कुछ गीत ऐसे होते हैं, जिन्हें सुनते ही जैसे वक्त ठहर सा जाता है. शब्द, धुन और आवाज मिलकर ऐसा असर पैदा करते हैं कि सुनने वाला कुछ पल के लिए अपनी ही दुनिया में खो जाता है. मुकेश का गाया गीत “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” भी उन्हीं गानों में से एक है. दशकों बाद भी यह गीत सुनने वालों के दिल को उसी तरह छूता है, जैसे पहली बार 1971 में ‘आनंद' फिल्म में सुनने पर छुआ होगा. पुराने दौर के संगीत की खासियत यही थी कि गाने केवल मनोरंजन नहीं होते थे, वे भावनाओं का आईना बन जाते थे. इस गीत में भी वही सादगी और गहराई महसूस होती है.
मुकेश की दर्द भरी आवाज और सलिल चौधरी का कानों में रस घोलने वाला संगीत इस गाने की बड़ी खासियत है. लेकिन इसकी असली ताकत इसके बोल हैं, जिन्हें योगेश ने लिखा था. इस गीत की हर लाइन अपने आप में एक खूबसूरत कविता लगती है. योगेश ने इसे सिर्फ एक फिल्मी गीत की तरह नहीं लिखा, बल्कि हर पंक्ति को एक छोटी-सी कविता की तरह गढ़ा है. गीत की शुरुआती पंक्तियां ही इसकी मिसाल हैं- “कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए.”
यहां शाम को दुल्हन की तरह कल्पना करना एक बेहद खूबसूरत रूपक है. जैसे दिन ढलते ही सांझ चुपके से आती है और धीरे-धीरे पूरे आसमान पर छा जाती है. इस तरह की कल्पना गीत को एक दृश्य में बदल देती है, जिसे सुनते ही आंखों के सामने एक तस्वीर उभर आती है. गीत में आगे एक और पंक्ति आती है- “दिल जाने, मेरे सारे भेद ये गहरे, खो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे”
शब्दों की जादूगरी
इन शब्दों में एक ऐसी उदासी है, जो बहुत शोर नहीं करती, बल्कि भीतर ही भीतर महसूस होती है. योगेश की खासियत यही थी कि वे भावनाओं को बहुत साधारण शब्दों में कहकर भी उन्हें गहरा बना देते थे. इस गीत की सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसमें कोई जटिल भाषा नहीं है. शब्द बेहद साधारण हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी भावनाएं गहरी हैं. यही वजह है कि यह गीत सुनने वाले को तुरंत अपने साथ जोड़ लेता है.
आज भी जब “कहीं दूर जब दिन ढल जाए” सुनाई देता है, तो महसूस होता है कि यह सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं, बल्कि उस दौर की काव्यात्मक सोच का सुंदर उदाहरण है. यही कारण है कि पांच दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी यह गीत श्रोताओं के दिल में उसी तरह बसता है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं