिलिटी. यह सिनेमा को बिना ज़रूरत से ज़्यादा भव्यता के स्केल दिखाने, बिना भारी एक्सपोज़िशन के भावनाएं गढ़ने और बिना दर्शकों को दूर किए ओरिजिनैलिटी पेश करने का मौका देता है. फिल्ममेकर्स और स्टार्स के लिए यह ओवरयूज़्ड ट्रॉप्स से बाहर निकलने का रास्ता खोलता है, वो भी मेनस्ट्रीम दर्शकों से जुड़ाव बनाए रखते हुए. इसी मायने में फोकलोर मेनस्ट्रीम सिनेमा से अलग नहीं है, बल्कि उसकी संभावनाओं को और फैलाता है.

VVAN बिल्कुल उसी वक्त आ रहा है, जब भारतीय सिनेमा इस बदलाव के दौर से गुजर रहा है. यह फिल्म The Viral Fever (TVF) की पहली थिएट्रिकल पेशकश है, और पंचायत व कोटा फैक्ट्री जैसे शोज के ज़रिए TVF की कहानी कहने की समझ हमेशा इमोशनल सच्चाई और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रही है. एकता कपूर की बालाजी टेलीफिल्म्स के सपोर्ट के साथ यह साफ संकेत मिलता है कि यहां फोकलोर को किसी एक्सपेरिमेंट की तरह नहीं, बल्कि एक मेनस्ट्रीम थिएट्रिकल ऑफरिंग की तरह देखा जा रहा है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा के लिए VVAN एक सोच-समझकर लिया गया क्रिएटिव मोड़ है. स्टूडेंट ऑफ द ईयर से लेकर एक विलेन और शेरशाह तक उनका करियर ज्यादातर मेनस्ट्रीम रास्ते पर चला है. फोकलोर में कदम रखना यह दिखाता है कि वह अब ऐसी कहानियों से जुड़ना चाहते हैं जहां परिचित फॉर्मूलों से ज्यादा वर्ल्ड-बिल्डिंग और टोन को अहमियत दी जाती है. तमन्ना भाटिया के साथ उनकी फ्रेश जोड़ी, जिसे दर्शक वैसे भी पसंद कर रहे हैं, और अरुणाभ कुमार व दीपक मिश्रा का निर्देशन, इन सबके साथ VVAN की एंट्री बिल्कुल सही समय पर होती महसूस होती है, और यह इस साल की बड़ी सरप्राइज फिल्मों में से एक साबित हो सकती है.

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